गुरुवार, 4 सितंबर 2008
दूल्हे कब तक बिकते रहेंगे
बुधवार, 3 सितंबर 2008
तारीफ करूं उसकी जिसने उन्हें बनाया...
बखुदा जी चाहता है कि ऊपर वाले का मुँह चूम लूं कि उसने इस धरती के आलीशान टुकड़े पर ऐसे-ऐसे नायाब मुज्जसिमें गढ़ कर भेजे हैं कि बस देखते ही रह जाना पड़ता है। लगता है कि किसी समर-वैकेशन में बड़े इत्मिनान के साथ उन्हे गढ़ते वक्त उनकी किस्मत किसी कमाल की कलम से लिख डाली हो। इसी वजह से बरबस ज़ुबॉं पर यह लाइन आ जाती है, "तारीफ करूं उसकी जिसने उन्हें बनाया।"
अपने जैसों की बात करना तो भय्या हरियाली छोड़ रेगिस्तान का कठिन रास्ता नापना जैसा है। खेत काटने जैसी जल्दी में हड़बड़ी के वक्त जैसे-तैसे टेढ़ा-मेढ़ा गढ़ डाला होगा और तकदीर लिखते-लिखते कलम में स्याही खतम होगई होगी। रोना यही है कि आखिर हमने क्या बिगाड़ा था। जो बेचते थे दवा-ए-दिल मेरे साथ, वे दुकान अपनी बढ़ा चले। एक चैनल पर देखकर ताज्जुब हुआ कि एक विदेशी ने ऋगवेद में दिये गये विवरण के अनुसार उन ऐतिहासिक स्थलों की खोज में ईरान और इराक की ख़ाक छान डाली। उसे हासिल भी बहुत कुछ हुआ जिससे दुनिया के सामने हकीकत आयी। पर अपने माननीय द्वारिकाधीशों को दूर को मारिये गोली निकट की वस्तु भी निहारने के लिये उनके चश्मे का पावर धोखा दे जाता है। फॉर एक्जाम्पिल जहाँ सहारा है, वहीं बेसहारों का विशाल समूह देखकर सोचने पर मज़बूर होना पड़ता है कि सचमुच यही है सच्चे समाजवादी समाज का बेहतरीन नमूना। जरा हमसफर बनकर मेरे साथ लखनऊ से बाराबंकी तक लाल लंगोटावाले लालू पहलवान की रेलमपेल रेल में सफर करने की ज़हमत गँवारा करें। गोमती के गुस्से को पीते हुए जैसे आगे बढ़ेगे कि द्वारिकापुरी की गगनचुम्बी अट्टालिकाओं का दिलकश नज़ारा सामने देखते ही बनता है। माया उनकी समझ में नहीं आती है। किन्तु-परन्तु सहारे में बेसहारों की रोती-बिलखती फटेहाल झुग्गी-झोपड़ियों को देखकर दौड़ती पसीन्जर गाड़ी की खटमलयुक्त सीट पर बैठे-बैठे सोचता हूँ कि रेलवे लाइन के किनारे इन अनगिनत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले सुदामाओ पर पास रहने वाले द्वारिकाधीशों को जरा भी तरस नहीं आया कि कम से कम उनके सिर पर एक-एक पक्की छत तो मुहैय्या करा देते। फिर क्यों नहीं उन्हें मरहूम साहिर साहब का वही शेर याद करने को दिल चाहता है— ‘कि इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक।’ यह सबको मालुम है कि ये वे बदनसीब मजूर-दरहे हैं जिनका काम द्वारिकापुरी को सजाने-सँवारने के बाद दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका जाएगा। फिर भी इन्हें और इनकी बिना छत झुग्गी- झोपड़ियों को देखकर यूँ जान पड़ता है जैसे चाँद में लगे दाग़ य़ा जैसे सूर्य में लगा ग्रहण। यह तो बाइसकोप का ग़ैरमामूली सीन है बाढ़ में बग़ावत का बिगुल बजाती गोमती मैय्या के पार रेलवे लाइन के किनारे का। यहाँ तो तमाम जाने-अनजाने द्वारिकाधीशो के रंगमहलों व पंचसितारों के आस-पास लकुट-कमरिया ओढ़े टपकती छतों के नीचे पड़े अनगिनत सुदामाओ की झुग्गी-झोपड़ियों का सिनेमास्कोपिक बाइसकोप देखना आम बात है। पहले वाला ज़माना अब रहा कहाँ कि गरीब और फटेहाल सुदामा का नाम सुनते ही बिना किसी प्रोटोकाल की परवाह किये खुद नंगे पाँव गले मिलने चल देते थे और उनकी हालत पर तरस खाकर उन्हें एक दो नहीं बल्कि तीनों लोक देने को उतावले हो जाया करते थे। आज तो द्वारिकाधीशों का स्वार्थ इतना सिर पर चढ़ कर बोल रहा है कि लोक का एक छोटा सा टुकड़ा और टुकड़े पर एक परमानेन्ट छत मुहैय्या कराना गँवारा नहीं किया। यह तो सब जानते हैं कि उन फटीचर सुदामाओं के यह अरमान कभी नही रहे कि उनका एक बँगला बने न्यारा। उस वक्त भी तो फटीचर ‘सुदामा’ की दिली ख्वाहिश बस सिर छुपाने के लिये एक छोटी सी छत और दो जून की बासी ही सही एक टुकड़ा रोटी ही चाहिये थी। आधुनिक द्वारिकाधीशों द्वारा मनमाने ढंग से उगाये गये कंकरीट के जंगलों के बीच गोमती की सुनामी लहरों से अनचाहे खेल खेलते हुए अपनी कूड़े-कबाड़ों से पटी झोपड़ियों पर किस्मत की मार समझते हुए फटेहाली का रोना मानवाधिकार के ठेकेदारों से रोना भी तो बेहतर नहीं समझते हैं क्योकि डर है कि कहीं उन्हे आज के द्वारिकाधीशों का कोपभाजन न बनना पड़े और बची-खुची रोटी के लाले न पड़ जांये। मेरे ख्याल में राजधानी के द्वारिका धीशों को खुद कल्याणकारी राज्य के बोधिवृक्ष के नीचे विचार करना चाहिये। इसीलिये जी चाहता है कहने को ‘तारीफ करूँ उसकी जिसने उन्हें बनाया।‘ उन्हे जिन्हें इतने विशाल देश की गाड़ी को विकास की लाइन पर दौड़ाने के लिये ड्राइबरी की नौकरी दी गयी है। सच पूछिए तो भाईजान मेरी नज़र में तो डरेबरी की नौकरी आई.ए.एस. और आई.पी.एस. वगैरह से कहीं बड़ी है। जरा सी सावधानी हटी नहीं कि दुर्घटना हुयी। इसीलिये अंग्रेजों ने शायद रिटायर करने की एक उम्र निर्धारित की थी। पर उस ज़माने में शायद एलक्शनवाली एनर्जी और लम्बी उम्र अता करनेवाली मशीन नहीं इजाद की गयी रही होगी। अब कितने भी इनरजेटिक और देशसेवा करने की तमन्ना संजोये यूथ-फेस्टिवल वाले उस ड्राइविंग लाइसेन्स के लिये हाथ-पैर मारते रहें लेकिन कोई फायदा होते नहीं दिखता। आजके द्वारिकाधीशों को अमरत्व की घुट्टी जो उनके आला सरदारों ने पिला दी है इसलिये उनके नजदीक रिटायरमेन्ट का भूत फटक नहीं सकता है। किसी ने ठीक ही कहा है,— ‘न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बन्धन जब प्यार करे कोई देखे केवल मन।’ भाई, उन्हें इस मुल्क से बेपनाह प्यार जो है। इसलिए उनके रिटायरमेन्ट का सवाल ही नहीं उठता है।
असली-नकली का खेला...
अमां, मुझे अपने अपने बचपन की वह बात खूब अभी तक याद है। जब मैं किसी इम्तहान में बगल वाले की कापी को उचक उचक कर देख कर अपनी कापी पर लिख रहा था। उस वक्त मूंछे तो नहीं हल्की हल्की रेख जमी थी। मारे जोश के जब इम्तहान देकर बाहर निकला तो उन रेखों पर ही ताव से हाथ फेरते हुए साथियों को बताता रहा कि मेरे सारे सवाल सेन्ट परसेन्ट सही होंगे, क्योंकि मैंने बगल वाले से अक्षरश: नकल कर डाली है। उधर बगल वाला परीक्षार्थी मुंह लटकाए हुए लोगों से बता रहा था कि उसके सभी सवाल गलत हो गए। मेरी झूठी खुशी पर तंज कसते हुए किसी पतली कमर मौलवी साहब ने फरमाया, ‘हजरत नकल में भी अकल की जरूरत होती है।’ तब मुझे भी होश आया लेकिन तब होता क्या है ‘जब चिडि़यां चुग गयी खेत।’
इन दिनों अपने मुल्क में भी नकल की सुनामी लहर उठ रही है। रोज अखबारनवीसों को इस नकल के मुद्दे पर कलम तोड़ कर स्याही पी लेनी पड़ती है। सुनते हैं आज कल कोई जगह नहीं बची है जहां जाली नोटों की बौछारे न पड़ रही हों। चाहे डुमरियागंज हो या डूंगरगढ़। सब जगह जाली नोटों की बरसात हो रही है। यह सब देखकर पेशोपेश में पड़ गया हूं कि हाल में संसद के स्वर्णपटल पर नोटों की गड्डियां जो दिखाई गयीं, खुदा जाने वे असली थी या नकली? क्योकि पहले हम लोग जब मुहल्ले में ड्रामा खेलते थे और उसमें नोटों की गड्डियां दिखाने का सीन आता था तो हमारे डायरेक्टर साहब नीचे ऊपर असली दो चार नोट रखकर बीच में उसी साइज के कटे सादे कागज रख दिया करते थे। देखने वाले समझते थे कि सब असली नोटों की गड्डियां हैं। अब बहरहाल देस में नोटों की कमी है नहीं पर हैरत इस बात पर जरूर होती है कि बैंक जो नोटों के माहिर समझे जाते हैं और ‘विश्वास’ जिनका मूलमंत्र होता है वे इन जाली नोटों के जाल में उपभोक्ता को कहां और कैसे फंसाने पर उतारू हो गये?
अब अपने दिलो दिमाग के दरवाजे खोलकर झांकने की झकझोर कोशिश करता हूं कि नकली की नकेल नोटों की ही क्यों पकड़ी जा रही है? असली नकली का किस्सा तो बहुत पुराना है। नकली शिखण्डी को ही सामने करके बेचारे बाल ब्रह्मचारी भीष्म पितामह का बन्टाधार कर दिया गया। तारीख के पन्ने पलटने पर मालुम हुआ कि ‘झांसी की रानी’ के किसी गोलन्दाज ने गोले के नाम पर नकली गोलों से फिरंगी फौज पर प्रहार किया था। भय्या, क्या नकली है और क्या असली है? इस चक्कर में घनचक्कर बनकर माथा खपाना बेकार है। कुछ दिन लोग बोफोर्स और फौजी शहीदों के कैफीन को नकली बताकर आपस में चोंचें लड़ाते रहे। अब यह बात अलग है कि आज शनि की साढ़े साती कागजी नोटों और सरकार से सरोकार रखने वाले बैंकों पर चढ़ बैठी है।
लेकिन मेरी समझ में किसी एक को दोष देना ठीक नहीं है। बड़े-बुजुर्गों ने खूब मन्थन करने के बाद कहा था कि जब अपना ही माल खोटा तो परखैया का क्या दोष? पहले अपने गिरेबान में मुंह डालकर झांकना चाहिए। सीने पर जरा आइसक्रीम रखकर सोचिए कि नकली नोटों के पीछे ही हाथ धोकर लोग क्यों पड़े हैं? कोई सस्ती सीबीआई और कोई मद्दी सीआईडी से जांच कराने के लिए गुटुरगूं कर रहा है। सोचने वाली बात है कि जब माननीयों के बीच असली-नकली का खेल चल रहा है तो कहां तक जांच की आंच गर्मी पहुंचाएगी?
अब तो मुझे लगता है कि खुद दुनिया बनाने वाला सोचता होगा कि कहीं उसके द्वारा रचे और धरती पर उतारे गये लोग असली रह भी गये हैं या नहीं? हो सकता है ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की बदलती फिजां में किसी नकली रचनाकार ने नकली रचना भेजने का पोस्टआफिस खोल दिया हो। इन दिनों तो अपने कवि या लेखकों को कुछ ऐसी लाइलाज बीमारी ने धर-दबोचा है कि वे ग़ालिब, शेक्सपीयर और नीरज की पंक्तियों को अपने नाम से पढ़कर अच्छा खासा ईनाम, इकराम हासिल कर लेते हैं। अब तो भाईजान ऐसा जमाना आ गया है कि किसी पार्टी में रहते हुए और पार्टी के लिए समर्पित होने का दावा करने वालों के दावे को असली कहना मुश्किल है। भई कहना पड़ता है कि ‘अच्छों को बुरा साबित करना दुनिया की पुरानी आदत है।’ कौन अपने असली रूप में सरकार के भीतर फुफकार रहा है और कौन बाहर फुफकारने की एक्टिंग कर रहा है, बताना बहुत मुश्किल है। कौन सच्चे दिल से रामनाम जप रहा है और कौन नाम के लिए राम का नाम ले रहा, कहना नामुमकिन है। जब पुलिस की वर्दी में डकैत डकैती करके चले जाते हैं और रिपोर्ट लिखने में आनाकानी की जाती है तो भाई असलियत से रूबरू होना नामुमकिन है। सुनने में आता है कि आजकल इंजेक्शन लगा कर सब्जियों को खूब डेवलप कर दिया जा रहा है। दूध को असली कहकर सेहत बनाने की चाहत रखना निहायत मूर्खता के सिवा कुछ नहीं है। लेकिन जानते समझते हुए किसी के पेट पर लात क्यों मारी जाए? हम कहां कहां सीबीआई और एन्टीकरप्शन को भिड़ाते रहेंगे? जब पुलिसिया फोर्स होते हुए भी आराम से गाड़ी या बसों में लोग छीन झपट कर चलते बनते हैं तो और कहने को रहा ही क्या है? और तो और जब नकली वायदे करके लोगों से विकास के नाम पर वोट बटोर लेते हैं तो इससे बढ़कर नकलीपन क्या हो सकता है?
असल में नकलीपन की ऐसी हवा चली है कि जड़ से नेस्तानाबूद करना खुद अल्लाह मियां के वश में नहीं रहा है। खुदा न खास्ता अगर वह दोनों जहां का महान ठेकेदार हमारी गली में आ टपके तो कुछ क्या परसेन्टेज लोग नकली कहकर सीबीआई के हवाले कर बैठेंगे। लेकिन बमुताबिक दादा हुजूर के सब वक्त वक्त की बात है। नकलीपन का लेवल कभी रिफाइन्ड और सरसों के तेल पर लगाया जाता है, कभी पार्टी के निहायत वफादार पर चस्पा करके बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। आज कल मेडिकल स्टोर वाले नकली दवाओं के लिए अलग बदनाम हो रहे हैं। कभी कभी लोगों को भी शक होने लगता है कि वे असली माता-पिता की असली संतान हैं भी या नहीं?
बहरहाल मौजूदा हालात में तो नकली नोटों को देखना है कि वे आर्यो की तरह कहीं मध्य एशिया से तो नहीं आए? खैर जहां से जैसे भी और जिसके जरिए से भी इस स्वर्ग स्वरूपा धरती पर आये हों उनसे हमें या हमारे जैसे फटीचरों को क्या लेना देना। यहां तो नोट देखा नहीं कि लार टपक पड़ी। लार तो बड़े-बड़े दिग्गजों के टपक पड़ती है क्योंकि उनकी लोभी नजरों के सामने तो सब से बड़ा रुपय्या है। वे कहां हैं कहां हैं जिन्हें नाज है हिन्द पर वे कहां हैं? क्या उनका शगल सिर्फ ‘डील’ की झील में डुबकी लगा कर पाउडर मलना है या कभी श्राइन बोर्ड, कभी रामसेतु और कभी राममंदिर की बाल की खाल निकालना है? उनका इस मामले में क्या विचार है जो फर्श पर रहकर अर्श पर पहुंचने का ख्वाब देख रहे हैं। इन सबके बावजूद उन्हें कहने को जी चाहता है कि पलट तेरा ध्यान किधर है? क्या हादसे हद से गुजर जाने के बाद उन्हें चन्द दिनों के लिए ख्याल आता है? ऐसे उदारवादी देश के उदारवादी कानून को बारम्बार नमन करने को जी चाहता है। क्यों नहीं ये बीमारियां दूसरे मुल्कों में फैल रही हैं। गुस्ताखी माफ की जाए, वही कहावत बार-बार कहकर दिल को तसल्ली देना चाहता हूं कि ‘हर शाख पे उल्लू बैठे हैं अन्जामें गुलिस्तां क्या होगा?’
इसलिए सिर्फ नकली नोटों को ही नहीं, नकली वोटों के सहारे सुनहरी कुर्सी पर टंगड़ी पसार कर बैठे लोगों की तरफ भी ध्यान देना चाहिए।
गुरुवार, 7 अगस्त 2008
कोई सुने इन मुर्दों की दास्तान
एक दिन ऐसा आयेगा जब हमारे कब्रिस्तान का वज़ूद मिट जाएगा और उस जगह खड़ी मिलेगी किसी म़ाफिया की आलीशान इमारत। जानते नहीं बुश साहब की तीखी नजर अब इस मुल्क पर है। खुदा न खास्ता कभी इधर आने का उनका प्रोग्राम बन गया तो इस ‘ग्रेवयार्ड’ की हालत देखकर सोचो सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा की क्या छवि बनेगी? अभी जो डील की झील में हम गोते लगाते हुए फूले नहीं समा रहे हैं, उसका क्या होगा? दुनिया भर की मीडिया कीचड़ उछालेगी। बात में दम देखकर वह बात याद आयी जब अभी हाल में अंग्रेजों का एक दल भारत आया था लेकिन उस दल को ऐसी जगहों पर जाने नहीं दिया गया। रोना उन संस्कृति के ठेकेदारों पर जाता है जो कहते हैं ‘सच्चा धर्म अविरोधी होता है।’ जिन्दों से हमें नफरत हो सकती है लेकिन जो मर गये उनके लिए तो हमारे दिल में अकी़दत होना चाहिए। वे क्यों नहीं सोचते है कि विदेशों में हमारे मंदिरों और मस्ज़िदों को इज्जत दी जाती है लेकिन अपने प्रदेश की राजधानी में कायम इस ऐतिहासिक कब्रिस्तान की दशा पर किसी का ख्याल नहीं। इससे ज्यादा शर्म की बात क्या हो सकती है। अपने ही देश में मुठभेड़ में मारे गये दस्युओं की लाशों पर दो-गज़ कफन देकर इज्जत दी जाती है क्योंकि मालूम है कि उसका शरीर दस्यू था। आत्मा तो परमात्मा का रूप है। फिर भी कब्र या समाधि के प्रति आदर तो होना चाहिए। जफ़र साहब की वह बात ‘दो गज ज़मीं भी न मिल सकी कूएयार में’ को नहीं दोहराना चाहिए। चलते-चलाते यह बात कहना चाहता हूं कि कम से कम इसलिए भी अंग्रेजों के इस पुराने कब्रिस्तान का जीर्णोद्धार किया जाना चाहिए। जिससे आने वाली नस्लें कुछ समझ सकें, कुछ जान सकें। ईसाई भी तो हमारे अल्पसंख्यक अंग हैं। उनके साथ न्याय जरूर होना चाहिए। मुर्दों की दुआ बड़ी कारगर होती है भाई।
बुधवार, 6 अगस्त 2008
कीचड़ में खोया गुलबन्द...
गुरुवार, 10 जुलाई 2008
यहाँ भी ‘ब्लैकहोल’ हैं।
इधर राजधानी के टांग पसारने की बात सुनकर फिर एक खौफ समा रहा है कि एक और ब्लैकहोल लहलहाते खेतों के साथ लोक संस्कृति के विशाल ग्रह को लीलने के लिए बढ़ रहा है, जिसके लिए कभी हिन्द को नाज था। दिल बार-बार पूछता है, जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहां हैं, कहां हैं? जो बड़ी अदा के साथ गांधी, लोहिया और विनोबा के ताल से ताल मिलाकर गाया करते थे ‘अमुवा की डारी पे बोले रे कोयलिया कोई आ रहा है़।’ आता था आता है मेड़ों पर से अपनी लहलहाती फसल को देखते हुए मस्ती में गाते, ‘कान्धे पे कुदरिया रखले माथे पे पगड़िया धइले, आगे आगे हरा चले पीछे से किसनवा खेतवा जोते रे किसनवा।’ चकाचक के नाम पर पहले ही कंकरीट के ‘ब्लैकहोलों’ ने गांव देहात के साथ अन्न के भण्डार खेतों को लील लिया है। अब जो बचे खुचे लोकगीत लोक संस्कृति और धरतीपुत्र हैं उन्हें भी राजधानी का ब्लैकहोल लीलना चाहता है। शायद यही विकास है। राजधानी बढ़े। गांव खेत छोटे हों और फिर घडि़याली आंसू के साथ रोना कि देश में अन्न का संतोषजनक उत्पादन नहीं हो रहा है।
ऐसा मत ख्वाब में मत सोचिए कि मैं चकाचक चौकन्ना करने वाली राजधानी का फैलाव नहीं देखना चाहता हूं। दिन पर दिन खेत की मेड़ों पर संगेमरमरी दीवारे तामीर होती जा रही हैं। खुशी होती है कि चलो सूने दरवाजे पर कुमकुमें तो लटकाए जा रहे हैं। हमारे गांव की गलियों में भले अंधेरा छाया हो मगर राजधानी की जगमगाहट देखकर जरूर खुशी हो रही है कि राजधानी के दरबारियों और आम लोगों में कुछ तो फर्क होना चाहिए। मगर अर्श कहीं ब्लैकहोल बनकर फर्श को निगल न ले। फिर कहां मिलेगा प्रेमचन्द को होरी? कहां पगुराते दिखाई पड़ेंगे हीरा-मोती? कहां सुनने को मिलेगी ‘झीनी झीनी रे बीनी चदरिया’ और मिर्जापुरी कजरी का आनन्द कहां मिलेगा? क्योंकि उन्हें लील रहे हैं ऊंची हवेलियों में आबाद शानोशौकत वाले सीरियलों के ‘ब्लैकहोल।’ हमें तो विशुद्ध आबोहवा वाले गांवों से सौ साल पहले भी प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा। चौपालों में बैठ कर रात के बारह बारह बजे तक बतकही करना बहुत भाता था, इसलिए कि वही इस देश प्रदेश की सच्ची पहचान है। जमीनी जिन्दगी उसी में पलकर उसने राजधानी की चौड़ी सड़कों और संगेमरमरी बारादरी तक पहुंचाया है। वहां पहुंच कर खुद तो ‘ब्लैकहोल’ की तरफ खिचे जा रहे हैं। और अब राजधानी का ज्ञानी बनकर गंवई पाती की छाती पर मूंग दल रहे हैं और मक्खन का लेप लगा कर जब शहरी ब्लैकहोल को गांवों की ओर बढ़ते देखते हैं तो हां में हां मिलाते हुए भूल जाते हैं कि एक दिन उनका भी वजूद मिट सकता है क्योंकि ब्लैकहोल का खिंचाव होता ही ऐसा है। गांधी, विनोवा, अम्बेडकर और लोहिया सबके सब उस ब्लैकहोल की भेंट चढ़ जायेंगे। ‘आ बैल मुझे मार वाली’ कहावत चरितार्थ होगी। अभी भी वक्त है अपनी लोक संस्कृति को बचाने के लिए वरना फिर ब्लैकहोल से बचने के लिए कहीं सारे गंवई गाने न लगें ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।’ क्योंकि जनता के वजूद से ही देहात, कस्बे, शहर, प्रदेश और देश का वजूद होता है।
आपबीती, जगबीती
बचपन बीता जवानी आयी तो नानी मृत्यु की सुहानी चिरनिद्रा में विलीन हो गयीं। तब आपबीती और जगबीती की सीटी अपने आप मेरे कान में बजना शुरू हो गयी। जगबीती में पता चला कि इस पार हमारा भारत है उस पार चीन, जापान देश मध्यस्थ खड़ा है। दोनों में एशिया का यह प्रदेश। यानी दुनिया के अलग-अलग भाषाओं, धर्मों और जातियों में बंटे हुए लोग जिनमें होड़ लगी है अपनी-अपनी ढपली पर अपना-अपना राग अलापने की। सुनाते हुए सबको देखा कि हम सब एक ही पिता की संतान हैं। प्रश्न उठता है कि जब एक ही पिता की हम सब संतान हैं और धरती माता की कोख से जनम लिया है तो बीच में फिर भेदभाव की खाई कहां से आ टपकी? शायद इसी को कहते हैं जगबीती।
अब नानी की कहानी में आपबीती की बात भी धीरे-धीरे समझ में आने लगी। एक घर एक परिवार लेकिन उनमें भी कोई मेल मिलाप नहीं। कोई न कोई बुजुर्ग रहा होगा जिसका कुनबा बढ़ते-बढ़ते परिवार बना, राज बना और देश बना। हां यह बात अलग है कोई काला हुआ तो कोई गोरा। कोई विकलांग रहा तो कोई सरपट भागने वाला। किसी ने परिवार के लोगों की सेवा करना अपना कर्त्तव्य समझा तो दलित कहलाया। जिसने परिवार की सुरक्षा की जिम्मा उठाया तो वह शस्त्रधारी क्षत्रिय कहलाने पर फूले नहीं समाया। शस्त्रों के अध्ययन अध्यापन में जिन्हें इन्टरेस्ट हुआ उन्हें ब्राह्मण की कटेगरी में रखा गया। चलिए आपबीती वाली नानी की कहानी समझ में आयी। बड़े ध्यान से समझने के बाद नतीजा निकला कि यह आपबीती वाली कहानी जगबीती की एकदम कार्बन कापी रही। जगबीती में नानी तो नहीं बता सकीं लेकिन जब गुरू जी से शिक्षा लायक हुआ तो पता चला कि चंगेज, हलाकू और सिकन्दर अपनी हुकूमत के वित्तांत को तानने के लिए उन्हीं के खून से होली खेली जो उन्हीं के भाई बंधु रहे होंगे। नानी की आपबीती कहानी सुनकर उतनी समझ तो नहीं थी लेकिन यहां भी घर परिवारों की चहारदीवारियों के पीछे सिकन्दर कलंदर की कहानी कहते-कहते नानी बेचारी कभी-कभी रूंआसी हो जाया करती थीं। नानी तो नदारद हो गयीं और आपबीती का यह पात्र अपने छोटे से घर परिवार के दायरे में सिमटा हुआ गृहस्थी की दहलीज पर खिसकता-खिसकता पहुंच गया, लेकिन वहां सिकन्दर और पोरस का घमासान देखने को मिला तो यकीन नहीं होता कि हमें जन्म देने वाले एक ही माता पिता रहे होंगे। यहां भी अपना साम्राज्य बढ़ाने के लिए इनडायरेक्ट संघर्ष। जबकि सबकी जुबानी एक ही बात निकलती है कि सिकन्दर भी आया कलंदर भी आया, कोई रहा है न कोई रहेगा। हैरतअंगेज बात तो तब लगती है कि जिस बुजुर्ग ने कुनबे भर को पालने पोसने के लिए न जाने किस मशक्कत से जिन्दगी दांव पर लगा दी, उसी को पूरा कुनबा सठियाया समझ कर आंखों से ओझल करने की कोशिश करता है। कोर्ट कचेहरी का चक्कर लगाते हैं। इस संघर्ष में सब अपने-अपने तवे अलग कर लेते हैं। मगर वो दो तीन बहुओं के रहते हुए बेचारे वृद्ध-वृद्धा को अपना पेट भरने के लिए खुद रसोई की आग में झुलसना पड़ता है। अपना रोना रोवे तो किससे? कोई तो आंसू पोछने वाला होना चाहिए। बहुत पुराना घिसा-पिटा शब्द ‘सठिया गया बुड्ढा’ बस सुनकर आपबीती कहानी सुनाने की हिम्मत नहीं होती। सरकार ने इंतजाम तो बहुत किए हैं लेकिन वहां पहुंचने के पहले ‘जल में रहकर मगर से डर’ बना रहता है। इसलिए ज्यादातर ऐसी कहानियां दुखान्त ही होती हैं।
मुझे तो नानी की कहानी जगबीती ही अच्छी लगती है क्योंकि वहां जो कुछ हुआ है वह डायरेक्ट रहा है। ‘आपबीती’ कहानी में जो होता है इनडायरेक्ट होता है जिससे औरों को सुनाना भी मुश्किल होता है। इसलिए यहां घुटन ज्यादा होती है और जी यही चाहता है कि नानी अपने साथ ही क्यों नहीं ले गयीं। आखिर में वहीं पुराना गाना याद आता है ‘चल उड़ जा रे पंछी यह देश हुआ बेगाना’। जिसे यकीनन सबको एक दिन गाते-गाते रोना पड़ेगा। बात निराशावादी जरूर है लेकिन सच्चाई यही है और यह घर-घर की कहानी कहकर लोग संतोष कर लेते हैं।
सोमवार, 7 जुलाई 2008
सियासत के साज़ पर बुतों का संगीत
रविवार, 6 जुलाई 2008
ऊँचा देखो, ऊँचा सुनो
अब देखिए न मैं भी अच्छी खासी चपरासी की नौकरी करता हूँ। जिगर का टुकड़ा रमफेरवा चाट का ठेला लगा कर सौ-पचास रूपये रोज कमा ही लाता है और रही उसके माई की बात तो वह भी घरों का चौका-बरतन कर के कुछ न कुछ ले ही आती है। यानी ‘साथी हाथ बढ़ाना एक अकेला थक जाएगा बढ़ के बोझ उठाना’ वाली बात पर बाकायदा अमल किया जा रहा है। फिर भी ‘ढाक के तीन पात’ वाली बात है। याद है पहले कुछ निम्न तबके वालों को सुना जाता था कि घर भर कमाते हैं तो लोग हँसी उड़ाया करते थे। आज वही बात आम होकर शान समझी जा रही है। सब वक्त की बलिहारी है मगर चारों ओर एक ही शोर सुनाई देता है कि ‘भय्या मँहगाई बहुत बढ़ गयी है।’ अब समझ से परे है कि इतने पर भी सरकारी गैर-सरकारी बँगलो पे बँगले न्यारे बनते चले जा रहे हैं। आखिर कैसे और क्यों? मोटे तौर से बात हँसी के साथ समझ में आती है कि पॉकेट हमारी ओर जगन्नाथ रूपी हाथ उनके। पहले कहावत थी कि ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ पर अब मामला उल्टा हो रहा है।.चलिए, ‘जब आवे सन्तोष धन सब धन धूरि समाना’ उनके घर के सामने अपना घर नहीं बनाया रमफेरवा की माई का सपना ‘इक बँगला बने न्यारा’ सच नहीं हुआ तो क्या हुआ? जिन्हें हमने वोट के ओवरकोट पहना कर भेजा उनकी ख्वाहिशें तो पूरी हो रही है और हमारे लिए है कि हर ख्वाहिश पर हमारा दम निकले। दम तो एक दिन निकलना ही है। आखिर शहर सजेगा तो हमारा भी नाम होगा कि हम फलाँ शहर के वासी हैं। मन की वीणा पर ताल से ताल मिला कर गाने वाले मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि आदमी की सोच सकारात्मक होनी चाहिए। उसे हमेशा आगे बढ़ने के बारे में सोचना चाहिए।
अब बेमौसम की बरसात में सकारात्मक सोच के फटे शामियाने के नीचे बैठे कर सोचते हैं तो बात समझ में आती है। आदमी भी खूब है। कहीं एक चीज़ उसे नीलगगन में उड़ने का आनन्द देती है। कहीं वहीं उड़ान उसे दर्द देती है। मैं ही जब अपने देश या शहर की बाहें फैलाए सड़को, उस पर दौड़ते वाहनों की कतार और आकाश से बातें करती इमारतों को देखता हूँ तो गजब का गर्व होता है और उसी गर्व में कहता हूँ कि यहीं वजह हो सकती है कि खुदा को प्यारे हुए लोग उनसे गिड़गिड़ा कर अरदास करते होगें कि हमें फिर से उसी तरक्की पसन्द मुल्क में वापस भेज दो। ऐसे में कुछ खलनायक टाइप लोग मँहगाई का हवाला देकर उन्हें भड़काते होंगें तो उन खुदा के प्यारे लोगों के ट्रान्सफर और पोस्टिंग की फाइलें दबा कर रख दी जाती होंगी।
उस वक्त के लिए मैं सोचता हूँ कि अगर बतौर मुझे वकील मुकर्रर किया जाता तो मै उनका केस यूँ लड़ता कि मीलार्ड — ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ में सर्वांगीण विकास किया जा रहा है। फिर आदमी का आदमी के लिए और आदमी के द्वारा चीज़ों की कीमतों में तरक्की होने से शिकवा शिकायत क्यों? हर कोई तरक्की पसन्द होता है। हर कोई बढ़त चाहता हैं। चाँद-सितारों की तमन्ना करता है। एक मँजिल से दो मँजिल और दो से तीन मँजिलों वाली बिल्डिंगों पर फील्डिंग करने का मज़ा कुछ और ही होता है। यहाँ के लोगो की तारीफ करना चाहिए के वे निरन्तर ऊपर की ओर देखना पसन्द करते हैं। सबूत है— योर ऑनर कि रावण ने स्वर्ग तक सीढ़ियाँ बनाने की योजना बनाई थी। आज का भी सबूत हुजूर हाजिर है कि हमारे बीच के लोग खेत खलिहानों से आगे बढ़ कर राजधानियों की गगनचुम्बी इमारतों को स्पर्श करने के अरमान सजाये हुए हैं। गोया कि इसी का दूसरा नाम तरक्की है। ऐसे में अगर तरक्की को छूने के लिए कीमतें आगे बढ़ रही हैं तो गुनाह कहना मेरी समझ से दुरूस्त नहीं है? उसे भी बढ़ते रहने का पूरा हक़ है। इन बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगा कर उसे पीछे ढकेलना कहाँ तक इन्साफ हैं? बल्कि उसका नाम गिनीज बुक जैसे ग्रन्थों में नोट किया जाना चाहिए। यह उसके साथ मीलार्ड बहुत गैर इन्साफी होगी कि कुछ मुठ्ठी भर गरीब लोगो के लिए उस पर रोक लगाने की कवायद में समय बरबाद किया जाए। दैट्स ऑल मीलार्ड। इस लिए अगर कीमतें आसमान छू रही हैं तो उन्हें छूने देना चाहिए। बल्कि उनकी हिम्मत अफ़जाई की जानी चाहिए।
चैनलिया चम्पाकली की करामात
गुरुवार, 13 मार्च 2008
भैया, काहे का बिलखना...
नोट: (12/03/2008 को स्थानीय हिन्दी दैनिक ‘जनमोर्चा’ में प्रकाशित)