'बोलो क्या-क्या खरीदोगे'...? - यहाँ से pdf फ़ाइल में डाउनलोड करिए।
शुक्रवार, 16 जुलाई 2010
बोलो क्या-क्या खरीदोगे...?
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गुरुवार, 29 अप्रैल 2010
हम रोते भी रहे, हँसते भी रहे
गुरुवार, 22 अप्रैल 2010
उनके अँगने में तुम्हारा क्या काम?
'उनके अँगने में तुम्हारा क्या काम?' - यहाँ से pdf फ़ाइल में डाउनलोड करिए।
गुरुवार, 1 अप्रैल 2010
भारत में फिरंगी महल
गुरुवार, 18 मार्च 2010
अब नाम का ज़माना है
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शुक्रवार, 12 मार्च 2010
पुरुष मानसिकता से जूझती महिलाएँ
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शनिवार, 13 फ़रवरी 2010
आली जनाबों की बल्ले-बल्ले
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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009
दिमाग़ का फितूर
2- कहा जाता है कि जनतंत्र में सभी समान होते हैं। भारतीय संविधान अपनी भूमिका में तस्दीक करता है। वहां किसी प्रकार की शैक्षणिक या तकनीकी योग्यता निर्धारित नहीं की गयी है। मगर लगता है कि वे सारी बातें संविधान के सफों तक ही सिमट कर रख दी गयी हैं। हर चुनाव में बस वही घिसे-पिटे और हर तरह से साधन-सम्पन्न चेहरों को उम्मीदवारी के लिये हरी झंडी दिखायी जाती है बल्कि अगर गुस्ताखी माफ हो तो कहना बेजा नहीं होगा कि टिकटों की खुलेआम नीलाशायमी की जाती है। ऐसे मे स्वाभाविक है कि जिनके पास धन, छल और बल हो। इस तरह के जनतंत्र में किसी रमफेरवा और किसी जुम्मन मियां को कौन पूछने वाला है जो जमीन से जुड़े रहने के बावजूद जनतंत्र की ज़मीन से महरूम समझे जाते हैं। शायद यहां वंश परम्परा का चलन तो है मगर रिटायरमेन्ट का कोई प्रावधान नहीं है।
3- दहेजप्रथा के जड़ से उन्मूलन के लिये रोज कानून की क़वायदे होती देखी जाती हैं। अनेक स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा अभिनीत नुक्कड़ नाटकों को प्रचार का माध्यम बनाया जाता है। फिल्मों के बोतल में दहेज-भूत को जलाने का दृश्य प्रस्तुत कर के भुक्तभोगियों को तसल्ली दी जाती है पर ताज्जुब होता है कि यह खून चूसने वाले पिशाच से समाज को निजात क्यों नहीं मिल पा रही है। शायद इसलिये कि क़ानून बनाने वाले सम्भ्रान्त लोग इस आतंकवाद को खतम नहीं करना चाह रहे हैं क्योंकि पुत्र होने पर वह गहरी नींद में खो जाते हैं और पुत्री के समय वे जाग कर देखे हुये नुक्कड़ नाटक के दृश्य अच्छे लगते है। वाह ऐसे समाज का क्या कहना।
सोमवार, 29 दिसंबर 2008
किस्सा-ए-बैकडोर
कई वर्षो पहले की बात है। गया का शर्मा होटल पूरे बिहार में प्रसिद्ध था। खूब टिपटाप। काफी फसकिलास किस्म के लोग अपना मनपसन्द खाना खाने वहां जाया करते थे। चन्दन-तिलक लगा और झकाझक श्वेतवस्त्र धारण करके स्वयं श्रीमान शर्माजी अपनी गद्दी पर विराजमान रहा करते थे। इत्तिफाक से एकदिन किसी यात्री की थाली में छोटी-छोटी मुलायम उँगलिया मसालेदार शोरबे में मिलीं तो हड़कम्प मचगया। रातोंरात गया का शर्मा होटल सुपरस्टार बनकर चर्चा का विषय बन उठा। काफी तहकीकात के बाद होटल के बैकडोर में एक ऐसे कुँये का पता चला जो अत्यन्त मासूम बच्चों की लाशों से पटा पड़ा था। न जाने कब से बैकडोर से यात्रियों की चमचमाती थाली में मासूमों का मांस परोसा जा रहा था। मासूम मैना किस्सा सुनकर चिहुंक उठी। तोतेचश्म तोता बोला, अरे मेरी प्यारी अनारकली एक बिहार के शर्मा होटल के बैकडोर का किस्सा सुनकर तुम दहल उठी। ज़रदारी की तरह कितना कमज़ोर दिल है तुम्हारा। मैना प्रिये, उस दिन राजधानी के आँचल में आबाद नोयडा के निठारी काण्ड को हाईलाइट करने में तो तुम खूब फुदक-फुदककर चैनलवालों को जोश दिला रही थी। क्यों। अरे इसमें चिहुँक उठने की क्या बात है मेरी हीर, मैं हूँ न। हॉ यह जरूर है कि भोपालवालों की तरह निठारीवालो को भी बैकडोर मे पकती खिचड़ी के स्वाद से महरूम रहना पड़ रहाहै।
आजकल चन्द्रकान्ता संतति की तरह किस्सा-ए-बैकडोर को पढ़ना लोग खूब पसन्द कर रहे हैं। है भी रास्ता बैकडोर का बड़ा दिलचस्प। रास्ता वैसे है तो जरा घुमावदार, पर थोड़ी सी कोशिश करने पर मनचाही मंजिल मिलते देर नहीं लगती है। मैना मन ही मन प्रफ्फुलित होकर बैकडोर के और भी दिलचस्प किस्से सुनने के लिये मचल उठी। तोताराम ने ऐसे किस्सो का पुलिन्दा खोलना शुरू कर दिया। मेरी हमदम प्यारी मैना आम लोग तो इलेक्शन हार जाने के बाद ठिसुआ कर बैठ जाते हैं पर जिनमें जरा भी दम-खम और बैकडोर की चक्करदार सुरंग में धंसने की फितरत होती है वह बैकडोर से पहुंच जाते है अपर हाउस की चौखट तक। इम्तहान में फेल होने पर भी प्रथम श्रेणी के कालम में उनका नाम छप जाता है। और भी दिलचस्प किस्सा यह है कि सफेदपोशी के बैकडोर से वे प्रदेश के माफिया होने का तमग़ा हासिल कर रातोंरात सुपरस्टार बन जाते हैं। बड़े अजीब अजीब किस्से हैं। सुनाने लगेंगे तो ज़िन्दगी तमाम हो जायेगी मैना। अब देखो न, मुल्क में तमाम बेरोजगार मुंशीपल्टी की ऊबड़-खाबड़ सड़क पर रोजगार की तलाश मे भटकते नज़र आते हैं। कर्जा-पानी लेकर आवेदन-पत्र भरते हैं। पर पेपर आउट होने के हंगामे से सिर्फ निराशा हाथ लगती है। लेकिन बैकडोर का करेक्ट पता जिन्हे मिल जाता है वे सरकारी दामाद बनकर मौज मारते दिखायी देते हैं। कभी किसी की नज़र में चढ़ गये और हो-हल्ला मचा तो मुअत्तली के मुहाफिजखाने में जमा करा दिये जाते है। मगर भला हो बैकडोर का कि बैकडोर से उनकी फाइल न जाने कहाँ चोखा-बाटी खाने चली जाती है। इंक्वायरी आफिस खोल दिया जाता है, कमीशन की कबूतरबाज़ी चलती है और मेरी दिलोजान से प्यारी मैना, उधर बैकडोर में चिकन-बिरयानी पकती रहती है बिल्कुल गया के शर्मा होटल की तरह। तोते मियाँ ने एक बार गर्दन घुमाकर उधर जेल की चहारदीवारियों के पार देखा तो बड़े तरून्नुम से अपनी मैना का दिल जीतने के लिये कहा लो बैकडोर का एक और किस्सा याद आ रहा है। मैना फुदक कर उसी डाल पर बैठी जिस पर तोता बैठा था। उसने धीरे से तोते के कान में कहा, प्रियतम यह लोग तो वही नामुराद लोग हैं जो गाँव के गरीब लोगों की बहू-बेटियों की सरेराह इज्ज़त लूटी थी। अरे यही तो मैं भी बता रहा था। गौर से देखो कैसी मस्ती उड़ा रहे है। हम जैसे निरीह प्राणी पिंजड़े के नाम से कांपने लगते है पर इनके लिये तो जेल नहीं किरकिट का खेल है। तोते ने मैना की बात छीन कर कहा य़ह सब कमाल बैकडोर का है मेरी सोनिये। जब कभी जनपद के ज़िल्लेदारों की जमात जागती है तो अखबारनवीसों को इकठ्ठा करके लाइन क्लीयर का गुडफील करा दिया जाता है, काग़ज़ की कश्ती में सबकुछ सुरक्षित बता कर समीक्षा कर दी जाती है लेकिन बैकडोर से गाना बजता रहता है सब गोलमाल है भाई सब गोलमाल है। समझ में आया कुछ मेरी भोली मैना। यही समझ लो कि सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का। कहाँ-कहाँ किस्सा-ए-बैकडोर की हक़ीक़त जानने के लिये माथा खपाती फिरोगी। बैकडोर का किस्सा अगर सुनाया जाये तो सास भी कभी बहू थी के एपीसोडों की तरह खिचता चला जाएगा। बैकडोर के लिये सुना जाता है कि सागर-मन्थन के समय यह भी एक अमूल्य रत्न निकला था जिसे बाद में अलादीन के जादुई चिराग़ की तरह एक हैरतअंगेज़ चिराग़ बनाकर हिन्दुस्तान की जम्हूरियत के पार जाने के लिये हिफाज़त से रख दिया गया था। कल तक शान्ति, न्याय और भाईचारे के नाम पर गले मिलने वालो ने ताबड़तोड़ कई धमाके किये तो उठते जानलेवा धुयें मे न रहा तोता, न रही मैना। रह गया ब्लैकहोलों की तरह बस बैकडोर जिसमें आज भी कुछ लोग तन्दूर में रोटी सेंकते नज़र आ रहे हैं। कौन पूछता है तोता-मैना की कहानी।
बुधवार, 24 दिसंबर 2008
कहानी की कथावस्तु
सोमवार, 8 दिसंबर 2008
आखिर क्या चाहते हैं आतंकवादी?
शनिवार, 6 दिसंबर 2008
लाश वही, कफ़न बदला है
युग बदला। समय के साज़ पर नवगीत की नयी तान छिड़ी। खोटे सिक्को की खनक से ध्यान हटा। नये चमकदार सिक्कों पर ध्यान जमा। किसी ने ठीक ही कहा था कि नये सिक्के पुराने सिक्कों को चलन से दूर कर देते हैं। अब यही बात अपने ही लिखित एक नाटक के उस संवाद से सिद्ध हो जाती है जिसे नाटक के एक पात्र जोसेफ द्वारा कहलाया जाता है —"सैकरीफाइस करने वाले हिस्ट्री के पन्नों में खोगये और जो बचे भी हैं वे गन्दी सी बस्ती के टूटे से घर में जिन्दगी की आखिरी घड़ियाँ गिन रहे हैं।" क़ाबिलों के क़बीलेवाले अक्सर कहा करते हैं कि इतिहास के पन्ने हमेशा अपने आगोश में पुरानी यादों को ज़िन्दा रखते हैं। पर आजकल वे सब सिर्फ किताबी बातें रह गई हैं।
इतिहास की बात उठती है तो सिकन्दर से लेकर सामन्ती-सरबराहों की बहुत याद आतीहैं। उनके अकूत खजाने की कहानियाँ, ऊँची हवेलियों का तामीरी-शौक और ज़ुल्मोसितम की दिल दहलाने वाली हनक आज भी याद आती हैं। फर्क बस इतना है कि उस ज़माने में गद्दीनशीन होने के लिये बाकायदा तिलक किये जाने की रस्म का चलन था पर आज तिलक नहीं सिर्फ एक अदद काग़ज यानी बैलेटपेपर की जरूरत होती है। भगवान भला करे उनका जिन्होने इतिहास के पन्नों की हिफ़ाजत के लिये दिलकश जिल्द बदल कर पुरानी किताबो को अपनी मेज़ पर सजा रखा है। वही पुराने पन्ने, वही पुरानी तस्वीरें और वही शाही- खिलत में रोबीले नाक-नक्श वाले तख्तनशीन शाह से लेकर शंहशाह तक। कोई माने या न माने अपने को पक्का यकी़न हो गया है कि हक़ीक़त में ज़माना तब्दीलियो के आगोश में खेल रहा है। आदि मानव पथरीली चट्टानों और बियाबान जँगलात को पार करता हुआ आज के कंकरीटी और इस्पाती जंगलो मे ठहर कर अपना बसेरा बसाने की धुन में पागल हुआ दिख रहा है। इस लम्बे बहुत लम्बे सफर में कुदरत ने उसके नाक-नक्श में भी बहुत से परिवर्तन कर डाले मगर उसके ईगो में कोई फर्क नहीं आया। राजतंत्र से क़दम बढ़ाते हुये उसने प्रजातंत्र की चौखट पर पहुँचकर अपने को बहुत खुशनसीब समझा पर उसके अन्दर बैठा किसी शहंशाह का वजूद नहीं बदल सका। दूसरी तरफ लाचार बेसहारा ईगोरहित मज़बूर बिलबिलाते इन्सानी कीड़े दिखाई देते हैं। जिनका वजूद सिर्फ इन्सानी खाल में दबा-कुचला छुपा होता है। आखिर में मजबूर होकर कहना पड़ता है कि ‘लाश वही है सिर्फ कफन बदला’ है। यह सही है कि राक्षसी प्रव्रृत्ति वाले राजा और शहंशाह जमींदोज़ हो गये मगर उनकी नापाक रूहें आज भी आदम की अहंकारी औलादों के भीतर किसी कोने में बैठी वही पुरानी हनकभरी शानशौकत की याद दिलाया करती हैं। बस फर्क इतना सा है कि उस वक्त दुधारी शमशीर देखकर प्रजा नाम की चिड़िया अपने घोंसले में दुपक जाया करती थी और आज जनता हिम्मत के साथ पंख फड़फड़ाकर उड़ने का जतन तो करती है मगर थक-हार कर किसी कोने में मुँह छुपाने की जुगत में बेसुध दिखती है। लेकिन वहाँ भी गोली-बन्दूक से लैस शिकारी अपनी नापाक फितरत से बाज नहीं आते हैं — कभी किसी जाति विशेष का मुखौटा लगा कर, कभी किसी खास धर्म-मज़हब की दुहाई देकर और कभी किसी खासमखास प्रान्त की कँटीली झाड़ियो में छुपकर। प्रजा नाम की हरदिलअज़ीज़ भोली-भाली पंख फड़फड़ाती चिड़िया को जनता नाम से जन्नत का लालच देकर सियासत के खूबसूरत पिंजड़े में कै़द कर लिया गया। नतीजा यह है कि न उसे सरसब्ज डालियों पर फुदकने का मौका मिला और न परवाज़ करते हुये जन्नत का लुत्फ उठाने का। मौजूदा शाहो- शंहशाहो का तुर्रा यह कि हम अपनी जान देकर भी तुम्हारी हर मुमकिन हिफाज़त करने से पीछे नहीं हटेंगे। फटेहाल और गूंगी जनता के बीच जब कोई चिल्लाता है ‘कसमें,वादे, प्यार-वफा सब झूठे हैं, झूठों का क्या’ तो लोग उसे पागल दीवाना मानकर टाल जाते हैं या किसी पागलखाने के सीखचों के भीतर ढकेल देते हैं।
प्रजा का बदबूदार चेहरा बदल कर जनता को बेपनाह हसीन मेकअप चढ़ाया तो गया और उसे सियासती शामियाने मे सामने पड़े सोफों पर बैठाकर फोटो पर फोटो खीचते हुये दुनिया को बताने की पुरजोर कोशिश की गयी है कि यह जनयुग है और आज सबकुछ जनता के लिये, जनता का, जनता के जरिये चल रहा है पर जब अधर्मी कारबाइनों से आतंकी नापाक गोलियाँ बरसती हैं तो सीधे जनता के सीने को छेदती है। क्योकि उन गोलियां उगलती मरदूद कारबाइनों के सामने होती है सीधी-सादी निहत्थी जनता। रही आधुनिक शाहो-शंहशाहो की बात तो रूप उनका चाहे जो भी बदल गया हो पर आदतन शाही लबादा और मखमली जूतियाँ पहनने में देर लगना स्वाभाविक है।
विश्वामित्र से लेकर बुश तक ने आतंकवाद को नेस्तनाबूद करने के लिये न जाने क्या-क्या दाँव-पेंच चलाये और राजाओ-महाराजाओ ने प्रजा की रक्षा के लिये कभी-कभी तुष्टिकरण-नीति के अन्तर्गत सन्धि का सरगम भी अलापा मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात जैसा हासिल हुआ। फर्क इतना जरूर हुआ कि विश्वामित्र के समय में डिस्टर्ब करने लिये मारीच जैसे आतंकवादी समाज के भले लोगों के बीच राक्षस कहे जाते थे और आज के सभ्यता की बुलन्दी को धराशायी करने का नापाक खेल खेलने वाले उग्रवादी या आतंकवादी। मतलब यह कि ‘लाश वही है सिर्फ कफ़न बदल गया है।’ महाबली रावण से लेकर नादिरशाह, अब्दाली, हलाकू और चंगेज़ी जलाल ने निर्दोषो का कत्लेआम भी किया बिल्कुल डायरेक्ट नरेशन में लेकिन आज के आतंकवादी तो इनडायरेक्ट नरेशन में कब किसके हवनकुंड में अंडों के साथ कूद पड़ेंगे कुछ पता नहीं और हमारी रक्षा के कसमें-वादे खाने वाले इसी उधेड़बुन में पड़े उँघते दिखायी देते है कि लाठी भी न टूटे, साँप भी मर जाये। मेरा अपना ख्याल है कि राक्षसी-प्रवृति तब भी थी, आज भी है और कल भी रह सकती है। रूप भले अलग-अलग हो। न जाने कब देवासुर-संग्राम के लिये रणभेरी बजे। अभी तो यही सोच बनती है कि वक्त के अनुसार सबके सिर्फ आज कफ़न बदल गये हैं, लाश वही पुरानी सड़ी-गली है। लाश राजा-महाराजाओ की भी हो सकती है और आज के महाराक्षसों की भी।
मंगलवार, 2 दिसंबर 2008
पीता नहीं हूं, पिलायी गयी है
पहले लोग भंग की तरंग मे ‘जय-जय शिवशंकर कांटा गड़े न कंकड़’ गाते हुये झूमते दिखायी देते थे और दम मारों दम चिल्लाते हुये अलखनिरंजन की अलख जगाया करते थे। गजब की मस्ती देखने को मिलती थी पर अब क्या खूब बहकती बातों के साथ बहकते क़दम की दिलफरेब सीन देखने को मिला करेगी। वैसे भी देशी-विदेशी पीने के बाद अंगरेज़ी अपने आप दुरूस्त हो जाती है। सींकिया पहलवान के बदन पर भी मांस के लोथड़े यूं चढ़ जाते हैं कि बड़े-बड़े जिम जाने वाले बौने नज़र आते हैं। यह सब कमाल होगा शराब की खपत बढ़ाने और राजस्व में इज़ाफा होने पर जैसा कि बकौल आबकारी अफ्सरान के सुनने में आ रहा है। चलिये एक बात जेहन में आती है कि आल्हा-ऊदल के ज़माने में बिन पिये ही शादी-ब्याह के मौको पर शमशीरें लहू से अपनी प्यास बुझाया करती थीं मगर अब इस तालीमयाफ्ता अत्याधुनिक युग में देशी-विदेशी छक कर पीने पर शमशीरों की जगह गोली-बन्दूकें अपनी प्यास बुझाती दिखेंगी। ऐसे नाजुक मौको पर बेचारी अपनी पुलिसिया बिरादरी तमाशबीन बनी देखती रहेगी, क्योंकि मामला आड़े हाथों आ जायेगा राजस्व का। मेरे जैसे घनचक्कर तौबा तोड़ने वाले झूमते हुए शामियाने के बाहर गाते दिखेंगे ‘मुझे दुनियावालों शराबी न समझो, पीता नहीं हूं पिलाई गयी है।’ मद्यनिषेध और नशाबन्दी का पहाड़ा पढ़ने वाले कंठी-माला के साथ हड़ताल की करताल बजाते हुये गाते रहें कि बदली-बदली मेरी सरकार नज़र आती है मगर राजस्व बढ़ाने के शोर-शराबे में सब गुम होकर रह जायेगा। शाबाश, ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ राजस्व का रस्सा खींचने में। अब भूल जाना ही बेहतर होगा कि इस देश की माटी सोना उगले, उगले हीरे-मोती। भय्या अब दारू की दरिया मे गुसुल करने की आदत डालना होगा।
शनिवार, 15 नवंबर 2008
बीमारी ठहर के समझने की
इसी तरह जब सुनने में आता है कि फलाँ को मरणोपरान्त मुल्क के सबसे बड़े इनाम-इकराम से नवाज़ा जा रहा है तो ठठाकर हंसने को जी चाहता है। भाई कमाल है कि रहती जिन्दगी तक उसकी क़ाबिलयत तौलने के लिये किसी को तराजू का बटखरा नहीं मिला। तभी तो शायद किसी को याद आया होगा—‘जीना मरना तेरी गली में’, मरने के बाद चर्चा होगा तेरी गली में। है न कमाल की बात कि किसी की प्रतिभा को नवाजने की याद तब आती है जब कोई कब्रिस्तान की चौखट लाँघकर रूहपोश होजाता है। कुछ दिन पहले इसी तरह अपनी गोमती की याद कुछ लोगो को आई तो जुट गये अफसर से लेकर मातहत तक झाड़ू-पंजे के साथ। उत्तम-प्रदेश की लाडली गोमती के दिन बहुरने का सपना देखकर मन-मयूर चिड़ियाघर में नाच उठा। अखबार और चैनलवालों ने फोटू के साथ खूब रेवड़ियाँ बाँटी। आगे सन्नाटे में किसी ने कहा अब एक छोटे से ब्रेक के बाद। इसी तरह अब कनाटप्लेस पर कनकौवे उड़ानेवालों को गंगा मैय्या के प्रति प्यार जागा है। भगवान उनका भला करे। चलिये इसी बहाने एक और आयोग बना। कुछ अपनों के काम का जुगाड़ तो हुआ। अपने राम तो लालू भय्या को दाद देने के लिये छटपटा रहे हैं कि कम से कम अपनी लौह-पट्टिका में गंगा-गोमती दोनो को समोहित करके अपने सच्चे प्यार की ढफली बजा डाली।
लोग उनकी पवित्र धाराओ में अवगाहन करते हुये अपनी यात्रा पूर्ण करके प्रफुल्लित होते हैं। अब जमुना किनारे राजमहलों मे रहने वालों को गंगा मैय्या को पीयरी चढ़ाने की याद आ रही है। चलिये याद तो आयी। कोई बात नही। देर आये दुरूस्त आये। मुमकिन है भय्या ओबामा के गले में बजरंगबली की फोटू देखकर शर्म महसूस हुई हो कि हम जब भारत के रहने वाले हैं, भारत के गीत सुनाते हैं तो फिर क्यों न अपने देवी-देवता और पतित पावनी नदियों के प्रति आस्था प्रकट करें। अजी हम तो सोच-सोच कर परेशान हुये जा रहे हैं कि यह कौन सी ठहर कर समझने की बीमारी पीछे पड़ गयी है।
अपने उत्तम प्रदेश की बात तो सबसे निराली है। अब मार्क करने वाली बात यह है कि कोई अनाज घोटाला हुआ था सन् 2004-05 के दरम्यान पर उसके भूत ने सपना दिखाया 2008 के आखिरी पहर में। राजधानी के एयरकन्डीशन्ड रूम में चैन की नींद में चिहुँक कर उठ बैठना और उस वक्त की दीमक खायी फाइलों को ढूँढना वाजिब है। क्योंकि उसी आधार पर कटघरे की चाभी का गुच्छा मुमकिन होगा। इससे दो बातें होंगी। एक तो गड़े मुर्दे निकालने में टाइम-पास होगा, दूसरे टेढ़ी नज़र वालों का मुँह काला करने का मौका मिल जायेगा। इसी तरह सब धान बाइस पसेरी के पलड़े पर लोग खाकी वर्दी में दूल्हा मियाँ बनाये गये कब मगर अब गौने के वक्त याद आया कि वह सामूहिक शादी ग़लत थी। असल में इसमे दोष किसी का नहीं है। दोष अगर है तो बस उस पुरानी बीमारी का जिसमें ठहर कर बात समझने की होती है। बुखार आया था एक महीने पहले पर इलाज के लिये हकीम साहब को ढूँढने निकले आज। कुछ लोगो की आदत होती है जबरदस्ती की बीमारी पाले रहने की जिससे दूसरे लोग कोई जरूरी काम न बता दें।
आजकल मुल्क में राजभय्या का जलवा अपने शबाब पर दिखाई दे रहा है। हर खबरनवीस और चैनलिया चचाजान राजभय्या को चमकाने में लगे हैं। उधर पुतला फूँकने और रिजाइन देने का तमाशा भी खूब चल रहा है। पर जमुना पार वालों को अभी कुछ समझ में नहीं आ रहा है। शायद यही समझने समझाने के लिये गंगा मैय्या को चुनरी चढ़ाने का स्वांग रचा जा रहा है। राष्ट्रीयता की ‘झीनी-झीनी रे बीनी चुनरिया’। लेकिन अपने राजभय्या को वह गाना याद नहीं आ रहा है कि ‘मेरा नाम राजू घराना अनाम, बहती है गंगा जहाँ मेरा धाम’। यह तो बात सच मानना चाहिये कि समझ में आयेगा मगर ज़रा ठहर कर। क्या किया जाये अपने देश में मौसम ही कुछ ऐसा चल रहा है।
कलम को कबूतर समझकर उड़ाते हुये अभी गाना ही शुरू किया था कबूतर जा जा जा...तभी नुक्कड़ वाले मीर साहब अपने जनाब मीरसाहब मरहूम वज़ीरेतालीम ‘मौलाना अबुल कलाम आज़ाद’ के यौमे-सालगिरह के जश्न में शिरकत करने जा रहे हैं। ढेर सारी अपनी शुभकामनाँये मीरसाहब के हवाले करने के बाद सोचने लगा कि लगभग पचास सालों के बाद अचानक मौलाना की याद मीरसाहब को कैसे दीवाना बना रही है। फिर अपने-आप नीली छतरी वाले ने मेरे थके दिमाग़ के दरवाज़े से झाँकते हुये समझाया कि समझ का फेरा है। बात समझ में तो आती मगर ज़रा ठहर कर। अब जब बीमारी लग ही गई तो कोई क्या कर सकता है।
रविवार, 2 नवंबर 2008
क्या हम क़बीले-युग की तरफ लौट रहे है...?
शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2008
खिचड़ी भोज का लुत्फ
अब रही अपनी बात तो वह अलग है। मैं तो अपनी घोंसलेनुमा घर में फटा कम्बल ओढ़े आज के खिचड़ी-भोजों और टूटी खटिया पर पड़े-पड़े महसूस करता हूं कि इस बदलते मौसम में पूरा का पूरा मुल्क खिचड़ी मय हो गया है। बस डर है तो बस ‘कोल्ड डायरिया’ का। किंतु सपने भी देखता हूं तो खिचड़ी का, खिचड़ी खाने का और बनाने का। किसी कम्बल बांटने वाले का शोर शराबा और गश्त करते पुलिस वालों के डंडों की ठक-ठक सुनकर पक्का यकीन हो जाता है कि सचमुच मैं एक खिचड़ी युग में जी रहा हूं। मैं तो भाई यही ‘फील’ कर रहा हूं और अपने विचार से ठीक ही फील कर रहा हूं क्योंकि बहुत से इबादत गाहों में आज भी खिचड़ी का बोलबाला है। काफी समझबूझ कर खिचड़ी भोग लगाने और भक्तों को प्रसाद स्वरूप बांटने का सिस्टम अपनाया गया है। अब यही समझने की बात है कि पहले किसी-किसी के घर कभी-कभार खिचड़ी पका करती थी लेकिन आज तो पूरा देश खिचड़ी का शौकीन दिख रहा है। मेरी समझ से यह खिचड़ी युग चल रहा है। हर जगह चाहे देश हो या प्रदेश सब जगह खिचड़ी परोसी जा रही है। पहले तो दाल अलग और भात अलग परोसने का रिवाज था। यानी राजा-प्रजा के बीच एक स्पष्ट रेखा खिंची होती थी। वह था सामंतवादी या राजशाही का जमाना। उसके बाद लोगों के मिजाज में परिवर्तन आया। भात फैलाकर उस पर छौंकी बघारी दाल के साथ सब्जी या सलाद वगैरह लेकर खाने का रिवाज शुरू किया गया। इस नए अंदाज को लोगों ने पूंजीवादी प्रवृति का नाम दिया। कभी अपने मीर साहब के मिजाज का आलम यह था कि विदेशी मक्खन के बिना निवाला उनके गले के नीचे नहीं खिसकता था। नए जोश और पुराने इतिहास का वास्ता देकर लोगों ने महाराणा प्रताप की तर्ज पर घास की रोटियां खाने का ड्रामा पेश करना शुरू कर दिया। जिन्हें चुपड़ी रोटी और बिरय़ानी हजम नहीं हो सकती उन्होंने दलील देना शुरू कर दिया कि भारत गरीबों का देश है। इसलिए समाजवादी आंगन में पत्तल पर रूखी सूखी खाने का रिवाज अपनाया था। सोचा चलो किसी को हम गरीबों की फिक्र तो हुई। पर कुछ खास लोगों के सामने सिर्फ नाम का पत्तल बिछाया गया जिस पर परोसी जाने लगी तहरीनुमा खिचड़ी और खिचड़ी के संग उसके तीन यार पापड़, दही घी, अचार। इसी तरह एक ही मुल्क में एक साथ सामंतवाद, पूंजीवाद और समाजवाद की खिचड़ी से सब खिचड़ीमय हो रहा है। कहीं गरीबों के देश में समाजवाद का सीन देखते-देखते गरीबों नें खुदकशी करनी शुरू कर दी और कहीं सिन सिनाकी की बुबलाबू के बोनट पर बैठकर सारे शहर को जलता हुआ देखकर बांसुरी बजाने का शौक चर्राने लगा। यानी सब कुछ बिलकुल खिचड़ी की तरह। ढूंढते रह जाइए दाल के दाने चावल और मटर बिलकुल उसी तरह जैसे आजकल की मसाला फिल्में। पहले हीरो-हीरोइन, कामेडीयन और विलेन अलग-अलग होते थे पर आज सब कुछ एक ही हीरों में देखने को मिलने लगा है। भगवान भला करे, ऐसी खिचड़ी खाकर डकार लेने वालों का। यहां तो मोहल्ले के आवारा लौंडे चिढा़ते हुए कहते हैं, ‘आधी रोटी बासी दाल, खा ले बेटा बाबूलाल’।
बुधवार, 8 अक्टूबर 2008
जम्बूरे का तमाशा
उस्ताद।" "अबे, अभी तो तू कालीदास मार्ग तक भला चंगा था। यहां तेरी तबीयत को अचानक क्या हो गया?" "जम्बूरे।" "उस्ताद, तबियत बिल्कुल चकाचक है। असल में विधान सभा की तरफ से आती हुई ठण्डी हवा ने तबियत मस्त कर दिया है। उस्ताद कसम से यह चीज़ बड़ी है मस्त-मस्त।" "अबे वो सब तो ठीक है मगर इत्ता पुराना...? "उस्ताद, मुझे पुराने गाने, पुरानी चीज़े जैसे पुरानी चढ्ठी पुरानी बनियाइने, पुरानी चप्पलें वगैरह बहुत पसंद हैं।" "अबे फिर कबाड़ी क्यों नहीं बन जाता?" "उस्ताद, कई बार सोचा तो मगर वहाँ भी बड़े-बड़े लोगों ने अड्डे जमा लिए हैं। फिर उस्ताद वहाँ भी वे सब पुरानी चीजें कहाँ बिकती हैं। अब तो वहाँ कट्टा, बंदूके, गोले-बारूद खरीदे-बेचे जाते हैं। ‘जम्बूरे।’ ‘हाँ उस्ताद।’ ‘जो मांग होगी वही तो बिकेगा? अब तू गांधी छाप पुरानी ऐनक, चप्पल और खद्दर वगैरह ढूंढगा तो कहां मिलेगा? नक्खास भी अब वह नक्खास नहीं रहा बेटा।’ ‘उस्ताद कसम हाट शॉट डॉट कॉम की मुझे इस कैपिटल से बहुत लगाव है।’ ‘अबे इसी पुराने सिनेमा कैपिटल से?’ ‘हाँ उस्ताद बित्तीभर का था। दादा मरहूम कांधे पर बैठा कर यहां अंग्रेजी फिलिम दिखाने लाते थे। कसम से क्या जलवा था इसका?’ ‘बेटा जम्बूरे अब तो इसमें गरमागरम ख़ुदा के वास्ते फ्री का नाम मत लो। इसी सड़क पर कभी फ्री साड़ियां बांटी गई थी। मेरी अम्मी भी आई थीं। साड़ी के चक्कर में उस्ताद अम्मी जान पसलियां तुड़वा बैठी। अभी तक बिस्तर पर पड़ी है। इसी तरह एक बार रैली के बहाने लखनऊ घूमने के चक्कर में बरेली से आए अपने खालूजान प्लेटफारम पर भगदड़ में ऐसे गिरे कि उठने को कौन कहे सीधे अल्लाह को प्यारे हो गए। अब तो फ्री नाम से रूह कांप उठती हैं उस्ताद।’ ‘बेटा जम्बूरे अपना मुलुक भी तो फ्री है।’ बेशक है उस्ताद। मगर हालात क्या हैं यह तो देख ही रहे हो। उस्ताद एक बात कहूँ।‘बोल बेटा जम्बूरे़। ‘फ्री के नाम पर अब तो गाने को जी चाहता है कि मैने चॉद-सितारों की तमन्ना की थी पर मुझे रातों की स्याही के सिवा कुछ न मिला। बेटा जम्बूरे, यार मुझे माफ करदे। मैनें नाहक तेरे जख्मों को हरा कर दिया। उस्ताद कित्ती माफी माँगेगा। अरे एक माफी के कम से कम पाँच साल तो पूरे हो जाने दो। यहाँ तो समझ बैठे हैं कि रहा गर्दिशों में हरदम मेरे इश्क का सितारा, कभी डगमगाई कश्ती कभी खो गया किनारा। वाह जम्बूरे,जवाब नहीं तेरा। अच्छा ग़म भुलाने के लिये चलो विधानसभा के सामने तमाशा दिखाते हैं। वहाँ देखनेवालों का अच्छा-खासा मजमा लगेगा।
एक बात बोलू उस्ताद। अबे एक कम सौ बात बोल जम्बूरे। यही तो सबसे फसकिलास बात है अपने मुलुक में बेटा कि बोलने की दिल खोलकर आजा़दी है। बेटा निकाल डाल तू भी अपने दिल की भड़ास। बोल बेटा जम्बूरे ऐसा मौका फिर कहाँ मिलेगा। उस्ताद, मुझे लगता है कि तेरी पैदाइश कहीं जरूर किसी ए.सी. रूम में हुई होगी। क्यों आखिर ऐसी कौन सी खास बात देखी तूने मुझमें। बात तो कोई खास है नहीं लेकिन इस वक्त तूने बिल्कुल फैसला लिया है ए.सी. में रहने वालों की तरह। अरे अपनी प्यारी धरती से जुड़.कर कोई फैसला लेना सीखो।
अबे आखिर बात क्या हो गयी। कुछ नहीं। बात दरहअस्ल मे यह है कि वहाँ तो उस्ताद भीतर बाहर हमेशा एक से बढ़कर एक तमाशा हुआ करते हैं, अपने पुराने घिसे-पिटे तमाशे में भला किसे मज़ा आयेगा उस्ताद। यक़ीन मानो मालिक अपना झोला-झंखड़ देखते ही फौरन पुलिसवाले मुँह में बीड़ी और हांथ में पुरानी टुटही साइकिल थमा कर आतंकवाद के नाम पर रैट टैम भीतर कर देंगे। कसम खुदा की उस्ताद छः महीने तक ज़मानत नहीं होगी। न बाबा न अपुन तो उधर कतई नहीं जाने का उस्ताद। बेटा जम्बूरे, अबे खुदाकसम मैंने तो इतनी दूर की सोचा तक नहीं था। तूने क्या तेलियामसान की खोपड़ी पायी है।
‘अच्छा जम्बूरे मेरी एक बात मानेगा।‘ ‘कहेगा भी सही।‘ चल बेटा यहीं अपने ‘कैपिटल’ के सामने मजमा लगाते है। शाम का वक्त है। बाबू लोग घर वापस जाने वाले होंगे। इत्मीनान के साथ हमलोगों के तमाशे का मज़ा लेंगे। कसम से जम्बूरे अबतो दिल खोलकर गाने को जी चाह रहा है ‘नाच मेरी बुलबुल तुझे पैसा मिलेगा।‘ अमाँ सबसे मज़े की बात तो यह है कि इस वक्त चैनलवाले घूम रहे होंगे। कौन जाने अपने लोगो का तमाशा देखकर अपनी फटेहाल ज़िन्दगी पर कोई स्टोरी गढ़ कर अपने कैमरे में क़ैद कर डालें।
"एक बात पूछूँ उस्ताद। अबे एक सौ एक बात पूछ। आज मैं बहुत खुश हूँ।"
उस्ताद जब अल्लाहमियाँ के काउन्टर से अक्ल बाँटी जा रही थी तो तू शायद लैन में काफी पीछे रह गया होगा इसीलिये तेरे काउण्टर तक पहुँचते-पहुँचते अक्ल की बुकिंग खत्म होगई रही होगी। शायद यही वजह है कि उस्ताद तू हमेशा बेअक्ल की बात बोलता है।
"अबे जम्बूरे वह कैसे। हमारी बिल्ली हमीं से म्याऊँ।"
"मेरे आला काबिल उस्ताद बुरा मान गये। अरे मेरे बाप समझता क्यों नही कि आजकल अपने बाबू लोग दफ्तर भले देर से पँहुचे क्योंकि वहाँ देर से पँहुचने के हज़ार बहाने बनाये जा सकते हैं जिन्हे हाकिम-हुक्काम को भी मानना पड़ता है इसलिये कि वे बेचारे खुद ही देर से अपने आफिस पहुँचते हैं। मगर बाबू लोगों को देर से घर पहुँचने पर अपनी तेज-तर्रार बीवियों को एक हज़ार एक कैफियत देनी पड़ती है।
"अबे बात कुछ समझ में नहीं आई, जम्बूरे।"
"इसलिये कि उन्हे ब्युटीपार्लर और बिगबाजार जाने की जल्दी होती है उस्ताद। अब रही बात चैनलवालों की बात तो वे अपना ढँढ-कमन्डल लिये हम जैसे फटीचरों को लिफ्ट क्यों देने लगे। "बेटा जम्बूरे,यार तेरी बात अपनी तो एकदम समझ में नहीं आती है। जो कहना है साफ-साफ कह।" "उस्ताद सीधी सी बात है कि चैनलवाले सबसे पहले भैंसाकुण्ड यानी बैकुण्ठधाम पर पँहुचकर कैमरा फिट करके देखेंगे कि कौन सा मुर्दा चिता पर लिटाते ही उठ कर बैठ जाता है और लगता है बताने कि अबकी इलेक्शन में कौनसी पार्टी का बहुमत होगा। बस दिनभर वही स्टोरी चलती रहेगी। समझे उस्ताद, कुछ नहीं समझे होगे क्योंकि जब हम नही समझे तो तुम क्या समझोगे।
बेटा जम्बूरे बातें तू ऐसी कर रहा है जैसे बहुत दिनों तक दूर के दर्शन को बहुत नजदीक से देखता रहा है। उस्ताद बारात किया तो नहीं है लेकिन देखा जरूर है। आज वही तर्जुबा काम आ रहा है। इसके बाद उनका कैमरा किसी खँडहर में किसी अधनंगी लाश या किरकिट-मैच में धिरकिट-धा बजाने वालों के इर्द-गिर्द घूमता रहेगा। अब समझने वाली बात यह है कि उन सब स्टोरियो के आगे अपने खबीस से चेहरों की स्टोरी लोगो को क्या पसन्द आयेगी, जो पापी पेट के लिए तमाशा दिखाते भी हैं और तमाशा बनते भी हैं। उस्ताद, वह सब ख्वाब देखना भूल जाओ। अपनी औकात यही समझ लो कि पार्टीवालों को लोग इलेक्शन के लिये खूब खुशी-खुशी हज़ारो का चन्दा दे देते हैं मगर हमारा तमाशा देखकर रूपये दो रूपये देने से कन्नी कटा कर किसी पतली गली से फूट लेते हैं। उस्ताद जरा समझने की कोशिश करो कि न तो हमलोग नेता हैं और न अभिनेता। उन सब के तमाशे के आगे अपना तमाशा कौन देखना चाहेगा।
बेटा जम्बूरे फिर अपनी दो जून की दाल-रोटी का इन्तज़ाम कैसे होगा। दिन पर दिन बढ़ती मँहगाई ने तो अ च्छे-अच्छों की कमर तोड़ दी है। देख उस्ताद सबकुछ बोल मगर मँहगाई का रोना मत रोया कर। अपनी सरकार बहुत दुखी हो जाती है। भला कभी तो सोचा होता कि इस वक्त अपनी सरकार बेचारी अमरीका से आतंकवादियों के चक्कर में सांस नीचे ऊपर कर रही है। ऐसे में भला मँहगाई सुहाती है। उस्ताद तुम्ही बताओ कि कनाटप्लेस में भला झूमरीतिलैया का काजल कोई लगाना पसन्द करेगा।
अबे जम्बूरे जवाब नही। क्या जोड़ मिलाया है। कहाँ कनाटप्लेस और कहाँ झूमरीतिलैया।
उस्ताद हमलोगों को अपनी खुशकिस्मती समझना चाहिये कि हमलोगों को घर बैठे मँहगे लहँगे में मँहगे डान्स देखने को मिल रहे हैं। चुप क्यों हो गये उस्ताद। कोई बेजा बात कह दी क्या।
नहीं जम्बूरे, सोचता हूँ तू कहाँ किस धन्धे में फँस गया। तुझे तो उस्ताद होना चाहिये था या कहीं नेता। उस्ताद तू सोचता क्यों नहीं कि आजकल अफसर से ज्यादा रूतबा अर्दली का होता है। मैं जम्बूरा ही ठीक हूँ। मैं दलबदलू नहीं हूँ। यह नहीं कि आज एक उस्ताद के इशारे पर तमाशा दिखाता फिरूँ और कल दूसरे उस्ताद के पीछे भागता फिरूँ। देख उस्ताद मैं जम्बूरा हूँ, मुझे जम्बूरा ही रहने दे। इसी में मैं खुश हूँ। मैं उनमें से नहीं हूँ कि बड़े-बड़े धन्नासेठ-टाइप उस्तादों की डुगडुगी पर पब्लिक को तमाशा दिखाता रहूँ। कसम ख़ुदा की तू भले ही फटेहाल उस्ताद है मगर है तो मेरा उस्ताद। दिल दिया है जाँ भी देंगे ऐ उस्ताद तेरे लिये। तुम उस्तादों के उस्ताद बन सकते हो मगर मेरी किस्मत में तो जम्बूरा बनकर ही खेल दिखाना बदा है। तू भले मुझ पर मैली चादर डालकर चाकू चमकाते हुये पब्लिक के सामने मुझे मारने के लिये चिल्लाता रहेगा मगर मैं आखिरी साँस तक उस्ताद-उस्ताद पुकारता रहूँगा। तुम शायद हमेशा की तरह मेरी पुकार अनसुनी करके मजमे से कहते रहोगे ’ मेहरबान कदरदान, पापी पेट का सवाल है।
गुरुवार, 4 सितंबर 2008
दूल्हे कब तक बिकते रहेंगे
बुधवार, 3 सितंबर 2008
तारीफ करूं उसकी जिसने उन्हें बनाया...
बखुदा जी चाहता है कि ऊपर वाले का मुँह चूम लूं कि उसने इस धरती के आलीशान टुकड़े पर ऐसे-ऐसे नायाब मुज्जसिमें गढ़ कर भेजे हैं कि बस देखते ही रह जाना पड़ता है। लगता है कि किसी समर-वैकेशन में बड़े इत्मिनान के साथ उन्हे गढ़ते वक्त उनकी किस्मत किसी कमाल की कलम से लिख डाली हो। इसी वजह से बरबस ज़ुबॉं पर यह लाइन आ जाती है, "तारीफ करूं उसकी जिसने उन्हें बनाया।"
अपने जैसों की बात करना तो भय्या हरियाली छोड़ रेगिस्तान का कठिन रास्ता नापना जैसा है। खेत काटने जैसी जल्दी में हड़बड़ी के वक्त जैसे-तैसे टेढ़ा-मेढ़ा गढ़ डाला होगा और तकदीर लिखते-लिखते कलम में स्याही खतम होगई होगी। रोना यही है कि आखिर हमने क्या बिगाड़ा था। जो बेचते थे दवा-ए-दिल मेरे साथ, वे दुकान अपनी बढ़ा चले। एक चैनल पर देखकर ताज्जुब हुआ कि एक विदेशी ने ऋगवेद में दिये गये विवरण के अनुसार उन ऐतिहासिक स्थलों की खोज में ईरान और इराक की ख़ाक छान डाली। उसे हासिल भी बहुत कुछ हुआ जिससे दुनिया के सामने हकीकत आयी। पर अपने माननीय द्वारिकाधीशों को दूर को मारिये गोली निकट की वस्तु भी निहारने के लिये उनके चश्मे का पावर धोखा दे जाता है। फॉर एक्जाम्पिल जहाँ सहारा है, वहीं बेसहारों का विशाल समूह देखकर सोचने पर मज़बूर होना पड़ता है कि सचमुच यही है सच्चे समाजवादी समाज का बेहतरीन नमूना। जरा हमसफर बनकर मेरे साथ लखनऊ से बाराबंकी तक लाल लंगोटावाले लालू पहलवान की रेलमपेल रेल में सफर करने की ज़हमत गँवारा करें। गोमती के गुस्से को पीते हुए जैसे आगे बढ़ेगे कि द्वारिकापुरी की गगनचुम्बी अट्टालिकाओं का दिलकश नज़ारा सामने देखते ही बनता है। माया उनकी समझ में नहीं आती है। किन्तु-परन्तु सहारे में बेसहारों की रोती-बिलखती फटेहाल झुग्गी-झोपड़ियों को देखकर दौड़ती पसीन्जर गाड़ी की खटमलयुक्त सीट पर बैठे-बैठे सोचता हूँ कि रेलवे लाइन के किनारे इन अनगिनत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले सुदामाओ पर पास रहने वाले द्वारिकाधीशों को जरा भी तरस नहीं आया कि कम से कम उनके सिर पर एक-एक पक्की छत तो मुहैय्या करा देते। फिर क्यों नहीं उन्हें मरहूम साहिर साहब का वही शेर याद करने को दिल चाहता है— ‘कि इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक।’ यह सबको मालुम है कि ये वे बदनसीब मजूर-दरहे हैं जिनका काम द्वारिकापुरी को सजाने-सँवारने के बाद दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका जाएगा। फिर भी इन्हें और इनकी बिना छत झुग्गी- झोपड़ियों को देखकर यूँ जान पड़ता है जैसे चाँद में लगे दाग़ य़ा जैसे सूर्य में लगा ग्रहण। यह तो बाइसकोप का ग़ैरमामूली सीन है बाढ़ में बग़ावत का बिगुल बजाती गोमती मैय्या के पार रेलवे लाइन के किनारे का। यहाँ तो तमाम जाने-अनजाने द्वारिकाधीशो के रंगमहलों व पंचसितारों के आस-पास लकुट-कमरिया ओढ़े टपकती छतों के नीचे पड़े अनगिनत सुदामाओ की झुग्गी-झोपड़ियों का सिनेमास्कोपिक बाइसकोप देखना आम बात है। पहले वाला ज़माना अब रहा कहाँ कि गरीब और फटेहाल सुदामा का नाम सुनते ही बिना किसी प्रोटोकाल की परवाह किये खुद नंगे पाँव गले मिलने चल देते थे और उनकी हालत पर तरस खाकर उन्हें एक दो नहीं बल्कि तीनों लोक देने को उतावले हो जाया करते थे। आज तो द्वारिकाधीशों का स्वार्थ इतना सिर पर चढ़ कर बोल रहा है कि लोक का एक छोटा सा टुकड़ा और टुकड़े पर एक परमानेन्ट छत मुहैय्या कराना गँवारा नहीं किया। यह तो सब जानते हैं कि उन फटीचर सुदामाओं के यह अरमान कभी नही रहे कि उनका एक बँगला बने न्यारा। उस वक्त भी तो फटीचर ‘सुदामा’ की दिली ख्वाहिश बस सिर छुपाने के लिये एक छोटी सी छत और दो जून की बासी ही सही एक टुकड़ा रोटी ही चाहिये थी। आधुनिक द्वारिकाधीशों द्वारा मनमाने ढंग से उगाये गये कंकरीट के जंगलों के बीच गोमती की सुनामी लहरों से अनचाहे खेल खेलते हुए अपनी कूड़े-कबाड़ों से पटी झोपड़ियों पर किस्मत की मार समझते हुए फटेहाली का रोना मानवाधिकार के ठेकेदारों से रोना भी तो बेहतर नहीं समझते हैं क्योकि डर है कि कहीं उन्हे आज के द्वारिकाधीशों का कोपभाजन न बनना पड़े और बची-खुची रोटी के लाले न पड़ जांये। मेरे ख्याल में राजधानी के द्वारिका धीशों को खुद कल्याणकारी राज्य के बोधिवृक्ष के नीचे विचार करना चाहिये। इसीलिये जी चाहता है कहने को ‘तारीफ करूँ उसकी जिसने उन्हें बनाया।‘ उन्हे जिन्हें इतने विशाल देश की गाड़ी को विकास की लाइन पर दौड़ाने के लिये ड्राइबरी की नौकरी दी गयी है। सच पूछिए तो भाईजान मेरी नज़र में तो डरेबरी की नौकरी आई.ए.एस. और आई.पी.एस. वगैरह से कहीं बड़ी है। जरा सी सावधानी हटी नहीं कि दुर्घटना हुयी। इसीलिये अंग्रेजों ने शायद रिटायर करने की एक उम्र निर्धारित की थी। पर उस ज़माने में शायद एलक्शनवाली एनर्जी और लम्बी उम्र अता करनेवाली मशीन नहीं इजाद की गयी रही होगी। अब कितने भी इनरजेटिक और देशसेवा करने की तमन्ना संजोये यूथ-फेस्टिवल वाले उस ड्राइविंग लाइसेन्स के लिये हाथ-पैर मारते रहें लेकिन कोई फायदा होते नहीं दिखता। आजके द्वारिकाधीशों को अमरत्व की घुट्टी जो उनके आला सरदारों ने पिला दी है इसलिये उनके नजदीक रिटायरमेन्ट का भूत फटक नहीं सकता है। किसी ने ठीक ही कहा है,— ‘न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बन्धन जब प्यार करे कोई देखे केवल मन।’ भाई, उन्हें इस मुल्क से बेपनाह प्यार जो है। इसलिए उनके रिटायरमेन्ट का सवाल ही नहीं उठता है।
असली-नकली का खेला...
अमां, मुझे अपने अपने बचपन की वह बात खूब अभी तक याद है। जब मैं किसी इम्तहान में बगल वाले की कापी को उचक उचक कर देख कर अपनी कापी पर लिख रहा था। उस वक्त मूंछे तो नहीं हल्की हल्की रेख जमी थी। मारे जोश के जब इम्तहान देकर बाहर निकला तो उन रेखों पर ही ताव से हाथ फेरते हुए साथियों को बताता रहा कि मेरे सारे सवाल सेन्ट परसेन्ट सही होंगे, क्योंकि मैंने बगल वाले से अक्षरश: नकल कर डाली है। उधर बगल वाला परीक्षार्थी मुंह लटकाए हुए लोगों से बता रहा था कि उसके सभी सवाल गलत हो गए। मेरी झूठी खुशी पर तंज कसते हुए किसी पतली कमर मौलवी साहब ने फरमाया, ‘हजरत नकल में भी अकल की जरूरत होती है।’ तब मुझे भी होश आया लेकिन तब होता क्या है ‘जब चिडि़यां चुग गयी खेत।’
इन दिनों अपने मुल्क में भी नकल की सुनामी लहर उठ रही है। रोज अखबारनवीसों को इस नकल के मुद्दे पर कलम तोड़ कर स्याही पी लेनी पड़ती है। सुनते हैं आज कल कोई जगह नहीं बची है जहां जाली नोटों की बौछारे न पड़ रही हों। चाहे डुमरियागंज हो या डूंगरगढ़। सब जगह जाली नोटों की बरसात हो रही है। यह सब देखकर पेशोपेश में पड़ गया हूं कि हाल में संसद के स्वर्णपटल पर नोटों की गड्डियां जो दिखाई गयीं, खुदा जाने वे असली थी या नकली? क्योकि पहले हम लोग जब मुहल्ले में ड्रामा खेलते थे और उसमें नोटों की गड्डियां दिखाने का सीन आता था तो हमारे डायरेक्टर साहब नीचे ऊपर असली दो चार नोट रखकर बीच में उसी साइज के कटे सादे कागज रख दिया करते थे। देखने वाले समझते थे कि सब असली नोटों की गड्डियां हैं। अब बहरहाल देस में नोटों की कमी है नहीं पर हैरत इस बात पर जरूर होती है कि बैंक जो नोटों के माहिर समझे जाते हैं और ‘विश्वास’ जिनका मूलमंत्र होता है वे इन जाली नोटों के जाल में उपभोक्ता को कहां और कैसे फंसाने पर उतारू हो गये?
अब अपने दिलो दिमाग के दरवाजे खोलकर झांकने की झकझोर कोशिश करता हूं कि नकली की नकेल नोटों की ही क्यों पकड़ी जा रही है? असली नकली का किस्सा तो बहुत पुराना है। नकली शिखण्डी को ही सामने करके बेचारे बाल ब्रह्मचारी भीष्म पितामह का बन्टाधार कर दिया गया। तारीख के पन्ने पलटने पर मालुम हुआ कि ‘झांसी की रानी’ के किसी गोलन्दाज ने गोले के नाम पर नकली गोलों से फिरंगी फौज पर प्रहार किया था। भय्या, क्या नकली है और क्या असली है? इस चक्कर में घनचक्कर बनकर माथा खपाना बेकार है। कुछ दिन लोग बोफोर्स और फौजी शहीदों के कैफीन को नकली बताकर आपस में चोंचें लड़ाते रहे। अब यह बात अलग है कि आज शनि की साढ़े साती कागजी नोटों और सरकार से सरोकार रखने वाले बैंकों पर चढ़ बैठी है।
लेकिन मेरी समझ में किसी एक को दोष देना ठीक नहीं है। बड़े-बुजुर्गों ने खूब मन्थन करने के बाद कहा था कि जब अपना ही माल खोटा तो परखैया का क्या दोष? पहले अपने गिरेबान में मुंह डालकर झांकना चाहिए। सीने पर जरा आइसक्रीम रखकर सोचिए कि नकली नोटों के पीछे ही हाथ धोकर लोग क्यों पड़े हैं? कोई सस्ती सीबीआई और कोई मद्दी सीआईडी से जांच कराने के लिए गुटुरगूं कर रहा है। सोचने वाली बात है कि जब माननीयों के बीच असली-नकली का खेल चल रहा है तो कहां तक जांच की आंच गर्मी पहुंचाएगी?
अब तो मुझे लगता है कि खुद दुनिया बनाने वाला सोचता होगा कि कहीं उसके द्वारा रचे और धरती पर उतारे गये लोग असली रह भी गये हैं या नहीं? हो सकता है ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की बदलती फिजां में किसी नकली रचनाकार ने नकली रचना भेजने का पोस्टआफिस खोल दिया हो। इन दिनों तो अपने कवि या लेखकों को कुछ ऐसी लाइलाज बीमारी ने धर-दबोचा है कि वे ग़ालिब, शेक्सपीयर और नीरज की पंक्तियों को अपने नाम से पढ़कर अच्छा खासा ईनाम, इकराम हासिल कर लेते हैं। अब तो भाईजान ऐसा जमाना आ गया है कि किसी पार्टी में रहते हुए और पार्टी के लिए समर्पित होने का दावा करने वालों के दावे को असली कहना मुश्किल है। भई कहना पड़ता है कि ‘अच्छों को बुरा साबित करना दुनिया की पुरानी आदत है।’ कौन अपने असली रूप में सरकार के भीतर फुफकार रहा है और कौन बाहर फुफकारने की एक्टिंग कर रहा है, बताना बहुत मुश्किल है। कौन सच्चे दिल से रामनाम जप रहा है और कौन नाम के लिए राम का नाम ले रहा, कहना नामुमकिन है। जब पुलिस की वर्दी में डकैत डकैती करके चले जाते हैं और रिपोर्ट लिखने में आनाकानी की जाती है तो भाई असलियत से रूबरू होना नामुमकिन है। सुनने में आता है कि आजकल इंजेक्शन लगा कर सब्जियों को खूब डेवलप कर दिया जा रहा है। दूध को असली कहकर सेहत बनाने की चाहत रखना निहायत मूर्खता के सिवा कुछ नहीं है। लेकिन जानते समझते हुए किसी के पेट पर लात क्यों मारी जाए? हम कहां कहां सीबीआई और एन्टीकरप्शन को भिड़ाते रहेंगे? जब पुलिसिया फोर्स होते हुए भी आराम से गाड़ी या बसों में लोग छीन झपट कर चलते बनते हैं तो और कहने को रहा ही क्या है? और तो और जब नकली वायदे करके लोगों से विकास के नाम पर वोट बटोर लेते हैं तो इससे बढ़कर नकलीपन क्या हो सकता है?
असल में नकलीपन की ऐसी हवा चली है कि जड़ से नेस्तानाबूद करना खुद अल्लाह मियां के वश में नहीं रहा है। खुदा न खास्ता अगर वह दोनों जहां का महान ठेकेदार हमारी गली में आ टपके तो कुछ क्या परसेन्टेज लोग नकली कहकर सीबीआई के हवाले कर बैठेंगे। लेकिन बमुताबिक दादा हुजूर के सब वक्त वक्त की बात है। नकलीपन का लेवल कभी रिफाइन्ड और सरसों के तेल पर लगाया जाता है, कभी पार्टी के निहायत वफादार पर चस्पा करके बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। आज कल मेडिकल स्टोर वाले नकली दवाओं के लिए अलग बदनाम हो रहे हैं। कभी कभी लोगों को भी शक होने लगता है कि वे असली माता-पिता की असली संतान हैं भी या नहीं?
बहरहाल मौजूदा हालात में तो नकली नोटों को देखना है कि वे आर्यो की तरह कहीं मध्य एशिया से तो नहीं आए? खैर जहां से जैसे भी और जिसके जरिए से भी इस स्वर्ग स्वरूपा धरती पर आये हों उनसे हमें या हमारे जैसे फटीचरों को क्या लेना देना। यहां तो नोट देखा नहीं कि लार टपक पड़ी। लार तो बड़े-बड़े दिग्गजों के टपक पड़ती है क्योंकि उनकी लोभी नजरों के सामने तो सब से बड़ा रुपय्या है। वे कहां हैं कहां हैं जिन्हें नाज है हिन्द पर वे कहां हैं? क्या उनका शगल सिर्फ ‘डील’ की झील में डुबकी लगा कर पाउडर मलना है या कभी श्राइन बोर्ड, कभी रामसेतु और कभी राममंदिर की बाल की खाल निकालना है? उनका इस मामले में क्या विचार है जो फर्श पर रहकर अर्श पर पहुंचने का ख्वाब देख रहे हैं। इन सबके बावजूद उन्हें कहने को जी चाहता है कि पलट तेरा ध्यान किधर है? क्या हादसे हद से गुजर जाने के बाद उन्हें चन्द दिनों के लिए ख्याल आता है? ऐसे उदारवादी देश के उदारवादी कानून को बारम्बार नमन करने को जी चाहता है। क्यों नहीं ये बीमारियां दूसरे मुल्कों में फैल रही हैं। गुस्ताखी माफ की जाए, वही कहावत बार-बार कहकर दिल को तसल्ली देना चाहता हूं कि ‘हर शाख पे उल्लू बैठे हैं अन्जामें गुलिस्तां क्या होगा?’
इसलिए सिर्फ नकली नोटों को ही नहीं, नकली वोटों के सहारे सुनहरी कुर्सी पर टंगड़ी पसार कर बैठे लोगों की तरफ भी ध्यान देना चाहिए।