गुरुवार, 7 अगस्त 2008

कोई सुने इन मुर्दों की दास्‍तान

उच्‍च विचारों की गगनचुम्‍बी इमारतों से झांकते लोगों ने बताया कि सबै भूमि गोपाल की।जी चाहा उचक कर उनके खुशबूदार मुंह को चूम लें। दूसरी तरफ लोगों ने बताया कि-जनाज़ा चाहे दुश्‍मन का ही क्‍यों न हो कम से कम चालीस कदम पहुंचा देना चाहिए। बातें सुनने में बहुत बढ़िया लगती है। बात भी एकदम चोखी है क्‍योंकि जिस फिरंगी हुकूमत ने गुलाम हिंदुस्तानियों पर तरह-तरह के कहर ढाये, आज हम उन्‍हें गले लगाते हुए सफाई देते हैं कि कोई भी पूरी कौम खराब नहीं होती है। यही वजह है कि हमारी दरियादिल सरकार डीलपर दिल दे बैठी है।
सवाल उठता है कि जब हम जिन्‍दा लोगों के सामने घुटने टेक कर दोस्‍ती की भीख मांगने के लिए किसी की आलोचना की परवाह नहीं करते है तो फिर जो इस रहती दुनिया से कूच कर चुके है और परम्‍परानुसार हम उन्‍हें ढेर सारे अकी़दत के फूल चढ़ाते हैं तो फिर उनकी भीड़ के लिए बने कब्रिस्‍तान के मेनटेनेन्‍स पर उदासीनता क्‍यों? देखते-देखते मुस्लिमों के कब्रिस्‍तान की चहारदीवारी बना दी गयी और हर जुमे़रात को चिरागां किया जाता है। गोमती किनारे मुर्दों की मांग पर बैकुण्‍ठ धाम बना दिया गया है, जैसे सेकेण्‍डों-मिनटों में अमौसी हवाई अड्डे का नाम क्‍या से क्‍या हो गया।
अब डीलकी झील में गुड-फील करने वालों की नजर फिरंगियों के उस कब्रिस्‍तान की तरफ क्‍यों नहीं जा रही है जो रेलवे लाइन के किनारे सदर के करीब है। हमने तो पुलिसवालों को किसी लाश की तफ्तीश करते वक्‍त कैप उतारते देखा है जो शायद आदरसूचक होता है। अब तो वह फिरंगियोंके कब्रिस्‍तान के अलावा हिन्‍दुस्‍तानी-ईसाइयों के मुर्दों को दफनाने की भी जगह है। कहते हैं कि अल्‍लाह के प्‍यारे लोगचाहे किसी धर्म जाति और मज़हब के हों, उन्‍हें रिस्पेक्ट पे करना पवित्र कर्त्‍तव्‍य होता है। आज इस कब्रिस्तान (ग्रेवयार्ड) की हालत यह है कि बड़ी-बड़ी घासों और झाड़ियों में कब्रों का वजूद खत्म होता जा रहा है। आसपास के बाशिन्‍दों के लिए गन्‍दगी करने की जगह बन गयी है और जुआरियों का अड्डा। उन्‍हें जरा भी डर नहीं लगता है कि कहीं कोई भूत अंकल नाराज हो गया तो लेने के देने पड़ जायेंगे।
मैं हिन्‍दू या मुसलमान हूं। मेरे तो कब्रिस्‍तान या श्‍मशान स्‍थल चकाचक हैं। मुझे क्‍या लेना देना? जो मर गया सो मर गया। मैं इन बेचारे लावारिस मुर्दों को देखकर अपनी संस्‍कृति पर जरूर रो रहा हूं जिसमें मृत्‍यु के बाद भी तमाम संस्‍कारों को सम्‍पन्‍न कराने का चलन रहा है। रोना प्रशासन के उन अलम्‍बरदारों पर आ रहा है जिन्‍हें मालूम है कि एक दिन उन्‍हें भी इसी धरती में सोना है। ठीक ही किसी ने कहा है कि सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है। रोना उन ईसाई भाइयों की खामोशी पर भी आ रहा है जो अपने ही भाई-बन्‍धुओं की इस दुर्दशा पर उफ नहीं कर रहे हैं। एक दिन इसी कब्रिस्‍तान से लम्‍बा लबादा पहने एक भूत अंकल मेरे ख्‍वाब में आकर कहने लगा कि तुम लोग जो कर रहे हो ठीक ही कर रहे हो।
एक दिन ऐसा आयेगा जब हमारे कब्रिस्‍तान का वज़ूद मिट जाएगा और उस जगह खड़ी मिलेगी किसी म़ाफिया की आलीशान इमारत। जानते नहीं बुश साहब की तीखी नजर अब इस मुल्‍क पर है। खुदा न खास्ता कभी इधर आने का उनका प्रोग्राम बन गया तो इस ग्रेवयार्डकी हालत देखकर सोचो सारे जहां से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍तां हमारा की क्‍या छवि बनेगी? अभी जो डील की झील में हम गोते लगाते हुए फूले नहीं समा रहे हैं, उसका क्‍या होगा? दुनिया भर की मीडिया कीचड़ उछालेगी। बात में दम देखकर वह बात याद आयी जब अभी हाल में अंग्रेजों का एक दल भारत आया था लेकिन उस दल को ऐसी जगहों पर जाने नहीं दिया गया। रोना उन संस्‍कृति के ठेकेदारों पर जाता है जो कहते हैं सच्‍चा धर्म अविरोधी होता है।जिन्‍दों से हमें नफरत हो सकती है लेकिन जो मर गये उनके लिए तो हमारे दिल में अकी़दत होना चाहिए। वे क्‍यों नहीं सोचते है कि विदेशों में हमारे मंदिरों और मस्ज़िदों को इज्‍जत दी जाती है लेकिन अपने प्रदेश की राजधानी में कायम इस ऐतिहासिक कब्रिस्‍तान की दशा पर किसी का ख्‍याल नहीं। इससे ज्‍यादा शर्म की बात क्‍या हो सकती है। अपने ही देश में मुठभेड़ में मारे गये दस्‍युओं की लाशों पर दो-गज़ कफन देकर इज्‍जत दी जाती है क्‍योंकि मालूम है कि उसका शरीर दस्‍यू था। आत्‍मा तो परमात्‍मा का रूप है। फिर भी कब्र या समाधि के प्रति आदर तो होना चाहिए। जफ़र साहब की वह बात दो गज ज़मीं भी न मिल सकी कूएयार मेंको नहीं दोहराना चाहिए। चलते-चलाते यह बात कहना चाहता हूं कि कम से कम इसलिए भी अंग्रेजों के इस पुराने कब्रिस्‍तान का जीर्णोद्धार किया जाना चाहिए। जिससे आने वाली नस्‍लें कुछ समझ सकें, कुछ जान सकें। ईसाई भी तो हमारे अल्‍पसंख्‍यक अंग हैं। उनके साथ न्‍याय जरूर होना चाहिए। मुर्दों की दुआ बड़ी कारगर होती है भाई।

(नोट: (07/08/2008 को स्थानीय हिन्दी दैनिक जनमोर्चा में प्रकाशित)

बुधवार, 6 अगस्त 2008

कीचड़ में खोया गुलबन्द...

राजा तो मैं कभी रहा नहीं। न तो किसी ज्योतिषी ने कभी राजगद्दी पर बैठने की बात बताई है। वैसे उम्मीद पर जिन्दा जरूर हूं कि इत्तिफाक से कोई मिल गया तो शायद राजभोग करने का सौभाग्य प्राप्त हो जाए। उम्मीद इसलिए पुख्ता होती दिखती है कि कल तक जो बेचते थे दवा-ए-दिल वह दुकान अपनी बढ़ा चले और गद्दीनशीन बन कर गुलछर्रे उड़ाने लगे।

बहरहाल सबकी किस्मत अलग-अलग लिखी जाती है। यह लिखने वाले के मूड पर निर्भर करता है। मैं राजा बनूँ या न बनूँ यह अलग बात है पर यह जरूर है कि मुझे अपनी राजधानी से बेपनाह मोहब्बत है। राजधानी से भी ज्यादा मोहब्बत उसके गले में पड़े गुलबन्दनुमा गोमती से है। मोहब्बत के मामले में मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि सौ साल पहले मुझे उससे प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा। एक बार एक मोटे-मुस्टण्डे दरोगा जी ने किसी केस सिलसिले में मुझसे सबूत माँगा तो मैंने बड़ी बेबाकी से जवाब दिया, सर, मोहब्बत ऐसी धड़कन है जो समझाई नहीं जाती। हुजूर दरोगा साहब गुस्ताखी माफ की जाए। आज कल तो अच्छे-अच्छे सबूत झुठला दिए जाते हैं। साहेब बस समझ लीजिए कि मुझे मोहब्बत है, तो है। सबूत तो अपने मरहूम मियाँ मंजनू, महिवाल, रांझा और जूलियट भी नहीं दे पाए तो यह नाचीज़ नामुराद किस खेत की मूली है? जनाब़, जब मियाँ मँजनू को अपनी लैला की गली के कुत्ते भी प्यारे थे तो मुझे अपनी महबूब राजधानी के गले में पड़े गोमतीनुमा गुलबन्द से प्यार क्यों नहीं हो सकता हैं?

मुझे अच्छी तरह पता है कि गुलबन्द का नाम लेने पर मेरे सामने वाली खिड़की से झाँकता हुआ चाँद का कोई टुकड़ा मेरी बैकवर्डी पर हँसते हुए कहेगा कि आजकल नेकलेस का फैशन है। मैं समझ गया कि राजधानी के गले में पड़े गोमतीनुमा गुलबन्द को इसीलिए नेगलेक्ट करते हुए इन कंकरीट के जंगलों में कही छुपाने की ट्रिक खेली जा रही। वे दिन भी क्या दिन थे जब छत्तरमंजिल के सुनहरे छत्तर से टकराती हुए सूरज की सुनहरी किरणें गुलबन्द पर पड़ती थी तो कसम से थोड़ी देर के लिए आँखें चौंधियाँ जाती थीं। ऐसा प्यार उमड़ पड़ता था कि पूछिए मत। लेकिन अब वह बात कहाँ? कंकरीटी जंगल के ऊँचे और भीमकाय पेड़ों में मेरी राजधानी का गोमतीनुमा गुलबन्द न जाने कहाँ गुम हो गया? यह बेज़ान नाचीज ढूंढता फिर रहा है पर उसे पूरी तरह मालूम है कि वह कभी नहीं ढूंढ सकता है। जब बरेली के बाजार में गिरा झुमका नहीं मिल सका तो फिर इस घने जंगल में उसको ढूंढ पाना कितना मुश्किल है? सिर्फ मैं ही नहीं न जाने मेरे जैसे कितने फिदा हुसैन गुहार लगाते रहे मगर अपनी राजधानी के गोमती नुमा गुलबन्द को मटमैले और कीचड़ भरे पानी से निकाल कर उसी पुराने अन्दाज में पहनाने की किसी ने मदद नहीं की? आखिर क्यों? उल्टे उसके लिए ऊँची हवेलियों की आकाश से बातें करती खिड़कियों से जिराफ़ जैसी गरदन निकालें लोग फिकरे कसते हुए गा रहे हैं गुमनाम है कोई, बदनाम है कोई। भला बताइए तो कुदरत ने कितने अरमानों के साथ अपनी महबूब राजधानी के गले में एक अदद खूबसूरत सा गुलबन्द पहना कर रूख्सत किया था मगर खुदगर्जों ने उसकी कीमत नहीं समझी। समझी भी तो सिर्फ कोरे कागज पर।

गुरुवार, 10 जुलाई 2008

यहाँ भी ‘ब्लैकहोल’ हैं।

बताने वाले ब्रह्माण्ड के ठेकेदार बताते हैं कि हजारों की तादाद में वहॉं ब्लैकहोल घूम रहे हैं जो पास आने वाले सितारों को निगलकर अपनी धधकती आग में खाक कर देते हैं यानी उन सितारों का वजूद खत्‍म। शायद इसी को कुछ ने कयामत का नाम दिया और कुछ ने प्रलय कहा होगा। खैर ब्रह्माण्‍ड की बात ब्रह्माण्‍ड वाले जाने। हमने तो अपनी धरती को भी ठीक ने नहीं देखा है। धरती को कौन कहे अपने शहर का भी अच्‍छी तरह दीदार नहीं किया है। अलबत्‍ता बेजुबानी अखबारनवीसों और खबरियां चैनल वालों के इतनी तो जानकारी मिलती है कि ब्रह्माण्‍ड में ही नहीं बल्कि अपने कस्‍बे और शहरों में भी ऐसे ब्‍लैकहोल खुलेआम नंगी आंखों से देखने को मिलते हैं। नासा के काबिल वैज्ञानिक तो कोशिश में लगे हैं कि किसी तरह अपनी पृथ्‍वी को ब्‍लैकहोल से बचा लिया जाए। मगर अपनी आला काबिल पुलिस दूरबीन से भी नहीं देख पाती है शहर, देहात में घूमते ब्‍लैकहोलों को। आये दिन कोई न कोई ग्रह सरेआम इनका शिकार बन जाता है। इन आसपास के ब्‍लैकहोलों को पता तब चलता है जब किसी चमकते सितारे का काम तमाम हो जाता है। दूर के ब्‍लैकहोलों की खोज में वै‍ज्ञानिकों की टीम माथा खपा रही है, लेकिन पास के ब्‍लैकहोलों से बचने बचाने की सिर्फ योजना बनती है। ब्‍लैकहोल के शिकार कभी भोपाल, कभी निठारी तो कभी आरुषि और शशि जैसे सितारे हुआ करते हैं। खैर जो हुआ सो हुआ, आगे क्‍या होगा अभी देखना बाकी है। जबसे सुना है कि सन् 2012 तक अपनी धरती किसी ब्‍लैकहोल का ग्रास बन जाएगी, तब से बड़ी राहत महसूस कर रहा हूं कि न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।
इधर राजधानी के टांग पसारने की बात सुनकर फि‍र एक खौफ समा रहा है कि एक और ब्‍लैकहोल लहलहाते खेतों के साथ लोक संस्‍कृति के विशाल ग्रह को लीलने के लिए बढ़ रहा है, जिसके लिए कभी हिन्‍द को नाज था। दिल बार-बार पूछता है, जिन्‍हें नाज है हिन्‍द पर वो कहां हैं, कहां हैं? जो बड़ी अदा के साथ गांधी, लोहिया और विनोबा के ताल से ताल मिलाकर गाया करते थे ‘अमुवा की डारी पे बोले रे कोयलिया कोई आ रहा है़।’ आता था आता है मेड़ों पर से अपनी लहलहाती फसल को देखते हुए मस्‍ती में गाते, ‘कान्‍धे पे कुदरिया रखले माथे पे पगड़िया धइले, आगे आगे हरा चले पीछे से किसनवा खेतवा जोते रे किसनवा।’ चकाचक के नाम पर पहले ही कंकरीट के ‘ब्‍लैकहोलों’ ने गांव देहात के साथ अन्‍न के भण्‍डार खेतों को लील लिया है। अब जो बचे खुचे लोकगीत लोक संस्‍कृति और धरतीपुत्र हैं उन्‍हें भी राजधानी का ब्‍लैकहोल लीलना चाहता है। शायद यही विकास है। राजधानी बढ़े। गांव खेत छोटे हों और फिर घडि़याली आंसू के साथ रोना कि देश में अन्‍न का संतोषजनक उत्‍पादन नहीं हो रहा है।
ऐसा मत ख्‍वाब में मत सोचिए कि मैं चकाचक चौकन्‍ना करने वाली राजधानी का फैलाव नहीं देखना चाहता हूं। दिन पर दिन खेत की मेड़ों पर संगेमरमरी दीवारे तामीर होती जा रही हैं। खुशी होती है कि चलो सूने दरवाजे पर कुमकुमें तो लटकाए जा रहे हैं। हमारे गांव की गलियों में भले अंधेरा छाया हो मगर राजधानी की जगमगाहट देखकर जरूर खुशी हो रही है कि राजधानी के दरबारियों और आम लोगों में कुछ तो फर्क होना चाहिए। मगर अर्श कहीं ब्‍लैकहोल बनकर फर्श को निगल न ले। फिर कहां मिलेगा प्रेमचन्‍द को होरी? कहां पगुराते दिखाई पड़ेंगे हीरा-मोती? कहां सुनने को मिलेगी ‘झीनी झीनी रे बीनी चदरिया’ और मिर्जापुरी कजरी का आनन्‍द कहां मिलेगा? क्‍योंकि उन्‍हें लील रहे हैं ऊंची हवेलियों में आबाद शानोशौकत वाले सीरियलों के ‘ब्‍लैकहोल।’ हमें तो विशुद्ध आबोहवा वाले गांवों से सौ साल पहले भी प्‍यार था, आज भी है और कल भी रहेगा। चौपालों में बैठ कर रात के बारह बारह बजे तक बतकही करना बहुत भाता था, इसलिए कि वही इस देश प्रदेश की सच्‍ची पहचान है। जमीनी जिन्‍दगी उसी में पलकर उसने राजधानी की चौड़ी सड़कों और संगेमरमरी बारादरी तक पहुंचाया है। वहां पहुंच कर खुद तो ‘ब्‍लैकहोल’ की तरफ खिचे जा रहे हैं। और अब राजधानी का ज्ञानी बनकर गंवई पाती की छाती पर मूंग दल रहे हैं और मक्‍खन का लेप लगा कर जब शहरी ब्‍लैकहोल को गांवों की ओर बढ़ते देखते हैं तो हां में हां मिलाते हुए भूल जाते हैं कि एक दिन उनका भी वजूद मिट सकता है क्‍योंकि ब्‍लैकहोल का खिंचाव होता ही ऐसा है। गांधी, विनोवा, अम्‍बेडकर और लोहिया सबके सब उस ब्‍लैकहोल की भेंट चढ़ जायेंगे। ‘आ बैल मुझे मार वाली’ कहावत चरितार्थ होगी। अभी भी वक्‍त है अपनी लोक संस्‍कृति को बचाने के लिए वरना फिर ब्‍लैकहोल से बचने के लिए कहीं सारे गंवई गाने न लगें ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।’ क्‍योंकि जनता के वजूद से ही देहात, कस्‍बे, शहर, प्रदेश और देश का वजूद होता है।

आपबीती, जगबीती

पहले नानी से कहानी सुनाने की जिद करते थे तो वह हमेशा कहती थीं कि आप बीती सुनाये या जग बीती। बचपन के दिन भी क्‍या दिन थे। आप बीती या जग बीती का मतलब माने कुछ समझ में नहीं आता था। बस धुन तो एक ही कि नानी की जुबानी कहानी सुनते सुनाते मैं भी नानी की गोद में लुढ़क जाता था और नानी भी खर्राटे भरने लगती थी।
बचपन बीता जवानी आयी तो नानी मृत्‍यु की सुहानी चिरनिद्रा में विलीन हो गयीं। तब आपबीती और जगबीती की सीटी अपने आप मेरे कान में बजना शुरू हो गयी। जगबीती में पता चला कि इस पार हमारा भारत है उस पार चीन, जापान देश मध्‍यस्‍थ खड़ा है। दोनों में एशिया का यह प्रदेश। यानी दुनिया के अलग-अलग भाषाओं, धर्मों और जातियों में बंटे हुए लोग जिनमें होड़ लगी है अपनी-अपनी ढपली पर अपना-अपना राग अलापने की। सुनाते हुए सबको देखा कि हम सब एक ही पिता की संतान हैं। प्रश्‍न उठता है कि जब एक ही पिता की हम सब संतान हैं और धरती माता की कोख से जनम लिया है तो बीच में फि‍र भेदभाव की खाई कहां से आ टपकी? शायद इसी को कहते हैं जगबीती।
अब नानी की कहानी में आपबीती की बात भी धीरे-धीरे समझ में आने लगी। एक घर एक परिवार लेकिन उनमें भी कोई मेल मिलाप नहीं। कोई न कोई बुजुर्ग रहा होगा जिसका कुनबा बढ़ते-बढ़ते परिवार बना, राज बना और देश बना। हां यह बात अलग है कोई काला हुआ तो कोई गोरा। कोई विकलांग रहा तो कोई सरपट भागने वाला। किसी ने परिवार के लोगों की सेवा करना अपना कर्त्‍तव्‍य समझा तो दलित कहलाया। जिसने परिवार की सुरक्षा की जिम्‍मा उठाया तो वह शस्‍त्रधारी क्षत्रिय कहलाने पर फूले नहीं समाया। शस्‍त्रों के अध्‍ययन अध्‍यापन में जिन्‍हें इन्‍टरेस्‍ट हुआ उन्‍हें ब्राह्मण की कटेगरी में रखा गया। चलिए आपबीती वाली नानी की कहानी समझ में आयी। बड़े ध्‍यान से समझने के बाद नतीजा निकला कि यह आपबीती वाली कहानी जगबीती की एकदम कार्बन कापी रही। जगबीती में नानी तो नहीं बता सकीं लेकिन जब गुरू जी से शिक्षा लायक हुआ तो पता चला कि चंगेज, हलाकू और सिकन्‍दर अपनी हुकूमत के वित्‍तांत को तानने के लिए उन्‍हीं के खून से होली खेली जो उन्‍हीं के भाई बंधु रहे होंगे। नानी की आपबीती कहानी सुनकर उतनी समझ तो नहीं थी लेकिन यहां भी घर परिवारों की चहारदीवारियों के पीछे सिकन्‍दर कलंदर की कहानी कहते-कहते नानी बेचारी कभी-कभी रूंआसी हो जाया करती थीं। नानी तो नदारद हो गयीं और आपबीती का यह पात्र अपने छोटे से घर परिवार के दायरे में सिमटा हुआ गृहस्‍थी की दहलीज पर खिसकता-खिसकता पहुंच गया, लेकिन वहां सिकन्‍दर और पोरस का घमासान देखने को मिला तो यकीन नहीं होता कि हमें जन्‍म देने वाले एक ही माता पिता रहे होंगे। यहां भी अपना साम्राज्‍य बढ़ाने के लिए इनडायरेक्‍ट संघर्ष। जबकि सबकी जुबानी एक ही बात निकलती है कि सिकन्‍दर भी आया कलंदर भी आया, कोई रहा है न कोई रहेगा। हैरतअंगेज बात तो तब लगती है कि जिस बुजुर्ग ने कुनबे भर को पालने पोसने के लिए न जाने किस मशक्‍कत से जिन्‍दगी दांव पर लगा दी, उसी को पूरा कुनबा सठियाया समझ कर आंखों से ओझल करने की कोशिश करता है। कोर्ट कचेहरी का चक्‍कर लगाते हैं। इस संघर्ष में सब अपने-अपने तवे अलग कर लेते हैं। मगर वो दो तीन बहुओं के रहते हुए बेचारे वृद्ध-वृद्धा को अपना पेट भरने के लिए खुद रसोई की आग में झुलसना पड़ता है। अपना रोना रोवे तो किससे? कोई तो आंसू पोछने वाला होना चाहिए। बहुत पुराना घिसा-पिटा शब्‍द ‘सठिया गया बुड्ढा’ बस सुनकर आपबीती कहानी सुनाने की हिम्‍मत नहीं होती। सरकार ने इंतजाम तो बहुत किए हैं लेकिन वहां पहुंचने के पहले ‘जल में रहकर मगर से डर’ बना रहता है। इसलिए ज्‍यादातर ऐसी कहानियां दुखान्‍त ही होती हैं।
मुझे तो नानी की कहानी जगबीती ही अच्‍छी लगती है क्‍योंकि वहां जो कुछ हुआ है वह डायरेक्‍ट रहा है। ‘आपबीती’ कहानी में जो होता है इनडायरेक्‍ट होता है जिससे औरों को सुनाना भी मुश्किल होता है। इसलिए यहां घुटन ज्‍यादा होती है और जी यही चाहता है कि नानी अपने साथ ही क्‍यों नहीं ले गयीं। आखिर में वहीं पुराना गाना याद आता है ‘चल उड़ जा रे पंछी यह देश हुआ बेगाना’। जिसे यकीनन सबको एक दिन गाते-गाते रोना पड़ेगा। बात निराशावादी जरूर है लेकिन सच्‍चाई यही है और यह घर-घर की कहानी कहकर लोग संतोष कर लेते हैं।

सोमवार, 7 जुलाई 2008

सियासत के साज़ पर बुतों का संगीत

बेज़ान पत्थर से तराशे गए बुतों का जमाना फिर लौट आया है। इस बार बोलते बुतों के दिन बहुरे हैं लेकिन अलग-अलग आन-बान-शान के साथ। अजन्ता, एलोरा और खजुराहों के बुत तो संततराशों की लाख कोशिशों के बावजूद आज तक नहीं बोल सके। मुमकीन है कि गुज़रे जमाने के संततराश बुत को बुत ही रहने देना चाहते हों। वे उन्हे आज के रोबोट नहीं बनाना चाहते हों, जो राजनीति की रागिनी पर थिरक उठें। आँखों ही आँखों में इशारा समझ बैठें।

रविवार, 6 जुलाई 2008

ऊँचा देखो, ऊँचा सुनो

न जाने कब से तमन्ना रही है कि एक घर बनाऊँगा तेरे घर के सामने। अपने लख्ते जिगर रमफेरवा की पुरानी बोतल में नई शराब नुमा माई का सपना रहा है कि एक बंगला बने न्यारा। मगर अपना रमफेरवा जब पड़ोसी से लाया अख़बार जोर-जोर से बाँचते हुए सीमेन्ट, मौरंग, बालू और ईंटो के आसमान छूते भाव बताता है तो पैर के नीचे से बाप दादों के जम़ाने से चली आ रही ज़मीन खिसकती महसूस होती है।
अब देखिए न मैं भी अच्छी खासी चपरासी की नौकरी करता हूँ। जिगर का टुकड़ा रमफेरवा चाट का ठेला लगा कर सौ-पचास रूपये रोज कमा ही लाता है और रही उसके माई की बात तो वह भी घरों का चौका-बरतन कर के कुछ न कुछ ले ही आती है। यानी ‘साथी हाथ बढ़ाना एक अकेला थक जाएगा बढ़ के बोझ उठाना’ वाली बात पर बाकायदा अमल किया जा रहा है। फिर भी ‘ढाक के तीन पात’ वाली बात है। याद है पहले कुछ निम्न तबके वालों को सुना जाता था कि घर भर कमाते हैं तो लोग हँसी उड़ाया करते थे। आज वही बात आम होकर शान समझी जा रही है। सब वक्त की बलिहारी है मगर चारों ओर एक ही शोर सुनाई देता है कि ‘भय्या मँहगाई बहुत बढ़ गयी है।’ अब समझ से परे है कि इतने पर भी सरकारी गैर-सरकारी बँगलो पे बँगले न्यारे बनते चले जा रहे हैं। आखिर कैसे और क्यों? मोटे तौर से बात हँसी के साथ समझ में आती है कि पॉकेट हमारी ओर जगन्नाथ रूपी हाथ उनके। पहले कहावत थी कि ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ पर अब मामला उल्टा हो रहा है।.चलिए, ‘जब आवे सन्तोष धन सब धन धूरि समाना’ उनके घर के सामने अपना घर नहीं बनाया रमफेरवा की माई का सपना ‘इक बँगला बने न्यारा’ सच नहीं हुआ तो क्या हुआ? जिन्हें हमने वोट के ओवरकोट पहना कर भेजा उनकी ख्वाहिशें तो पूरी हो रही है और हमारे लिए है कि हर ख्वाहिश पर हमारा दम निकले। दम तो एक दिन निकलना ही है। आखिर शहर सजेगा तो हमारा भी नाम होगा कि हम फलाँ शहर के वासी हैं। मन की वीणा पर ताल से ताल मिला कर गाने वाले मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि आदमी की सोच सकारात्मक होनी चाहिए। उसे हमेशा आगे बढ़ने के बारे में सोचना चाहिए।
अब बेमौसम की बरसात में सकारात्मक सोच के फटे शामियाने के नीचे बैठे कर सोचते हैं तो बात समझ में आती है। आदमी भी खूब है। कहीं एक चीज़ उसे नीलगगन में उड़ने का आनन्द देती है। कहीं वहीं उड़ान उसे दर्द देती है। मैं ही जब अपने देश या शहर की बाहें फैलाए सड़को, उस पर दौड़ते वाहनों की कतार और आकाश से बातें करती इमारतों को देखता हूँ तो गजब का गर्व होता है और उसी गर्व में कहता हूँ कि यहीं वजह हो सकती है कि खुदा को प्यारे हुए लोग उनसे गिड़गिड़ा कर अरदास करते होगें कि हमें फिर से उसी तरक्की पसन्द मुल्क में वापस भेज दो। ऐसे में कुछ खलनायक टाइप लोग मँहगाई का हवाला देकर उन्हें भड़काते होंगें तो उन खुदा के प्यारे लोगों के ट्रान्सफर और पोस्टिंग की फाइलें दबा कर रख दी जाती होंगी।
उस वक्त के लिए मैं सोचता हूँ कि अगर बतौर मुझे वकील मुकर्रर किया जाता तो मै उनका केस यूँ लड़ता कि मीलार्ड — ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ में सर्वांगीण विकास किया जा रहा है। फिर आदमी का आदमी के लिए और आदमी के द्वारा चीज़ों की कीमतों में तरक्की होने से शिकवा शिकायत क्यों? हर कोई तरक्की पसन्द होता है। हर कोई बढ़त चाहता हैं। चाँद-सितारों की तमन्ना करता है। एक मँजिल से दो मँजिल और दो से तीन मँजिलों वाली बिल्डिंगों पर फील्डिंग करने का मज़ा कुछ और ही होता है। यहाँ के लोगो की तारीफ करना चाहिए के वे निरन्तर ऊपर की ओर देखना पसन्द करते हैं। सबूत है— योर ऑनर कि रावण ने स्वर्ग तक सीढ़ियाँ बनाने की योजना बनाई थी। आज का भी सबूत हुजूर हाजिर है कि हमारे बीच के लोग खेत खलिहानों से आगे बढ़ कर राजधानियों की गगनचुम्बी इमारतों को स्पर्श करने के अरमान सजाये हुए हैं। गोया कि इसी का दूसरा नाम तरक्की है। ऐसे में अगर तरक्की को छूने के लिए कीमतें आगे बढ़ रही हैं तो गुनाह कहना मेरी समझ से दुरूस्त नहीं है? उसे भी बढ़ते रहने का पूरा हक़ है। इन बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगा कर उसे पीछे ढकेलना कहाँ तक इन्साफ हैं? बल्कि उसका नाम गिनीज बुक जैसे ग्रन्थों में नोट किया जाना चाहिए। यह उसके साथ मीलार्ड बहुत गैर इन्साफी होगी कि कुछ मुठ्ठी भर गरीब लोगो के लिए उस पर रोक लगाने की कवायद में समय बरबाद किया जाए। दैट्स ऑल मीलार्ड। इस लिए अगर कीमतें आसमान छू रही हैं तो उन्हें छूने देना चाहिए। बल्कि उनकी हिम्मत अफ़जाई की जानी चाहिए।

चैनलिया चम्पाकली की करामात

बेचारा अपना भज्जी भाई। किरकिट की दुनिया में गिरगिट की तरह रंग क्या बदला कि चैनलों की चम्पाकली को भज्जी की धज्जी उड़ाते देर नहीं लगी। तमाचे को तमंचा बना कर बेचारे को विकेट के पीछे खड़े होकर गाने पर मजबूर कर दिया कि आँधियाँ ग़म की यूँ चली कि बाग़ ही उजड़ कर रह गए भाई वही हाल हुआ कि जो कभी चौके छक्के मार कर लोगों को चौकांता रहा, मिनटों सेकेण्डों में बेचारे के छक्के छूट गए। वाह री दुनिया, वाह रे ज़माने। चैनलों की चम्पाकली ऐसी बदली कि बेचारे को भरी जवानी में वनवासी हो जाना पड़ा। चम्पाकलिया ने ऐसा त्रिया-चरित्तर दिखाया कि अपने हुए पराये, दुश्मन हुआ जमाना। कोई कुछ कहे पर मुझे तो भज्जी की धज्जी उड़ते देख और तमाचे को तमंचा सुनकर जरा भी रास नहीं आ रहा है। जैसे अपने लख्ते जिगर रमफेरवा की माई के जहाँ ऐसी-वैसी बात कान में पड़ी कि मुहल्ले भर में बांट आती है बस वही आदत चैनलिया चम्पाकली की देखने में आई। यहाँ तो अपने रमफेरवा की दुल्हनियां कभी कोपभवन में जा बैठती है तो उसके मायके वालो तक से कोई बात नहीं बताता हूँ क्योंकि भाई जग हंसाई मुझे बिल्कुल नहीं आती है।

अब चम्पाकली के तेज चैनल और किरकिट पर धिरकिट धिन्ना बजाने वालो की बड़ी बात है। उनके मुँह कौन लगे? लेकिन इतना कहने के लिए आत्मा जरूर कहती है कि सबसे पहले चपत, चाँटा, लप्पड़, थप्पड़ और झापड़ में फरक करके कोई कदम उठाना चाहिए। यूँ ही तमाचे को तमँचा नहीं समझ लेना चाहिए। खेल-खेल में तो सब चलता है। बचपन में अपने स्कूल के खेलौड़िया मास्टर ने किसी से मारपीट होने पर डेढ घंटा बैठा कर समझाया था कि बेटा खेल में सब चलता है। हुआ वही कि हाथ मिलाने के बाद दो बार जब मैच खेला तो वही प्यार मोहब्बत से। भूल गये झगड़ा-लड़ाई और लप्पड़-थप्पड़। मास्टर साहब ने गुड़ैहिया जलेबी खिलाते हुये कहा कि इसी को कहते हैं स्पोर्टमैन स्प्रिट।

ताज्जुब तो भाई यह है कि इससे भी बड़े-बड़े काण्ड रोज मुल्क में होते रहते हैं लेकिन न अपनी चैनलिया चम्पाकली को उसे बार-बार दिखाने की फुरसत होती है और न तो किरकिट के दीवान-ए-खास में इन्साफ की इस मुकद्दस तराजू की कसम खाने का वक्त होता है।

अपनी चैनलिया चम्पाकली रोज किसी गरीब की झोपड़ी को उजाड़ कर किसी दबंग द्वारा पंच सितारा होटल तामीर कराने को देखती सुनती है। रोज परीक्षा हाल के बाहर किसी आधुनिक एकलव्य के तमाचे को तंमचा बनाकर किसी मार्डन द्रोणाचार्य के सीने से सटाते देखती है या किसी माननीय को मानवीय मूल्यों को दरकिनार कर भ्रष्ट से भ्रष्ट आचरण करते पाया जाता है। चम्पाकली जोर का झटका धीरे से देकर चुप्पी साध लेती है। बार-बार चैनलिया चम्पाकली वो सब दिखाने के बजाए राखी सांवत और मल्लिका शेरावत का बाइसकोप दिखाना ज्यादा पसन्द आता है। बात धरी की धरी रह जाती है क्योंकि वहाँ ग्लैमर तो होता नहीं। ज्यादा से ज्यादा शस्स्स्स... कोई हैया क्राइम टाइम से लेकर भोंडी कॉमेडी दिखा कर बड़े लोगों द्वारा किए गये क्राइम पर चुपके से पर्दा डालने की कोशिश होती है। रही बात भज्जी की धज्जी उड़ाने की खबर तो उसमें ग्लैमरस रस टपकता है। बात देश-विदेश तक पहुँचती है। चैनलिया चम्पाकली खबरों के खैबर दर्रे में पहुँचने वाली नम्बर वन बन जाती है।

फैसला इतनी जल्दी। फैसला करने के पहले बिना चपत, चाँटा, तमाचा, लप्पड़ और झापड़ में भेद किये या बारीकी समझे संतू के आँसू को अंगारे बना दिया। भज्जी भाई के तमाचे को तमंचा घोषित कर दिया। काश फैसले की यही जल्दबाजी किसी सिपहिया के रिक्शेवाले को लप्पड़ थप्पड़ मारने पर किया जाता। सरकारी सम्पति पर किसी दबंग द्वारा चूना लगाने पर किया जाता तो किसी को काहे का रोना होता। खेल न हुआ रेल के डिब्बे में पड़ी डकैती हो गयी। वहाँ भी मुआवजे का सब्जबाग देख कर फैसले का इन्तज़ार करना होता है।

अपनी तो दिली तमन्ना है कि भज्जी और संतू भय्या अपने बचपन के दिन भुला न दें। समझ बैठे कि रैगिंगजो सरकारी कन्ट्रोल से बाहर है के अन्तर्गत एक सीनियर ने अपने जूनियर को धीरे से एक चपत जड़ दी। अब बड़ों को चैनलिया चम्पाकली की बात में न आकर दोनों को स्पोर्टस मैनस्प्रिट का पाठ पढ़ावे जिससे दुनिया में दोनों ढोल-बाजे ढम-ढम गाते रहें और अपनी कामयाबी का परचम लहराते रहें। किरकिट मैय्या के सामने धा धिरकिट धिन्ना धाकी थाप पर नाचते कूदते रहें।

गुरुवार, 13 मार्च 2008

भैया, काहे का बिलखना...

अपने लख्ते जिगर रमफेरवा की माई को इन दिनों किरकिट का भूत सवार है। जब देखो तब पड़ोसिन बुलाकन बुआ के घर में चिपकी रहती है। अबकी मायके से क्या लौटी एक बल्ला लेकर साथ आयी है। जब सुनिए तब बस धोनी, सचिन की माला जपा करती है। अपने को तो गुल्ली-डण्डा भी ठीक से खेलना नहीं आता पर अपने रमफेरवा की माई का हाल देखकर खुशी जरूर होती है कि सचमुच महिला सशक्तीकरण का युग सिर पर चढ़कर बोल रहा है। माई का यह हाल है। बेटवा यानि रमफेरवा बहिन और भाई जी के पीछे दीवाना बना दारुलशफ़ा में डेरा जमा कर बैठा है। भूख-प्यास को मारिए गोली। अगर मौके दर मौके कुछ कहता भी हूँ तो छक्का मार स्टाइल में जवाब देता है कि बापू अपने नेता लोग महान हैं। अभिनेताओं से कई किलोमीटर आगे हैं। यकीन करना बापू, जो काम ससुरे अंग्रेज़ नहीं कर सके, अपने नेताओं ने कर दिखाया है। वे तो फूट का बीज दो धर्मों के बीच उपजाऊ भूमि पर बोते रह गए, पर अपने पैदाइशी गरीब नेताओं ने जाति, धर्म और सम्प्रदायों के बीच छोटी-छोटी पड़ी जगहों में भी फूट और बेर के पेड़ उगाकर दिखा दिये। यही नहीं बापू, जमाने को फिर से उसी इतिहास की अंधेरी गुफा की तरफ ले जाने की कवायद में जुटे दिखाई दे रहे हैं जहां से कभी हम चले थे। है न आलाकमाल की बात? अब तो उत्तर-दक्षिण के बीच सोते विंध्याचल पर्वत को और ऊंचा करने में जुट गए हैं जो बेचारा कभी किसी मुनि जी से शापित होकर बैठ गया था। अपने जिगर के टुकड़े रमफेरवा की यह बात सुनकर मेरे माथे पर भी बल पड़ गया। सोचने लगा की अगर खुदा न खास्ता विंध्यपर्वत श्रेणियां यूं ही नेताओं की शह पर ऊंची उठती गयीं तो न समन्दर से उठने वाले मानसून उत्तर की तरफ बढ़ सकेगा और न गंगा-जमुनी तहज़ीब की सोंधी बयार दक्खिन के लोगों को खुशहाल बना सकेगीं। यह भी कहावत है कि सबै भूमि गोपाल कीसिर्फ किताबों के पन्नों तक सिमट कर रह जायेंगी।

अफसोस तो जरूर हो रहा है कि जो शिवजी और शिवा जी के वक़्त नहीं हुआ था आज हो रहा है। रमफेरवा ठीकै कहता है कि अपने नेताओं का करिश्मा महान है। मौका पड़ने पर अखण्ड भारत का नक्शा खींचने वाले भी वही हैं और खण्ड-खण्ड में बने स्टेज पर नुक्कड़ नाटक करने वाले भी वही हैं। सब सोचकर अपने लख्ते जिगर से इस महंगाई और बेरोजगारी के जमाने में उसकी पीठ ठोकते हुए कहता हूँ लगे रहो मुन्ना भाई। राम जी कुछ तो भला करेंगे।

अब अपने लख्तेजिगर की किरकिट प्रेमी माई को कुछ कहने की हिम्मत नहीं होती है क्योंकि वहाँ सोनिया जी चैनल पकड़े बैठी हैं और यहाँ माया जी की महामाया का चैनल अलग हड़कम्प मचाए हुए है। कुछ कहिए तो रमफेरवा की माई टका सा जवाब दे बैठती है। अब भी पड़े हो दाल-रोटी के चक्कर में? बस घिसा-पिटा कैसेट बजाया करते हो कि तेल, घी, गेहूं व दाल की महंगाई ने कमर तोड़ डाली है। अजी वह सब बीते ज़माने की बात हो गई है अब तो आने वाली लखटकिया कार, टीवी, फ्रीज को देखते रहे अपने आप पेट भर जाएगा। भला बताओ अपने आला काबिल वित्तमंत्री जी का क्या कहना है? रमफेरवा की माई की बात में दम दिखाई पड़ता है कि जब सब विकास की बुलंदी पर बढ़ रहे हैं तो महँगाई बढ़ने पर हो-हल्ला क्यों हैं रमफेरवा के बापू? फिर हम चाँद पर उतरने का जुगाड़ कर रहे हैं। वहाँ कहाँ तेल, साबुन और दाल-रोटी की ज़रूरत पड़ेगी? अपने लख्तेजिगर रमफेरवा की माई की दलील के आगे चुप रहना बेहतर समझा। किस्मत को कोसते हुए एक बड़े सेठ को गोदाम मे ठूंस-ठूंस कर बोरों को भरते हुए देख रहा हूँ और मेरी भूख के मारे आतें कुलबुला कर रोने पर मजबूर कर रही हैं लेकिन ये आँसू मोती बनने वाले भी तो नहीं है जो लोग लूट लें। यही सब सोचकर नहीं छेड़ता हूँ किसी को कि, चाहे वह टी॰वी देखकर भूख-प्यास भूल जाए या नेताओ की खुशियाँबरदारी में ज़िन्दगी गुज़ार दे। अलबत्ता अपने वित्तमंत्री जी की महानता पर साधुवाद देने को जी चाहता है लेकिन कोई उनकी प्लानिंग दाल-रोटी के आगे समझने को तैयार भी नहीं हो रहा है। आज अगर लोहिया, गांधी और विनोबा होते तो उन्हें भी आज वित्तमंत्री जी के बनियौटी स्कूल मे एडमीशन लेकर दाल-रोटी को आउट ऑफ डेटकहना पड़ता। कुछ दौर ही ऐसा चल रहा है भाई। समझौते की तश्तरी में जो परोसा जा रहा है उसे ही खुदा का शुक्र समझना चाहिए। अपने जिगर के टुकड़े रमफेरवा और उसकी गाँव से उछाल मार कर शहरी सड़क पर कुलांचे भरती माई को देखता हूँ तो सोचता हूँ सचमुच अपना भारत महान है। महान है तब न भोजन सामग्री महँगी और कारे मंदी हो रही है। लेकिन अब तो ससुरे जंगल भी कट चुके है जो पेट की धधकती आग को बुझाने के लिए रामजी की तरह कन्दमूल खा लेते। जय-जय शिवशंकर कि आप विषपान करके नीलकंठ कहलाए। एक हम हैं की दाल-रोटी के लिए बिलख रहें हैं।

नोट: (12/03/2008 को स्थानीय हिन्दी दैनिक जनमोर्चामें प्रकाशित)