शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

बोलो क्या-क्या खरीदोगे...?

भले अपने गांव वाली फुलमतिया चार-छ: पेबंद लगी पुरन की साड़ी लपेटे अपने शहीद हुए सिपहिया पति के मुवावजे के लिए सड़क-सड़क की ख़ाक छानती दिखे। वही अफसर अब मुँह घुमा लेते हैं जिन्होनें बड़ी-बड़ी बातें की थीं। भले अपनी नुक्कड़ वाली टुटही हवेली से सूखा मुँह लिए मीर साहब नज़र आते हों जिनका मुँह कभी बेगम के हाथ से लगी गिलौरीयों से भरा दिखाई देता था। आज मीर साहब बयान करते-करते रो देते हैं कि भाई जब से बेगम अल्लाह को प्यारी हो गयीं किसी बहू को फुर्सत नहीं है कि गिलौरीयां पनडब्बे में भर दे। उल्टे कहती हैं अब्बा यह कौन सी लत पकड़ रक्खी है आपने? हुक्का खुद भरिए और कोने में बैठे-बैठे गुड़गुड़ाते रहिए।

अपने दायरे में सिमटा हुआ याद करता हूँ वो दिन जब आज की फटेहाल फुलमतिया कल को मिसेज फूलमती वाइफ़ ऑफ सूबेदार मेजर सूरज सिंह कहलाती थी। गज़ब का रुतबा था। सोचता हूँ आज के डिस्पोजल गिलास की तरह चुचके-पुचके मीर साहब बीते हुए कल के मीर साहब का क्या जलवा था? मजाल कि शेरवानी में शिकन तो पड़ जाए। बैठके में राय मशविरे के लिए डी॰एम॰ से एस॰एस॰पी॰ तक डेरा जमाए रहते थे। मुझे याद है चार-चार सेर दूध चचा मौला बख़्श के घर से खरीदा जाता था। अपना रमफेरवा कभी-कभी पूछता था कि चचा मियाँ इतना-इतना दूध क्या होता है? मीर साहब तपाक से जवाब देते, नामाकूल कहीं का। अरे बच्चे खाये-पीयेंगें तब न बुढ़ापे में हमारा सहारा बनेंगे। फिर यही तो उनकी उम्र है खा पीकर सेहत बनाने की। लेकिन इस उम्र में जब सुना कि बेचारे मीर साहब की बेगम की दोनों आँखें बिना चश्मे के चली गई और खुद मीर साहब एक पुड़िया तम्बाकू के लिए तरस जाते हैं तो बड़ा दुख होता है। उल्टे बड़े-बड़े भाषण सुनने को मिलते हैं कि अब्बा यह सब गंदी आदत है। तमाम बीमारियाँ रख लेती हैं। फालतू खर्च क्यों बढ़ाते हैं? देखते नहीं महँगाई कितनी बढ़ गई है?

दायरे में बैठ कर सारा ध्यान बढ़ती महँगाई की तरफ केन्द्रित हो जाता है। साग-भाजी वगैरह की महँगाई तो समझ में आ रही है पर शराफत एखलाक और सम्बन्धों पर महँगाई की मार समझ से बाहर है। इसमें कौन सी लागत लगती है?

फिर भी एक बात अलबत्ता काबिले गौर है कि इनके अलावा सभी चीज़ें इफ़राद हैं। बोलो क्या-क्या खरीदोगे? हत्या, लूट, बलात्कार और घूसखोरी बाज़ार में भरी पड़ी हैं। जो खरीदना चाहो खुले आम बिना रोक-टोक के खरीद बेच सकते हो। लूट सको तो लूट। बेहद सस्ते हैं तो वायदे और खून-कानून। कितना लिखूँ और कैसे लिखूँ? यही तो समझ में नहीं आ रहा है कि जब खूब लिखना चाहता था तो उस समय इतनी समस्याएँ नहीं थीं लेकिन जब समस्याएँ हीं समस्याएँ हैं तो लिखने को जी नहीं चाहता है। क्योंकि न पढ़ने वाले रहे, न समझने वाले। लेकिन इतना यकीन जरूर है कि राजनैतिक और सामाजिक असन्तोष एक दिन जरूर अपना रंग दिखायेगा।

(नोट: (16 जुलाई 2010 को स्थानीय हिन्दी दैनिक ‘जनमोर्चा’ में प्रकाशित)
'बोलो क्या-क्या खरीदोगे'...? - यहाँ से pdf फ़ाइल में डाउनलोड करिए।

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

हम रोते भी रहे, हँसते भी रहे

अपने तंग दायरे के दरम्यान खड़े मुरझाए बरगद के पेड़ के नीचे सोचता हूँ की मनरेगा वालों से एक थाला खोदने के लिए चिरौरी-विनती की जाए जिसमें पानी भर दिया जाये। पेड़ हरा-भरा रहेगा तो छाँव में दो पल बैठकर देश-दुनिया की चर्चा करने राहगीर भी पहुँच जाया करेंगे। कभी-कभार कमण्डल करताल लिए कोई न कोई साधु-सन्यासी भजन-कीर्तन करने पहुँच सकता है। अलावा इसके तरह-तरह के चिड़िया-चिड्ढे चहचहाने के लिए कभी इस डाल पर कभी उस डाल पर फुदक कर कम से कम एक जून की रोटी पर से ध्यान तो हटा देंगे। मीर साहब को प्लानिंग फिट लगी तो उन्होंने अपने किसी तजदीकी साहेब से सिफारिश की। साहब ने बड़ी मुस्तैदी से जवाब दिया की ‘मीर साहब इसके लिए मेम साहब से बात करनी पड़ेगी क्योंकि वह अपने फॉर्म में एक तालाब का बोटिंग के वास्ते सुन्दरीकरण करना चाहती हैं’। मीर साहब छत्ते भर का मुँह लटकाए मिले तो किस्सा तोता-मैना की तरह अपना किस्सा बाँच दिया। वहीं खड़ी अपने जिगर के टुकड़े रमफेरवा की ढोलकनुमा माई बजना शुरू हो गई कि हे रमफेरवा के बापू और मीर भैया ‘ढेर उपकारी जिन बने के जतन करो। ई सोचते हैं जी, कि इहाँ पानी पिये कै नसीबे नाहीं होत है तो गड्ढा खोद के का होई? ऊ जमाना भुलाय जाओ जब जगहा-जगहा चरही बनवावा जात रहा और छाँव खातिर सड़क किनारे पेड़ लगवावा जात रहा। अब सब भूल जाओ’। रमफेरवा के माई की दलील सुनते ही मीर साहब ने तेजी से गिरगिटान जैसी गरदन झटकी। कहने लगे अमां यह बिल्कुल ठीकै फरमाती हैं। बिजली रहने का भी तो मामला है। जब बिजुरिए नहीं रहेगी तो पानी कैसे मिलेगा? मैं बिल्कुल ठीक कह रहा हूँ रमफेरवा के अब्बा हुज़ूर। अजी पहले अपने दायरे के बारे में सोचो कि कल यह रहेगा या नहीं। तुम रहोगे या नहीं। हमने तो उड़ते-उड़ते सुना है कि यहाँ कोई मेट्रो सिटी या बिगबाज़ार बनने वाला है।‘तब कहाँ से बिजली पानी मुहैया कराई जाएगी मीर साहब’? रमफेरवा कि माई खिलखिला कर हंस पड़ी उसने बिना कॉमा फुलस्टाप के बोलना शुरू कर दिया, कहने लगी ‘रमफेरवा के बापू तू रह गईला बुड़बक के बुड़बकै। अपने रजधानिए में देखला बाकी मुहल्ला बिन पानी सब सून गवनहीं करत है और ऊ पारिक का देखा काओ झकझक करत है। रामदे ऊ पानी के फ़ौव्वारा चलत बाटे कि देखतै जिव जुड़ाए जाये। अपने इहाँ सिविललैन का देखला काओ जगमग करत है। मीर साहब बीच में दूसरा चैनल बदलते हुए कहने लगे ‘अमां फिरंगी चले गए मगर फिरंगी महल छोड़ गए रमफेरवा के अब्बा। उस महल में आज भी फ़िरंगियों के भूत अपना काम तमाम करने में जुटे हैं। अब रही तुम्हारे फटीचर दायरे और इस मुरझाए बरगद की बात तो उनकी तरक्की की बात तो बस कागज़ में पढ़कर दिल को तसल्ली देते रहो। नक्कार खाने में तूती की आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं है मियाँ। जो सुनने वाले भी हैं वे जाड़े के लिए वोटों से ओवरकोट फिट कराने के चक्कर में घनचक्कर बने दिखाई दे रहे हैं’।

दोनों तरफ हमले से मैं बौखला उठा। विपक्षी तेवर में बोला “अरे क्या समझते हो मीर साहब हमलोग भी कम नहीं हैं पूरा भारत बंद करा देंगे तब तो उन्हें होश आयेगा”। सुनते ही रमफेरवा की माई चिल्ला उठी “बस करा, बस करा। खिसियानी बिलइया खंबा नोचे के निहाद जिन बतकही करा। ई काहे नाहीं देख्ता की आजादी के बाद से भारत खुलले कब रहा? ऊ तो कहा रमफेरवा के बापू की गांधी बाबा, विनोबा जी और लोहिया बाबू कै पौरा रहा कि कुछु झांकै के मौकवा मिल गया। हम तो जनित है कि भारत कभहों बन्द होय सकते नाहीं काहे से रमफेरवा के बापू आपन भारत टुकड़न में बंटा जाए रहा है और ऊ किस्वा सुनबै कीए हो जादा जोगी मठ उजाड़”। रमफेरवा के माई कि बतकही कुछ-कुछ अपने भेजे में भी बैठ रही थी लेकिन चुपचाप अपने अंधेरे दायरे को देख रहा था और सन्नाटे में दानव की तरह खड़े सूखे बरगद के पेड़ को, जिसके नीचे बैठ कर कभी कोई सिद्धार्थ गौतम बुद्ध बन गया था। वही आवाज़ मेरे कानों में प्रवेश कर रही थी ‘बुद्धम शरणम् गछामि’ ‘संघम शरणम् गछामि’। पर अब न तो बुद्ध रहे और न संघ ही रहा, संघ समूहों में बटा दिखता है। न समूह एक होंगे, न संघ बनेगा और न पूरा भारत अन्याय के विरुद्ध बन्द होकर अपनी आवाज़ बुलंद कर सकेगा। मैं, मेरे लख्ते जिगर रमफेरवा की माई और बेबाक बोलने वाले मीर साहब यूंही चोचें लड़ाते रह जायेंगे। आखिर में अपने फटे गले से रोते हुए गाना पड़ेगा “हम तुमसे मोहब्बत कर के सनम रोते भी रहे हँसते भी रहे। खुश होकर सहे उल्फ़्त के सितम रोते भी रहे हँसते भी रहे...”। किसी तरह तकदीर ठोक कर भूखे पेट अंधेरे में करवटें बदलना ही पड़ेगा। सचमुच भारत खुला ही नहीं था तो बन्द क्या होगा? खाक। बन्द करवाने वाले पहले एक जुट होकर इसे ‘बहुजन हिताय’ खोले तो सही। फिरंगी महलों से फ़िरंगियों के भूतों को बोतल में बन्द तो करें पहले।

नोट: (29 अप्रैल 2010 को स्थानीय हिन्दी दैनिक ‘जनमोर्चा’ में प्रकाशित)

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

उनके अँगने में तुम्हारा क्या काम?

दो सितारों का मिलन शायद आज की रात हुआ है तभी तो अपना लख्ते जिगर रमफेरवा धूनी रमाए किसी मंदिर के खंडहर में खंजड़ी बजा-बजा कर गा रहा है ‘तू राम भजन कर प्राणी, तेरी दो दिन की ज़िन्दगानी’। उधर किसी मस्जिद से अज़ान की सदा सुनते ही पास बैठे लोगों से कहता है। खुदा के वास्ते इनकी-उनकी बातें बंद करके यकीन करो ‘सबका मालिक एक है’। अल्लाह वालों ईमान लाओ। कहीं उसने किसी प्रवचन में सुना था राम-रहीम सब एक हैं बशर्ते दिल से आस्था के समन्दर में बेखौफ होकर डुबकी लगाओ।

मगर ताज्जुब हुआ सुनकर की अपने रमफेरवा की मीराबाई बनी माई आजकल सबकुछ भूल कर सियासती गलियारे का इरादा बना रहीं है। यही हालत अपना लंगोटिया यार मीर साहब के उस्ताद आला दर्जे के मौलाना जो अपनी तकरीरों से दुनिया भर की नसीहतें देते थे, वह भी उन संगमरमरी दीवारों के बीच चलते-फिरते फितरत बाजों के बीच कोई टुटही कुर्सी हथियाने के चक्कर में पड़े नज़र आ रहे हैं। समझ में नहीं आता है कि हमारी ज़िन्दगी कि गाड़ी लाइन बदलते हुए किस नंबर के प्लेटफॉर्म पर रुकने वाली है?

अक्सर बड़े लोग जिन्होने मनोविज्ञान का थोड़ा सा भी घोल पीया है बच्चों को बताया करते हैं कि कोई एक क्षेत्र चुन कर उसमें पिल पड़ो। फिर ज़रूर एक दिन सफलता कदम चूमेगी। देखा भी यही गया है। शायद ऐसी ही रुचियों को देखकर अपने यहाँ चार वर्णों की अवधारणा को मूर्त रूप दिया गया था। यह तो बाद में लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए उसमें घालमेल कर डाला और किरकिट खेलने वालों को हॉकी थमा दी, हॉकी में हँगामा करने वालों को बेसबॉल थमा दिया। फुटबाल के शौकीन लोगों को जबरन गिटार के तारों में उलझा दिया। बात ठीक हो सकती है कि ऐसे भी लोग हो सकते हैं मगर सौ में कहीं दो-चार। लीजिए, मैं भी कितना अहमक़ हूँ कि निकला था खूबसूरत बगीचे में सैर-सपाटे के लिए लेकिन पहुँच गया बीहड़ों में। आदत से मजबूर हूँ क्योंकि पढ़ने-लिखने की बुरी लत जो लग गयी है।

आज शायद भरत जी होते तो रामजी के वनवास चले जाने पर फौरन अपने को ख़ुद मुख़्तार बनाने के लिए किसी दीवानी न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने में जुट जाते। अब देखिए न अपने यहाँ साधू-संतों को ही देख लीजिए। कहने को तो उन्होने धर्मध्वजा फहराने का संकल्प लिया है मगर नज़र उनकी किसी संगमरमरी अहाते में इस भीषण गर्मी में ठंडी हवा पर रहती है। उन्हें भी चाहत होती है ढेर सारे अंगरक्षक उनके आगे-पीछे चलें और कोई न कोई पार्टी उनके नाम का टिकट छाप दे।

इस कलयुग में दोहरा फायदा किसे नहीं रास आएगा? भक्त जनों की भीड़ से चढ़ावे का फ़ायदा अलग मिलेगा और उधर सत्ता के गलियारे में बर्फ के ग्लेशियर अलग मज़ा देंगे। एक जगह की बात नहीं है भाई। सब जगह यही हाल देखने को मिलता है। अपने मीर साहब के उस्ताद मोहतरम कई-कई बार हज करने की खुशनसीबी हासिल कर चुके हैं। उनकी तकरीर सुनने वाले ‘सुभान अल्लाह’ कहते हुए अल्लाह वाले बन गए मगर हाजी मियाँ के एक हाथ में पाक तस्वीर होती है तो दूसरे हाथ में किसी सियासती पार्टी का मेनीफेस्टो। इसी तरह इधर भी एक मोहतरमा गेरुआ वस्त्र में बहुत अच्छी लगती हैं पर हमेशा उनकी हसरत सियासतदानों के काफिले के आगे चलने की रहती है। कमज़ोरी यह है की धार्मिक होने का रोल अदा करने में बेचारी फ़ेल हुई जा रहीं हैं। इन सब मंज़र से से दो-चार होने पर वशिष्ठ, विश्वामित्र और नानक पर कभी-कभी बड़ा ग़ुस्सा आता है कि नाहक किसी ‘रब’ की चौखट पर माथा रगड़ते रहे। उन्हें तो बिना कहे राजभवन में बढ़ियाँ सा बंगला मिल जाता। ताज्जुब तो यही है कि वही लोग माया-मोह का चक्कर छोड़कर आम लोगों को पूजा-नमाज़ में रम जाने का सबक देते हैं पर ख़ुद...। समझ ही गए होंगे मेरा मतलब। साफ सुनना चाहते हैं तो सुनिए स्वामी जी, साध्वी लोगों और आला काबिल मौलानाओं को सियासत में इतना मज़ा क्यों आ रहा है? उनको तो सबका ‘रब’ एक है में दिलोजान से फिट रहना चाहिए। न कि एयर कंडीशन्ड गाड़ी और बंगले के पीछे भागना चाहिए। गुस्ताखी माफ यहाँ तो वही मुँह में राम बगल में छुरी वाली बात हो रही है।

अब पूछने वाले ज़रूर पुछेंगे कि माफ़ियाओं को क्यों सियासत में लाकर आवभगत कि जा रही है? वहाँ तक तो बात किसी हद तक समझ में आती है की हो सकता है उनके हृदय परिवर्तन हो जाएँ जैसे बीहड़ों में बसे खूंखार लोगों का दिल विनोबा जी के संपर्क में आने से बदल गए थे। लेकिन सवाल यह भी है कि विनोबा जी अब रहे कहाँ?

कोई माने या न माने राम के नाम कि धूनी जमाने वाले और अल्लाह के सदके में सज़दा करने वाले वहीं अपने दिलों-दिमाग को लगाए रक्खेँ। उससे बढ़कर कुछ नहीं है। सियासत में मिलेंगी माया और मोहन या कोई सोन चिरैया जो आज हैं कल नहीं रह सकते हैं। बाबा और बड़े मियाँ ‘उनके अँगने में तुम्हारा क्या काम’? आप लोगों को तो बस उसी‘रब’ की चौखट का आशिक रहने में ही मज़ा आना चाहिए।

नोट: (22 अप्रैल 2010 को स्थानीय हिन्दी दैनिक ‘जनमोर्चा’ में प्रकाशित)
'उनके अँगने में तुम्हारा क्या काम?' - यहाँ से pdf फ़ाइल में डाउनलोड करिए।

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

भारत में फिरंगी महल

इन दिनों अपने को निखालिस भारतवंशी की तख्ती लटकाए लोगों ने कहा है कि भारत को भारत रहने दो। इसे इण्डिया मत कहो। माना कि सबका दिमाग अपने-अपने ढंग से सोचता है इसलिए उनकी बात पर अपुन को कोई आब्जेक्शन नहीं है। मगर यही बात अगर गांधी, विनोबा, लोहिया, और हेगड़ेवार के दौर में कही जाती तो यह दिल तहेदिल से स्वीकार कर लेता। अब तो यह सब कुछ उलट-पलट गया है। जबसे यूरिया वगैरह खादों से फसलें उगाई जा रही हैं तब से जायका ही बदल गया है। अब इसी तरह भारत कहने में वह मज़ा नहीं रहा जो इण्डिया कहने में।

प्रश्न उठता है कि ज़ुबान आपकी है कुछ भी बकते रहिए। सोचने वाली किधर से भारतीयता नज़र आ रही है? गुड़-पानी कि जगह बोतल में भरे नीले-पीले पेय पदार्थों ने ले लिया है। खेत-खलिहानों की जगह मेट्रो सिटी कि नुमाइश चल रही है। जहां मुल्क के रहनुमा यानि माननीयों खादी की बादी में चहलकदमी करने के बजाए पैंट-सूट में पार्कों और फाइव स्टार होटलों के कमरा नंबर-840 में ताश के पत्ते फेंटते दिखाई देते हैं, उसे भारत कहने में मुझे तो शर्म आती है भाई। मैं ही नहीं, संसद और विधान मण्डलों की वे परम पवित्र दीवारें अपनी मूक भाषा में बोलती हैं जो कभी खादी के खाद्यान्न खाकर अपनी तंदुरुस्ती पर इतराया करती थी। अब वे भी बेचारी क्या करें? आज के दस्तूर के सामने उन्हें दण्डवत् होने पर मजबूर होना पड़ रहा है। हमने भी वह मशहूर गाना सुना है ‘मेरा जूता है जापानी, पैंट इंग्लिशतानी, सर पर लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’। फिर ऐसे ही लोग कन्फ्यूज़ कर देते हैं कि बोली-बानी और वेषभूषा का बड़ा असर पड़ता है।

अब किसी को अच्छा लगे या खराब। अपने मीर साहब बड़ी बेबाकी से कहते हैं भई, ‘मैं तो भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनता हूँ। लेकिन मैंने भी मीर साहब की तान को उतान करते हुए सुना दिया, ‘अमां क़िबला मीर साहब यह गाना अगर अपना लख्ते जिगर रमफेरवा और उसकी फसल काटती माई या ईंट-गारा ढोकर अपना पेट पालने वाले जुम्मन चचा गाते तो अच्छा लगता। उन्हें इस देश को भारत कहने का पूरा हक़ है पर उन्हें कतई नहीं जो फिरंगियों के चले जाने के बावजूद उनके फिरंगी महल में उन्हीं के बेड पर आराम फरमा रहे हैं।

हालांकि इस बात को अपने मीर साहब ने तहेदिल से तस्दीक कर लिया। बात आई गयी हो गयी। मीर साहब को मेरी बातों से कोई ठेस न पहुंची हो इसलिए बात साफ करते हुए मैंने ही अर्ज़ किया कि मीर साहब मैं किसी खास शहर में आबादी किसी फिरंगी महल मुहल्ले की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि आप भी देखते होंगे कि तरक्की के नाम पर पूरे का पूरा मुल्क फिरंगी महल बन गया है। सोचिए ज़रा कि लंदन के गोलमेज़ कॉन्फ्रेंस में गांधी जी भी सूट-बूट में जा सकते थे। स्वामी विवेकानंद से लेकर डॉ॰ लोहिया तक विदेशों में अंग्रेज़ी ठाट-बाट से जा सकते थे पर उन्हें पूरा ख्याल ज़ेहनी तौर से था कि “हम उस देश के वासी है जिस देश में गंगा बहती है। भारत का रहने वाला हूँ भारत का गीत सुनता हूँ”।

ताज्जुब तो यह है कि स्वदेशी के सोन चिरैया को पालन करने वाले भी अपनी संस्कृति कि हंसी उड़ाते हुए सिर्फ साल में एक दिन 14 सितम्बर को हिन्दी कि बिंदी चमकाने के लिए ऊपर वालों के आदेश का पालन करके खानापूरी करने का जुगाड़ लगाते हैं। नाम राजभाषा और राष्ट्रभाषा देकर नौलक्खा हार पहना कर अपने हिन्दी प्रेम का प्रदर्शन करते नहीं अघाते हैं। भाई मीर साहब “खुशबू आ नहीं सकती है कागज़ के फूलों से”। कागज़ का ज़माना है अप्रिश्येट करना चाहिए कि एक विदेशी होकर भारतीय संस्कृति और भाषा में अपने वजूद को मिटा दिया मगर एक हम हैं कि सिर्फ कागज़ की नाव चलाने में एहसान लाद रहें हैं।

बात तो बहस कि है मगर बहस उनसे करना चाहिए जो किसी निर्णय को माने। अब यही नमूना देखने लायक है कि मुम्बई जहां बाल ठाकरे और राज ठाकरे की तरह लोग अपने ही देश की आन के लिए पाकिस्तानी क्रिकेट टीम की खिलाफत और हिन्दी भाषी लोगों के खिलाफ बगावत के लिए आग उगल रहे हैं पर उधर उन्होने कभी झांक कर नहीं देखा जिसे मुम्बई के गले का हार यानि बॉलीवुड कहा जाता है। अपुन ने उसे फिरंगी महल का नाम दिया है जहां सिर्फ फिरंगियों कि भाषा का बोलबाला है। हॉलीवुड के नाम बॉलीवुड कहा जाता है। एक वह भी ज़माना के॰एल॰सहगल, देविका रानी और दिलीप कुमार का था जब हिन्दी में बातें होती थीं। कहा भी गया था कि यह भारतीय फिल्म उद्योग है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए जाना जाता था किन्तु बॉलीवुड के बाद अंग्रेज़ तो चले गए लेकिन फिरंगी महल छोड़ गए। उसी फिरंगी महल में तरह-तरह के खेल दिखाने वाले किसी मंच पर फिरंगियों की भाषा बोलने में अपनी शान समझते हैं। कुछ को छोड़ कर बाकी अभिनेताओं-अभिनेत्रियों को क्या कहें? इस ओर क्यों नहीं मराठी आलम्बरदारों का ध्यान जाता। यह नहीं सुना है कि कुछ अंग्रेज़दॉ लोगों के डायलॉग रोमन भाषा में लिखे जाते हैं और फिल्मों के नाम भी अब अंग्रेज़ी में रखे जा रहे हैं। बनाई जाती हैं फिल्में हिन्दी में मगर लोकेशन होता है ब्रिटेन, अमेरिका, फ़्रांस और मरीशस का।

वैसे मुझे किसी भाषा से कोई बैर नहीं है पर अपनापन कहाँ गया? अपनी संस्कृति और भाषा कहाँ है? क्या वे किसी फिरंगी महल को आज भी अपना आशियाना बनाए हुए हैं। जब वे भी इस अजीमुश्शान मुल्क के एक हिस्से हैं तो क्यों भूल रहे अपनी भाषा और संस्कार। इस मामले में आशुतोष राणा, नाना पाटेकर जैसे कुछ लोग साधुवाद के पात्र हैं जिन्होंने हिन्दी को वास्तव में अपनी ज़िंदगी का एक अहम् हिस्सा बना कर रखे हुए हैं।

आश्चर्य तो यह है की अपनी सरकार भी सब कुछ जान समझ कर चुप बैठकर उन्हें पुरस्कृत कर रही है।

(नोट: (01/04/2010 को स्थानीय हिन्दी दैनिक ‘जनमोर्चा’ में प्रकाशित)

गुरुवार, 18 मार्च 2010

अब नाम का ज़माना है

उस दिन यादव के चाय की दुकान पर बैठे अपने मीर साहब लालू छाप कुल्हड़ में चाय की चुस्की लेने में पिले पड़े थे। अचानक उधर से गुज़रा तो उन पर नज़र पड़ी। मीर साहब के इस नये शगल को देखकर आखिर मैं अपने को रोक नहीं सका। पूछ ही बैठा, “अमां, भाई मीर साहब यह क्या? आज भाभी जान से लगता है कुछ अनबन हो गयी है वरना इत्ते सबेरे आप के यहाँ इस टूटी बेंच पर सपरैटे दूध की चाय पीने का प्रश्न ही नहीं उठता है”।

मीर साहब पहले तो कुछ सकपकाए फिर बैठने का इशारा करते हुए बोले, “अमां भाई क्या कहूँ? कम्बख्त आरक्षण पर बहस हो गयी। मैं औरतों के आरक्षण मुद्दे की वकालत करते हुए बिल्कुल सही ठहरा रहा था और वह अक्ल की मारी खिलाफत कर अड़ी पड़ी थीं। आखिर में मैंने वॉक आउट करना ही बेहतर समझा”। ‘मियाँ तो यह बात है? महँगाई के मुद्दे को दरकिनार कर आप लोग चोंचे लड़ाने लगे आरक्षण मुद्दे पर। समझ-समझ कर नासमझी कर बैठते है आप लोग”। मीर साहब “मैं कहता हूँ अगर आरक्षण मिल भी गया तो कौन सा तीर मार लेंगे आप? उसका भी फ़ायदा बड़े लोगों को ही मिलेगा। उन्हीं की बेगमों की पांचों उंगली घी में और सिर कढ़ाई में होगा भाईजान”।

भाई मीर साहब के सामने अब टॉपिक बदलने के सिवा कोई चारा नहीं था। चाय का खाली कुल्हड़ एक तरफ फेंकते हुए मीर साहब खिसियानी बिलाई खंभा नोचने की मुद्रा में बोले, “अच्छा यार यह बताओ कि तुम जो परचों और रिसालों (पत्र-पत्रिकाओं) में लिखते हो तो अपना नाम क्यों नहीं देते हो? बेनामी के अंधेरे में कैसे तुम्हारी पहचान बनेगी? यहाँ तो अपनी पहचान बनाने के लिए लोग न जाने क्या-क्या कर रहे हैं”?

कुछ देर के लिए मीर साहब की बात सुनकर मैं भी सकते में आ गया कि बात तो वह बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। इतनी मगज़मारी करने के बावजूद कोई मुझे पहचानता नहीं। समझता ही नहीं है कि मैं भी शहर में कोई अफसाना निगार हूँ। लेकिन फिर समझ में आया कि उस गरीब किसान को कौन पहचानता है जिसे लोग अन्नदाता तो कहते हैं पर उसका नाम नहीं जानते हैं? उस मज़दूर को नहीं जानते हैं जो अपनी मेहनत से खड़ी की गई आसमान छूती इमारतों के बगल में उजड़ी हुई बस्ती में वास करता है और लोगों की डांट-डपट सुन कर भी खामोशी की चादर में लिपटा पड़ा रहता है। बस उसे तसल्ली भर होती है कि ‘जीना यहाँ मरना यहाँ इसके सिवा जाना कहाँ’। मैं भी बेनाम होकर यही सोचा करता हूँ कि ‘मरना तेरी गली में जीना तेरी गली में, मरने के बाद चर्चा होगी तेरी गली में।’

मौका मिलते ही मीर साहब ने मेरे ऊहापोह में फँसे चेहरे को पढ़ते हुए आखिर बकना शुरू कर दिया, “मियाँ वह ज़माना बहुत पीछे छुट चुका है कि जब लोग काम से पहचाने जाते थे। आज तो जिसका जितना झूठ-सच प्रचार हो बस उसी कि समाज से लेकर सियासत तक पहचान होती है”।

बात भी ठीक हिंदुस्तानी जम्हूरियत में काम कम नाम ज़्यादा होने का दस्तूर निकल पड़ा है। इसलिए बड़ी-बड़ी भीड़ इक्कट्ठा करके एक दूसरे पर छींटाकशी करने का चलन चल निकला है। मुल्क महँगाई कि मार से मरता रहे लेकिन अपने नाम कि टिकुली सटा कर लोगों के आकर्षण का केंद्र बनने कि तमन्ना होती है। पहले तो लोग अपने महबूब को ताज़े खूबसूरत फूलों की माला पहना कर उसके खैरमकदम के लिए बेकरार रहा करते थे लेकिन अब बाग़-बगीचे हैं कहाँ? इसलिए बेशकीमती कागज़ के टुकड़ों को एक लड़ी में पिरो कर इस्तकबाल रस्म अदायगी हो रही है। बाकी लोगों का क्या? उनका तो ‘खुदा हाफ़िज़...’।

मीर साहब की बातें सुनकर मेरा भी जी मचल उठा है कि अब मैं भी नाम के साथ अफसाने लिखूँ। शायद मेरे अभिनन्दन के लिए भी अच्छी संख्या बढ़ जाए।

नोट: (18 मार्च 2010 को स्थानीय हिन्दी दैनिक ‘जनमोर्चा’ में प्रकाशित)
'अब नाम का ज़माना है'। - यहाँ से pdf फ़ाइल में डाउनलोड करिए।

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

पुरुष मानसिकता से जूझती महिलाएँ

उस दिन ‘विश्व महिला दिवस’ के मुबारक मौके पर अपने मुल्क के जाँबाज पुरुषों ने फिर एक बार द्रौपदी के चीरहरण का इतिहास दुहराया। शाबाश अपने देश के इतिहास-लविंग लोगों। कमाल की पुरुषत्व पर नाज़ करने वाली बात है कि ऐसे विशाल और आध्यात्मिक देश के सबसे बड़े सदन में विद्वान एंव वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों की काया में दुशासन की रूह घुस गई और उन्होनें अट्टाहासी मुद्रा में महिला विधयेक का चीरहरण कर दिया। यहाँ भी पाण्डव सिर झुकाए सब कुछ देखते-सुनते रहे कि कहीं उनका सिंहासन डोल न जाए। उधर देश भर में ‘महिला दिवस’ पर डुगडुगी बजा कर ‘नारी तुम केवल श्रद्धा’ गाते-बजाते जुलूस पर जुलूस निकाला जा रहा था। अखबारों ने अन्य खबरों को दरकिनार कर सोनिया गाँधी, सुषमा स्वराज, सानिया मिर्ज़ा, ऐश्वर्या राय वगैरह-वगैरह की फोटो छाप कर नारी-बिरादरी को दुनिया के सर्वोच्च शिखर पर बैठाने की कवायद की। मगर राज्यसभा यानी इण्डियन हाउस ऑफ लॉर्डस में दुशासन की शैतानी रूह घुस कर विधयेक की धज्जियां उड़ा रहा था। उसी अखबार के ठीक नीचे बतौर तोहफा भेंट किया गया कि एक दलित महिला को बलात्कार का शिकार बनाने के बाद जला दिया गया। कभी किसी ने सोचा कि आखिर वह सीन देखकर दुनिया के लोग क्या कहते होंगे?

दूसरे दिन वही विधयेक किसी जादू कि छड़ी घुमा कर पास करने कि खबर आई तो पटाखों पर पटाखें छुड़ाये जाने लगे। पहले ना-ना फिर हाँ-हाँ। चलिये देर आयद दुरुस्त आयद। जरूर खुशी कि बात है। मगर अफसोस तो होना लाज़मी है कि जिस देश में रज़िया सुल्तान और झाँसी कि रानी की दुहाई दे कर सदन को सुशोभित करती महिलायें उस वक़्त मूक दर्शक क्यों बनी रहीं जब कुछ लोग विधयेक को चिंदी-चिंदी कर के हवा में उड़ा रहे थे? मतलब साफ है कि इस देश कि जागरूक महिलाओं के संघर्ष से नहीं बल्कि पुरुष प्रधान समाज के अलम्बरदारों की कृपा से विधयेक पारित किया गया और शायद ही नाटक के बाद लोकसभा भी पारित कर दें।

अब एक सवाल जेहन में उठा करता है कि महिला आरक्षण विधयेक महिला राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद कानून का जामा पहन लेता है तो क्या गारंटी है कि यह पुरुष प्रधान समाज उसे बिना किसी पैतरेंबाजी के स्वीकार कर लेगा? क्योंकि इसके पूर्व भी बाल विवाह, दहेज उन्मूलन और सती प्रथा से सम्बन्धित विधेयकों ने कानूनी जामा पहना। प्रगतिशील समाज की तस्वीर उभरी लेकिन क्या उसे लागू करने में हमारे रहनुमा खरे उतर रहे हैं आज भी सुदूर गाँव में बाल विवाह का चलन जारी है देश के कई इलाकों में आज भी सती प्रथा चल रही है और दहेज... क्या कहने हैं इसके? इस दानव ने तो क्या गाँव क्या शहर, क्या शिक्षित और क्या अशिक्षित सब पर हावी दिखाई दे रहा है? यहाँ तक कि कानून बनाने वालों से लेकर कानून का कठोरता से पालन कराने वालों को दहेज की बीमारी ने बुरी तरह जकड़ रखा है। ऐसे कानून से क्या फायदा? क्योंकि मानसिकता वही है। आज का पुरुष अपने पुरुषत्व के मंच पर ‘नारी सशक्तिकरण’ के नाम पर पत्र-पुष्प चढ़ाते हुए रोज मंत्र बांचता है “या देवी सर्वभूतेष शक्ति रुपेण संस्थिता नमस्तस्ये, नमस्तस्ये, नमस्तस्ये नमोः नमः” का नाटक करते देखा जा रहा है। उसी नाटक की तमाशबीन बनी देश में सर्वोच्च शिखर पर गिनी-चुनी नारियां फुले नहीं समा रही हैं मगर अपने प्राणमित्र रमफेरवा कि फटी साड़ी में लिपटी माई को अभी भी नहीं पता कि विश्वमहिला दिवस क्यों और कब मनाया जा रहा है? अपने देसवा मा ऐसन कानून बने के बादो का गारंटी है कि उसके खेत किसी दबंग द्वारा काटे जाने के बाद जब वह दारोगा जी के पास रपट लिखाने जाएगी तो वह पहले किसी विलेन कि तरह हँसेंगे फिर भगा देंगे। जुम्मन मियां तो समझदार मुसलमान हैं। अक्सर सुनाया करते हैं कि माँ के कदमों के नीचे जन्नत होती है। पर जब उनकी मोहतरमा प्रधान बनीं तो वह सिर्फ कागज़ तक सिमट कर रह गयीं। गाँव में हुकुम जुम्मन मियां का ही चलता रहा। जैसे निकाह के बाद मोहतरमा नकाब में पीछे-पीछे चलती रहीं, आज भी दो बच्चों कि माँ बन जाने के बाद और परधानी का ओहदा सम्भालने के बाद उसी तरह पीछे-पीछे चलती रही और जुम्मन मियां बीवी के आगे-आगे खुद परधानी का शाही ख़िलत में सजे-सवरें शान से ए॰डी॰ओ॰ बी॰डी॰ओ॰ पर रोब झाड़ते रहे।

मतलब यह कि लाख महिला आरक्षण विधेयक कानून का रूप ले ले मगर पुरुष प्रधान समाज का वर्चस्व जैसे का तैसा रहेगा क्योंकि मानसकिता जब तक रहेगी तब तक यूं ही नाटक चलता रहेगा। पौराणिक युग की विदुषियों के समय कहाँ विश्व महिला दिवस और कहाँ महिला आरक्षण के लिए शोर-गुल मचाया जाता था। प्रश्न है पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता बदलने की और नारी समाज को स्वयं सशक्त होने की...।

(नोट: (12/03/2010 को स्थानीय हिन्दी दैनिक ‘जनमोर्चा’ में प्रकाशित)
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शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

आली जनाबों की बल्ले-बल्ले

अपनी अधखुली पलके, मायाजाल को चीरते हुए जब अपने सूबे के आली जनाबों को बल्ले-बल्ले करते देखती हैं तो भूल गया अपने पड़ोसी रमफेरवा, जुम्मन चाचा और फुलमतिया की झाड़ू-बहारू करती माई को। बेचारों ने कितनी बार अपने खाते-पीते मालिकों से दरमाहा बढ़ाने के लिए हाथ-पैर जोड़े लेकिन उनके दिल नहीं पसीजे। फिर भैया पसीजे भी कैसे? ठंडक जो पड़ रही है। इसी ठंडक के सुहाने मौसम में दो पैग गले से नीचे लुढ़काते हुए किसी ने तो फुलमतिया बेसहारा माई से डपट कर कहा ‘अब अगर दरमाहा बढ़ाने का फिर नाम लिया तो समझ लो तुम्हीं को लुढ़का देंगें। काम करना है तो कर वरना अपना रास्ता पकड़ मगर फुलमतिया पर तो तरस खा।‘


अपने दायरे में रहने की तो मैं हमेशा कोशिश करता हूँ लेकिन कमबख्त इस नश्वर शरीर के भीतर धड़कता एक अदद दिल है,जो मानता नहीं। आली जनाबों की बल्ले-बल्ले और वेतन-भत्तों की बढ़ोत्तरी के नाम पर सत्ताधारी और विपक्ष वाले अबीर गुलाल उड़ाते हुए गले मिल रहे हैं। उधर एक विश्वविद्यालय वाले काबिल गुरूजी लोग ठूंठे पेड़ो के नीचे हफ़्तों से भूखों रहकर कफन का जुगाड़ कर रहे हैं क्योंकि राशन वाले की झिड़की दूध वाले की पैंतरे बाज़ी और दूसरे लोगों की फ़ज़ियत से कोई दूसरा चारा भी बाकी नहीं रह गया है इनडाइरेक्ट में वहाँ से हुक्मराम अपनी चरमराती चेयर पर उसी तरह झिड़क रहे हैं जैसे की रमफेरवा, जुम्मन चाचा और फुलमतिया की माई को झिड़का जाता रहा है।

पुराने घिसे-पिचके पनडब्बे से दो सूखी गिलोरयां मुँह में रखते हुए मीर साहब ने ताज़े अख़बार की पुरानी खबर पढ़ते हुए बताया ‘अमां सुना नहीं? अपने सूबे के आली जनाबों (माननीयों) के दरमाहों और भत्तो में ऐसी गोट फिट कर दी गयी है की अब कोई महंगाई की महारानी को कोसने की हिम्मत नहीं कर सकता है। देखो न सब मिलकर जश्न मना रहे हैं। अमां आज डॉ॰ राजेंदर प्रसाद और डॉ॰ राधा कृष्णनन बहुत याद आ रहे हैं जो मुल्क के गरीब गुरबों की भूख महसूस करते हुए बस उतना ही दरमाहा लेना कबूल करते थे जिसमें आम आदमी की तरह दाल रोटी चल सके। मीर साहब की बात पर मैं तिलमिला उठा। कहने लगा भाई मीर साहब आप किस ज़माने का पुराना रिकॉर्ड बजा रहे हैं। वह जनसेवा का ज़माना था और आज अपनी और अपने भाई-भतीजों की सेवा का ज़माना है। मैं कहता हूँ की उनके लिए भी तो महंगाई है। यह अलग बात है की महंगाई उन्होने ही बढ़ाने के लिए शतरंजी बिसात बिछाई और उन्होने ही उस पर ऐसी चाल चली कि दूसरे मात खा गए।

इस गुफ्तगूं के बाद अपने दायरे में सिमट कर सोचने लगता हूँ कि उनको तो पहले से ही मिलता रहा है कि महंगी के बहंगी में हो के सवार गाते रहे, ‘चलो दिलदार चलें... मगर रमफेरवा, फुलमतिया और जुम्मन चाचा से सुपर समझने वाले के लिए तो स्टैण्डर्ड ऊँचा करने आवश्यकता आवश्यक हो जाना जरूरी है भाड़ में जाये रिक्शेवाले,ईंट-गारे ढोने वाले वगैरह-वगैरह। एक बात और मजेदार है कि छठे वेतन पाने के लिए लोगों ने नाक रगड़ डाली, लाठी-डंडे कि मार सही पर कुछ किलियर नहीं हो सका। केंद्र कर्मियों के बहुत हो-हल्ला मचाने के बाद एक आयोग बनाया गया। दो तीन साल लग गए नतीजा आने में,तब से जितना मिला नहीं उससे चौगुना मंहगाई ने पाँव पसार दिए लेकिन सुनने वाला कोई अगर बढ़ने कि कोशिश भी करता तो उसे चुप कराने के लिए रातों-रात अल्लादीन का चिराग का ऐसा घिसा गया कि चिराग का देव हाज़िर होकर पूछ बैठा 'हुक्म दो मेरे आका।’ आका ने आली जनाबों के लिए कारून के खज़ाने का मुँह खोलने का हुक्म दे दिया। उनके लिए हमारा ही पेट काटकर कारुन का खज़ाना बनाया गया। आलीशान पार्क और खूबसूरत मुजिस्समें गढ़े गए मगर हुक्म की तामील करते हुए उनकी झोली में दोनों हाथों से उड़ेल दिया गया और रट लगाई जाती रही कि हम तो पब्लिक के पैरोकार हैं। उनका पेट भरना हमारा पहला फर्ज़ है।

अब न तो कोई चमन उजड़ेगा और न किसी का जहाँ बरबाद होगा। यानी सब ज़ुबानी जमा ख़र्च। ख़र्च तो उन्हें अपना देखना है जबकि बस से लेकर उड़नखटोला तक से यात्रा मुफ्त। टेलीफोन मुफ्त। नाश्ता-खाना मुफ्त। इन सबके बावजूद चिंता किसी आयोग द्वारा विचार किए वेतन भत्तों में गज़ब का इज़ाफ़ा। शान-शौकत का सबूत उनके पीछे बजते हूटर। आली जनाबों की यह है गरीबी तो फिर रमफेरवा जैसों को क्या कहा जाएगा? आज ऐसे ही जनसेवा की छाँव में जम्हूरियत हाई जम्प करते हुए मुस्कुराहट बिखेर रही है और कह रही है कि पहले खुद खा कर डकार लो फिर दूसरों का पिचका हुआ पेट निहारो। गांधी, विनोबा, धीरेंद्र भाई और लोहिया के देश में ऐसे जनसेवियों के क्या कहने? लेकिन भाई सोचना पड़ता है कि...‘जीना यहाँ, मरना यहाँ इसके सिवा जाना कहाँ?’ सबसे अच्छी बात तो यह है की सब दुगुनी बनाने के चक्कर में हैं क्योंकि आखिर आली जनाबों का मुल्क है। वे किसी से पीछे क्यों रहे?

(नोट: 13/02/2010 को स्थानीय हिन्दी दैनिक ‘जनमोर्चा’ में प्रकाशित)
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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

दिमाग़ का फितूर

1- हो सकता है कि यह मेरे दिमाग़ का फितूर हो या मेरा भावुक दिल जो समाज के लोगों में आदत बन चुकी बातों में उलझा रहता है। अक्सर क्या आमतौर से जब कोई लड़की शादी के बाद अपने सुसराल जाती है तो कुछ दिनों तक सबकुछ मामूल के मुताबिक चलता है मगर फिर शिकवा-शिकायत का दौर शुरू हो जाता है। सुसराल पक्ष वाले सारा दोष दुल्हन बनी लड़की पर मढ़ना शुरू कर देते है। लेकिन जब उसी सुसराल की कोई कन्या बहू बन कर दूसरे के घर जाती है तो मायके वाले अपनी बेटी के सुसराल वालो को नाकारा साबित करते हैं। यह दोहरा मापदण्ड क्यों।
2- कहा जाता है कि जनतंत्र में सभी समान होते हैं। भारतीय संविधान अपनी भूमिका में तस्दीक करता है। वहां किसी प्रकार की शैक्षणिक या तकनीकी योग्यता निर्धारित नहीं की गयी है। मगर लगता है कि वे सारी बातें संविधान के सफों तक ही सिमट कर रख दी गयी हैं। हर चुनाव में बस वही घिसे-पिटे और हर तरह से साधन-सम्‍पन्न चेहरों को उम्मीदवारी के लिये हरी झंडी दिखायी जाती है बल्कि अगर गुस्ताखी माफ हो तो कहना बेजा नहीं होगा कि टिकटों की खुलेआम नीलाशायमी की जाती है। ऐसे मे स्वाभाविक है कि जिनके पास धन, छल और बल हो। इस तरह के जनतंत्र में किसी रमफेरवा और किसी जुम्मन मियां को कौन पूछने वाला है जो जमीन से जुड़े रहने के बावजूद जनतंत्र की ज़मीन से महरूम समझे जाते हैं। शायद यहां वंश परम्परा का चलन तो है मगर रिटायरमेन्ट का कोई प्रावधान नहीं है।
3- दहेजप्रथा के जड़ से उन्मूलन के लिये रोज कानून की क़वायदे होती देखी जाती हैं। अनेक स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा अभिनीत नुक्कड़ नाटकों को प्रचार का माध्यम बनाया जाता है। फिल्मों के बोतल में दहेज-भूत को जलाने का दृश्य प्रस्तुत कर के भुक्तभोगियों को तसल्ली दी जाती है पर ताज्जुब होता है कि यह खून चूसने वाले पिशाच से समाज को निजात क्यों नहीं मिल पा रही है। शायद इसलिये कि क़ानून बनाने वाले सम्भ्रान्त लोग इस आतंकवाद को खतम नहीं करना चाह रहे हैं क्योंकि पुत्र होने पर वह गहरी नींद में खो जाते हैं और पुत्री के समय वे जाग कर देखे हुये नुक्कड़ नाटक के दृश्य अच्छे लगते है। वाह ऐसे समाज का क्या कहना।

सोमवार, 29 दिसंबर 2008

किस्सा-ए-बैकडोर

एक डाल पर तोता बोले, एक डाल पर मैंना। मैंना ने तोते से कहा, प्रियतम जब तक आतंकवाद में फायर झोंकने के लिये लोग क़वायद कर रहे हैं कोई किस्सा-कहानी सुनाते रहो वरना फिर इलक्शन के भोंपुओं में न मैं तुम्हे सुन सकूंगी और न तुम मुझे। तुम डाल-डाल तो हम पात-पात उड़ते फिरेंगे। तोते ने गरदन घुमाकर कहा, कहानी-किस्सों पर अब कौन ध्यान देता है प्रियतमे। आजकल तो पोस्टरो और बैनरो का ज़माना है। शार्टकट देखकर लोग सब कुछ समझने के आदी बन गये हैं। लेकिन मेरी प्यारी मैना ग़ौरतलब बात यह है कि सिर्फ पोस्टर-बैनरों को देखकर उछलते हुये गाना जब ऐसे चिकने चेहरे, तो कैसे न नज़र फिसले, जिन मेरिए, कोई बुद्धिमानी नहीं है। चाहिये हक़ीक़त की गहराई में डुबकी लगाने की। पर आजकल किसी को फुरसत कहां है। सब चाहते है कि बिना पानी में उतरे ही तह में से कीमती से कीमती शंख सीप मोती झोली में आ जायें। क्योकि मामला बैकडोर का ऐसा है जिससे लाठी टूटने की नौबत भी न आए और सांप भी मर जाये। बस यहीं से किस्सा-ए-बैकडोर चालू होता है।
कई वर्षो पहले की बात है। गया का शर्मा होटल पूरे बिहार में प्रसिद्ध था। खूब टिपटाप। काफी फसकिलास किस्म के लोग अपना मनपसन्द खाना खाने वहां जाया करते थे। चन्दन-तिलक लगा और झकाझक श्वेतवस्त्र धारण करके स्वयं श्रीमान शर्माजी अपनी गद्दी पर विराजमान रहा करते थे। इत्तिफाक से एकदिन किसी यात्री की थाली में छोटी-छोटी मुलायम उँगलिया मसालेदार शोरबे में मिलीं तो हड़कम्प मचगया। रातोंरात गया का शर्मा होटल सुपरस्टार बनकर चर्चा का विषय बन उठा। काफी तहकीकात के बाद होटल के बैकडोर में एक ऐसे कुँये का पता चला जो अत्यन्त मासूम बच्चों की लाशों से पटा पड़ा था। न जाने कब से बैकडोर से यात्रियों की चमचमाती थाली में मासूमों का मांस परोसा जा रहा था। मासूम मैना किस्सा सुनकर चिहुंक उठी। तोतेचश्म तोता बोला, अरे मेरी प्यारी अनारकली एक बिहार के शर्मा होटल के बैकडोर का किस्सा सुनकर तुम दहल उठी। ज़रदारी की तरह कितना कमज़ोर दिल है तुम्हारा। मैना प्रिये, उस दिन राजधानी के आँचल में आबाद नोयडा के निठारी काण्ड को हाईलाइट करने में तो तुम खूब फुदक-फुदककर चैनलवालों को जोश दिला रही थी। क्यों। अरे इसमें चिहुँक उठने की क्या बात है मेरी हीर, मैं हूँ न। हॉ यह जरूर है कि भोपालवालों की तरह निठारीवालो को भी बैकडोर मे पकती खिचड़ी के स्वाद से महरूम रहना पड़ रहाहै।
आजकल चन्द्रकान्ता संतति की तरह किस्सा-ए-बैकडोर को पढ़ना लोग खूब पसन्द कर रहे हैं। है भी रास्ता बैकडोर का बड़ा दिलचस्प। रास्ता वैसे है तो जरा घुमावदार, पर थोड़ी सी कोशिश करने पर मनचाही मंजिल मिलते देर नहीं लगती है। मैना मन ही मन प्रफ्फुलित होकर बैकडोर के और भी दिलचस्प किस्से सुनने के लिये मचल उठी। तोताराम ने ऐसे किस्सो का पुलिन्दा खोलना शुरू कर दिया। मेरी हमदम प्यारी मैना आम लोग तो इलेक्शन हार जाने के बाद ठिसुआ कर बैठ जाते हैं पर जिनमें जरा भी दम-खम और बैकडोर की चक्करदार सुरंग में धंसने की फितरत होती है वह बैकडोर से पहुंच जाते है अपर हाउस की चौखट तक। इम्तहान में फेल होने पर भी प्रथम श्रेणी के कालम में उनका नाम छप जाता है। और भी दिलचस्प किस्सा यह है कि सफेदपोशी के बैकडोर से वे प्रदेश के माफिया होने का तमग़ा हासिल कर रातोंरात सुपरस्टार बन जाते हैं। बड़े अजीब अजीब किस्से हैं। सुनाने लगेंगे तो ज़िन्दगी तमाम हो जायेगी मैना। अब देखो न, मुल्क में तमाम बेरोजगार मुंशीपल्टी की ऊबड़-खाबड़ सड़क पर रोजगार की तलाश मे भटकते नज़र आते हैं। कर्जा-पानी लेकर आवेदन-पत्र भरते हैं। पर पेपर आउट होने के हंगामे से सिर्फ निराशा हाथ लगती है। लेकिन बैकडोर का करेक्ट पता जिन्हे मिल जाता है वे सरकारी दामाद बनकर मौज मारते दिखायी देते हैं। कभी किसी की नज़र में चढ़ गये और हो-हल्ला मचा तो मुअत्तली के मुहाफिजखाने में जमा करा दिये जाते है। मगर भला हो बैकडोर का कि बैकडोर से उनकी फाइल न जाने कहाँ चोखा-बाटी खाने चली जाती है। इंक्वायरी आफिस खोल दिया जाता है, कमीशन की कबूतरबाज़ी चलती है और मेरी दिलोजान से प्यारी मैना, उधर बैकडोर में चिकन-बिरयानी पकती रहती है बिल्कुल गया के शर्मा होटल की तरह। तोते मियाँ ने एक बार गर्दन घुमाकर उधर जेल की चहारदीवारियों के पार देखा तो बड़े तरून्नुम से अपनी मैना का दिल जीतने के लिये कहा लो बैकडोर का एक और किस्सा याद आ रहा है। मैना फुदक कर उसी डाल पर बैठी जिस पर तोता बैठा था। उसने धीरे से तोते के कान में कहा, प्रियतम यह लोग तो वही नामुराद लोग हैं जो गाँव के गरीब लोगों की बहू-बेटियों की सरेराह इज्ज़त लूटी थी। अरे यही तो मैं भी बता रहा था। गौर से देखो कैसी मस्ती उड़ा रहे है। हम जैसे निरीह प्राणी पिंजड़े के नाम से कांपने लगते है पर इनके लिये तो जेल नहीं किरकिट का खेल है। तोते ने मैना की बात छीन कर कहा य़ह सब कमाल बैकडोर का है मेरी सोनिये। जब कभी जनपद के ज़िल्लेदारों की जमात जागती है तो अखबारनवीसों को इकठ्ठा करके लाइन क्लीयर का गुडफील करा दिया जाता है, काग़ज़ की कश्ती में सबकुछ सुरक्षित बता कर समीक्षा कर दी जाती है लेकिन बैकडोर से गाना बजता रहता है सब गोलमाल है भाई सब गोलमाल है। समझ में आया कुछ मेरी भोली मैना। यही समझ लो कि सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का। कहाँ-कहाँ किस्सा-ए-बैकडोर की हक़ीक़त जानने के लिये माथा खपाती फिरोगी। बैकडोर का किस्सा अगर सुनाया जाये तो सास भी कभी बहू थी के एपीसोडों की तरह खिचता चला जाएगा। बैकडोर के लिये सुना जाता है कि सागर-मन्थन के समय यह भी एक अमूल्य रत्न निकला था जिसे बाद में अलादीन के जादुई चिराग़ की तरह एक हैरतअंगेज़ चिराग़ बनाकर हिन्दुस्तान की जम्हूरियत के पार जाने के लिये हिफाज़त से रख दिया गया था। कल तक शान्ति, न्याय और भाईचारे के नाम पर गले मिलने वालो ने ताबड़तोड़ कई धमाके किये तो उठते जानलेवा धुयें मे न रहा तोता, न रही मैना। रह गया ब्लैकहोलों की तरह बस बैकडोर जिसमें आज भी कुछ लोग तन्दूर में रोटी सेंकते नज़र आ रहे हैं। कौन पूछता है तोता-मैना की कहानी।

बुधवार, 24 दिसंबर 2008

कहानी की कथावस्तु

कहानी की कथावस्तु मध्यकालीन हिन्दी कवि घनानन्द और नर्तकी सुजानबाई की प्रेम-कहानी पर आधारित है। वह समय था मुग़लसम्राट मोहम्मद शाह रंगीले का। रंगीन मिजाज-बादशाह के दरबार में घनानन्द मीर-मुंशी जैसे अहम ओहदे को सम्भाल रहे थे जबकि सुजानबाई शाही रक़्क़ासा के ख़िताब से नवाज़ी गई थी। दरबारी कवि यानी बादशाह के मीरमुंशी घनानन्द गाते अच्छा थें। धीरे-धीरे दोनो मुहब्बत के आगोश में सिमटते चले गये। मुहब्बत की राह में रोड़े तो आ ही जाते हैं। दोनों की परवान चढ़ी इस मुहब्बत को देख कर कुछ दरबारी जलने लगे।
एकदिन जब दरबार लगा हुआ था और रंगीनमिजाज़ शंहशाह का मिज़ाज़ गीत-संगीत सुनने के लिये बेक़रार हुआ जारहा था, तो एक खास दरबारी ने बादशाह से मीरमुंशी घनानन्द के गाने की इल्तजा कर डाली। शंहशाह ने घनानन्द को गाने का हुक्म दिया। वह चुपचाप बैठे रहें। एक दरबारी ने तज़बीज़ पेश करते हुये कहा कि हुज़ूर साज़ के बिना आवाज़ में फीकापन होता है। यक़ीन मानिये कि शाही रक़्क़ासा सुजानबाई के आते ही मीरमुंशी की जादूई आवाज़ फिज़ां को खुशगंवार बना देगी। सचमुच वही हुआ। सुजान को दरबार में तलब किया गया। उसे अपने सामने देखते ही घनानन्द ने गाना शुरू कर दिया। शंहशाह बाग़-बाग़ हो उठे। लेकिन बेखुदी में भूल गये कि वह बादशाह की तरफ पीठ और एक रक़्कासा की तरफ रूख़ करके गारहे थे जो कि दरबारी वसूलों के ख़िलाफ था। शंहशाह ने घनानन्द के इस ज़ुर्म के लिये सज़ाएमौत का हुक्म सुना दिया। बाद में दरबारियों की अपील पर उसे दिल्ली छोड़ कर जाने का हुक्म सुना दिया। बाहुक्म शंहशाह के घनानन्द राजधानी दिल्ली से चलते वक्त सुजानबाई को भी साथ चलने को कहा लेकिन सुजान ने साफ इंकार कर दिया क्योंकि उसे शाही रक्कासा के रूतबे पर बेपनाह नाज़ था। घनानन्द शाही पद छिन जाने के बाद महज़ एक मामूली सड़कछाप कवि या गीतकार रह गया था। सुजानबाई की इस बेवफाई पर घनानन्द को बड़ा धक्का लगा। आखिरकार उसने वृन्दावन की राह पकड़ ली। घनानन्द कृष्णभक्ति मे लीन हो गये। पर उनकी सारी रचनायें बृजभाषा में सुजान को सम्बोधित करके होती थीं। यानी अपनी प्रेमिका सुजान के माध्यम से वह कृष्ण को पाना चाहते थे। वृन्दावन की गलियों मे उनके गीत गूँजा करते थे। सुजान के प्रेम में वह पागलों की तरह दर-दर की ख़ाक छाना करते थे।
उसी समय दिल्ली पर नादिरशाह का हमला होगया। उसने खुलकर क़त्लेआम किया। किसी ने उसे बताया कि वृन्दावन में बादशाह के मीरमुंशी के पास अकूत दौलत है। नादिरशाह की फौज उधर बढ़ी। कत्लेआम का खौफनाक खेल चलता रहा। उसके ज़ुल्मी सिपाहियों ने जब घनानन्द से जर्र यानी दौलत की मांग की तो उसने वृन्दावन की तीन मुठ्ठी धूल देते हुये कहा कि मेरे पास इस रज यानी मिट्टी के सिवा कुछ भी नहीं है। चिढ़कर नादिरशाह के सैनिकों ने घनानन्द के दोनो हाथ काट दिये।
उधर नादिरशाह के क़त्लेआम से भयभीत होकर लोग दिल्ली से भागने लगे। ऐसे ही भागनेवालों का एक काफिला मथुरा-वृन्दावन की तरफ से गुज़र रहा था जिसमें कई दरबारियों के साथ सुजान भी थी। अचानक उसकी नज़र तड़पते हुये घनानन्द पर पड़ी। घनानन्द तड़पते हुये गा रहा था अधर लगे हैं आनि के पयान प्रान, चाहत चलत ये संदेसो लै सुजान को । सुजान यह दुर्दशा देखकर घनानन्द की तरफ दौड़ी ही थी कि नादिरशाह के सैनिको ने फिर हमला बोल दिया। लोगो में भगदड़ मच उठी। भीड़ धक्का-धुक्की में गिरते-पड़ते घनानन्द का नाम ले-लेकर चिल्लाती रही। भीड़ के एक झोंके से वह घनानन्द के शरीर पर गिर पड़ी। दोनो को रौंदते हुये लोग भागे चले जारहे थे। फ़िजाँ मे घनानन्द के शब्द गूँज रहे सुजान।

सोमवार, 8 दिसंबर 2008

आखिर क्या चाहते हैं आतंकवादी?

मैं आज तक नहीं समझ सका हूँ कि सरेराह चलते-चलते आतंकवादी चाहते क्या है। वे किस अनजानी मंजिल की तलाश में अल्लाह के बन्दों को बेवक्त मल्कुन मौत को बतौर तोहफा दे रहे हैं। क्या उन्हे नही मालुम कि हश्र के दिन जब उनसे अल्लाह ताला उनके नापाक इरादों के बारे में पूछेगा तो वे क्या जवाब देंगे।
यूँ तो आतंकवाद का खौफ कोई नया नहीं है पर इसके मुखौटे बदलते रहे हैं। पौराणिक युग में आतंकवाद का पर्याय राक्षसवाद माना जाता था। उस धार्मिक-युग में उन ऱाक्षसी प्रवृति वाले आतंकवादियों का काम साधु-सन्तों तथा धार्मिक लोगों के अनुष्ठानों में विघ्न डालकर भयभीत करना हुआ करता था। इस्लाम भी इससे अछूता नहीं रहा। दीने-इस्लाम का प्रचार जब शुरू हुआ आतंकवादियों ने ही पैगम्बरे-इस्लाम हज़रत मोहम्मद साहब को मक्के से मदीना जाने पर मज़बूर किया था। आतंकवाद की एक और मिसाल करबला के मैदान में देखने को मिलती है जहाँ हसन और हुसैन को सपरिवार तड़पा-तड़पा कर मारा गया। ईसामसीह और उनके चाहनेवालों को किसने सूली पर लटकाया। वहाँ भी किसी न किसी रूप में आतंकवादी प्रवृत्ति का आभास मिलता है। उस समय भी आतंकवाद के उन विभिन्न रूपों से आतंकित लोगो ने उसे जड़ से मिटाने की जी तोड़ कोशिश की थी मगर प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हुआ। शायद ऐसी ही राक्षसी प्रवृत्ति वाले आतंकवाद को समूल रूप से नष्ट करने के लिये देवासुर संग्राम हुआ था और दावा किया गया था कि पृथ्वी को आतंकवाद से पूरी तरह मुक्त कर दिया गया।
आज जब दुनिया सभ्यता के चरमोत्कर्ष पर उड़ान भर रही है, हर कोई इन्सानियत की माला जपते दिखाई दे रहा है और पिछले विश्वयुद्धों की तबाही-बरबादी से द्रवित होकर विश्व-बन्धुत्व को जीवन से जोड़ने का भगीरथ प्रयास करने में जुटा दिखाई दे रहा है तो फिर सबके बावजूद आतंकवाद की बेहयायी कंटीली झाड़ियाँ क्यों सरसब्ज होरही हैं। कौन इनमें खाद-पानी दे रहा है। आदम की औलादों में इतना अन्तर क्यों। आखिर आतंकवाद की नापाक राहों पर क़दम बढ़ाते लोगों का मक़सद क्या है। मुझे तो ऐसा लगता है कि जरूर इसमें किसी ऐसी महाशक्ति का हाथ हो सकता है जो बैकडोर से भाई को भाई से और पड़ोसी को पड़ोसी से मिलकर रहने नहीं देना चाहता है। शायद वही बात कि चोर से कहे चोरी करो और साह से कहे जागते रहो। इस खतरनाक मुद्दे पर दुनिया भर के इन्सानियत-प्रिय लोगों को खुले मन से बहस करना चाहिये क्योंकि जैसे आज हमे मुम्बई पर आंसू बहाना पड़ रहा है, हो सकता है कि कल कँराची, दुबई, पेचिंग या मारीशस की आबाद सड़कों पर तड़पती लाशों पर मातम न करना पड़े। अन्त में गहन मन्थन के बाद यही निष्कर्ष निकलता है कि मरदूद आतंकवादी अपने आँका शैतान के हाथों मे खेलते हुये इन्सानियत को खत्म करके बीरान-बंजर ज़मीन पर हुकूमत करने का ख्वाब देख रहे हैं। मगर कबीर की उस बानी को हमेशा याद रखना चाहिये कि मुआ खाल की सांस से लौह भस्म होय जाय।

शनिवार, 6 दिसंबर 2008

लाश वही, कफ़न बदला है

युग बदला। समय के साज़ पर नवगीत की नयी तान छिड़ी। खोटे सिक्को की खनक से ध्यान हटा। नये चमकदार सिक्कों पर ध्यान जमा। किसी ने ठीक ही कहा था कि नये सिक्के पुराने सिक्कों को चलन से दूर कर देते हैं। अब यही बात अपने ही लिखित एक नाटक के उस संवाद से सिद्ध हो जाती है जिसे नाटक के एक पात्र जोसेफ द्वारा कहलाया जाता है —"सैकरीफाइस करने वाले हिस्ट्री के पन्नों में खोगये और जो बचे  भी हैं वे गन्दी सी बस्ती के टूटे से घर में जिन्दगी की आखिरी घड़ियाँ गिन रहे हैं।" क़ाबिलों के क़बीलेवाले अक्सर कहा करते हैं कि इतिहास के पन्ने हमेशा अपने आगोश में पुरानी यादों को ज़िन्दा रखते हैं। पर आजकल वे सब सिर्फ किताबी बातें रह गई हैं।

इतिहास  की बात उठती है तो सिकन्दर से लेकर सामन्ती-सरबराहों की बहुत याद आतीहैं। उनके अकूत खजाने की कहानियाँ, ऊँची हवेलियों का तामीरी-शौक और ज़ुल्मोसितम की दिल दहलाने वाली हनक आज भी याद आती हैं। फर्क बस इतना है कि उस ज़माने में गद्दीनशीन होने के लिये बाकायदा तिलक किये जाने की रस्म का चलन था पर आज तिलक नहीं सिर्फ एक अदद काग़ज यानी बैलेटपेपर की जरूरत होती है। भगवान भला करे उनका जिन्होने इतिहास के पन्नों की हिफ़ाजत के लिये दिलकश जिल्द बदल कर पुरानी किताबो को अपनी मेज़ पर सजा रखा है। वही पुराने पन्ने, वही पुरानी तस्वीरें और वही शाही- खिलत में रोबीले नाक-नक्श वाले तख्तनशीन शाह से लेकर शंहशाह तक। कोई माने या न माने अपने को पक्का यकी़न हो गया है कि हक़ीक़त में ज़माना तब्दीलियो के आगोश में खेल रहा है। आदि मानव पथरीली चट्टानों और बियाबान जँगलात  को पार करता हुआ आज के कंकरीटी और इस्पाती जंगलो मे ठहर कर अपना बसेरा बसाने की धुन में पागल हुआ दिख रहा है। इस लम्बे बहुत लम्बे सफर में कुदरत ने उसके नाक-नक्श में भी बहुत से परिवर्तन कर डाले मगर उसके ईगो में कोई फर्क नहीं आया। राजतंत्र से क़दम बढ़ाते हुये उसने प्रजातंत्र की चौखट पर पहुँचकर अपने को बहुत खुशनसीब समझा पर उसके अन्दर बैठा किसी शहंशाह का वजूद नहीं बदल सका। दूसरी तरफ लाचार बेसहारा ईगोरहित मज़बूर बिलबिलाते इन्सानी कीड़े दिखाई देते हैं। जिनका वजूद सिर्फ इन्सानी खाल में दबा-कुचला छुपा होता है। आखिर में मजबूर होकर कहना पड़ता है कि लाश वही है सिर्फ कफन बदला है। यह सही है कि राक्षसी प्रव्रृत्ति वाले राजा और शहंशाह जमींदोज़ हो गये मगर उनकी नापाक रूहें आज भी आदम की अहंकारी औलादों के भीतर किसी कोने में बैठी वही पुरानी हनकभरी शानशौकत की याद दिलाया करती हैं। बस फर्क इतना सा है कि उस वक्त दुधारी शमशीर देखकर प्रजा नाम की चिड़िया अपने घोंसले में दुपक जाया करती थी और आज जनता हिम्मत के साथ पंख फड़फड़ाकर उड़ने का जतन तो करती है मगर थक-हार कर किसी कोने में मुँह छुपाने की जुगत में बेसुध दिखती है। लेकिन वहाँ भी गोली-बन्दूक से लैस शिकारी अपनी नापाक फितरत से बाज नहीं आते हैं कभी किसी जाति विशेष का मुखौटा लगा कर, कभी किसी खास धर्म-मज़हब की दुहाई देकर और कभी किसी खासमखास प्रान्त की कँटीली झाड़ियो में छुपकर। प्रजा नाम की हरदिलअज़ीज़ भोली-भाली पंख फड़फड़ाती चिड़िया को जनता नाम से जन्नत का लालच देकर सियासत के खूबसूरत पिंजड़े में कै़द कर लिया गया। नतीजा यह है कि न उसे सरसब्ज डालियों पर फुदकने का मौका मिला और न परवाज़ करते हुये जन्नत का लुत्फ उठाने का। मौजूदा शाहो- शंहशाहो का तुर्रा यह कि हम अपनी जान देकर भी तुम्हारी हर मुमकिन हिफाज़त करने से पीछे नहीं हटेंगे। फटेहाल और गूंगी जनता के बीच जब कोई चिल्लाता है कसमें,वादे, प्यार-वफा सब झूठे हैं, झूठों का क्या तो लोग उसे पागल दीवाना मानकर टाल जाते हैं या किसी पागलखाने के सीखचों के भीतर ढकेल देते हैं।

प्रजा का बदबूदार चेहरा बदल कर जनता को बेपनाह हसीन मेकअप चढ़ाया तो गया और उसे सियासती शामियाने मे सामने पड़े सोफों पर बैठाकर फोटो पर फोटो खीचते हुये दुनिया को बताने की पुरजोर कोशिश की गयी है कि यह जनयुग है और आज सबकुछ जनता के लिये, जनता का, जनता के जरिये चल रहा है पर जब अधर्मी कारबाइनों से  आतंकी नापाक गोलियाँ बरसती हैं तो सीधे जनता के सीने को छेदती है। क्योकि उन गोलियां उगलती मरदूद कारबाइनों के सामने होती है सीधी-सादी निहत्थी जनता। रही आधुनिक शाहो-शंहशाहो की बात तो रूप उनका चाहे जो भी बदल गया हो पर आदतन शाही लबादा और मखमली जूतियाँ पहनने में देर लगना स्वाभाविक है।

विश्वामित्र से लेकर बुश तक ने आतंकवाद को नेस्तनाबूद करने के लिये न जाने क्या-क्या दाँव-पेंच चलाये और राजाओ-महाराजाओ ने प्रजा की रक्षा के लिये कभी-कभी तुष्टिकरण-नीति के अन्तर्गत सन्धि का सरगम भी अलापा मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात जैसा हासिल हुआ। फर्क इतना जरूर हुआ कि विश्वामित्र के समय में डिस्टर्ब करने लिये मारीच जैसे आतंकवादी समाज के भले लोगों के बीच राक्षस कहे जाते थे और आज के सभ्यता की बुलन्दी को धराशायी करने का नापाक खेल खेलने वाले उग्रवादी या आतंकवादी। मतलब यह कि लाश वही है सिर्फ कफ़न बदल गया है। महाबली रावण से लेकर नादिरशाह,  अब्दाली, हलाकू और चंगेज़ी जलाल ने निर्दोषो का कत्लेआम भी किया बिल्कुल डायरेक्ट नरेशन में लेकिन आज के आतंकवादी तो इनडायरेक्ट नरेशन में कब किसके हवनकुंड में अंडों के साथ कूद पड़ेंगे कुछ पता नहीं और हमारी रक्षा के कसमें-वादे खाने वाले इसी उधेड़बुन में पड़े उँघते दिखायी देते है कि लाठी भी न टूटे, साँप भी मर जाये। मेरा अपना ख्याल है कि राक्षसी-प्रवृति तब भी थी, आज भी है और कल भी रह सकती है। रूप भले अलग-अलग हो। न जाने कब देवासुर-संग्राम के लिये रणभेरी बजे। अभी तो यही सोच बनती है कि वक्त के अनुसार सबके सिर्फ आज कफ़न बदल गये हैं, लाश वही पुरानी सड़ी-गली है। लाश राजा-महाराजाओ की भी हो सकती है और आज के महाराक्षसों की भी।

मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

पीता नहीं हूं, पिलायी गयी है

हालांकि किलिष्ट या जबड़ा दुखन साहित्य के ठेकेदार मेरी लिखावट को बहुत सस्ती और सतही समझते होंगे मगर मैं भी अपनी आदत से लाचार हूँ। करूं तो क्या करूं। खैर छोड़िये। किसका-किसका मुंह पकड़ता फिरूं। बात असल में यह है कि अभी कुछ ही दिन पहले बजुबानी अपने अखबारनवीसों के आबकारी-आयुक्तों की एक महफिल सजी। पता नहीं क्यों मियां आबकारी विभाग का नाम कान में पड़ते ही जुबां पर बरबस वह गाना आ जाता है ‘मुहब्बत में ऐसे क़दम लड़खड़ाए ज़माना यह समझा कि हम पी के आये।’ क़दम के साथ कलम का बहकना बिल्कुल बटनेचुरल है भाई। ख्वाबों-ख्यालों में बस साक़ी, शराब, मयखाना और पैमाना के तसव्वुर करते रहने को दिल चाहता है। जी हुजूर, तो मैं उस खास ख़बर की तरफ अपने चाहने वालों को मुख़ातिब करना चाहता हूँ जिसमें आबकारी-आंगन में टंगड़ी पसारे बैठे आला हाकिम ने अपने मातहतो के पेंच कसते हुये कहा था कि जाम से जाम टकराने में कोई कोताही नहीं बरती जानी चाहिये। यानी शराब की खपत बढ़ायी जानी चाहिये। अगर खपत नहीं बढ़ी तो समझ लो किसी को बख्शा नहीं जायेगा। किसी भी तरह राजस्व बढ़ाने की बागडोर सम्भालना पड़ेगा। खबर पढ़कर दिल झूम उठा। उसके आगे की खबर पढ़कर तो याद आ गया कि ‘न पीना हराम है न पिलाना हराम, पीने के बाद होश में आना हराम है।’ सुनकर बेपनाह खुशी हुयी कि अब आज़ादी परवान चढ़ रही है। अभी तक तो शादी-ब्याह और बर्थ-डे पार्टियों में मेरी उम्र के नौजवान कुछ दकियानूसी बुजुर्गों से बचबचा कर पिया करते थे मगर अब उन्हें पूरी छूट के साथ गटागट गले में ढकेलने पर कोई पाबन्दी नही होगी, चाहे बीयर हो या शराब। क्योंकि सवाल राजस्व बढ़ाने का है। नशाबन्दी और मद्यनिषेध का हो मुँह काला। आबकारी वालों ने आखिर देर-सबेर उन पंक्तियों पर ध्यान तो देने की ठानी कि जितनी दिल की गहराई हो उतनी मादक हो मधुशाला। सुना है कि इन दिनों आबकारी के आला हाकिमों को उठते-बैठते बस उमरखैयाम और मियां ग़ालिब के सपने आते हैं। वे जानते हैं कि इससे दो बातें हो सकती हैं। एक तो यह कि उन मरहूम ग्रेट पियक्कड़ ब्रांड अम्बेस्डर लोगों के नाम से मयखानों की तादाद में खूब इज़ाफा होगा, लोग खूब छककर पियेंगे। दूसरे, राज्य का राजस्व बढ़ेगा। मुझे तो कभी-कभी ऐसा लगता है खपत बढ़ाने की गरज से आबकारी वाले सरेराह बस-कन्डक्टरों की तरह चिल्लाते नज़र आयेगे बच्चे ‘दो बूँद जिन्दगी की’ पियें और बूढ़े-जवान जिन्दगी को रंगीन बनाने के लिये शराब को ‘सोमरस’ समझ कर दिल खोलकर पीने की आदत डालें। याद रखें इससे प्रदेश का राजस्व बढ़ेगा। राजस्व बढ़ेगा तो अपने उत्तम प्रदेश मे उत्तम-उत्तम पार्क बनेंगे, भवन बनेंगे और जीते जी बुतों में अपना वजूद देखकर खुशी के इज़हार करने की तमन्ना पूरी होगी। इन सब के लिये आबकारी महकमे से बढ़िया और कोई हो ही नहीं सकता है। अपनी तो राय है कि बिजलीवाले सीधे-सादे शहरियों के घरों के मीटर जबरन बदलकर और टंकियों में पानी के बदले दारू भरकर खूब राजस्व वसूला जा सकता है। आबकारी हाकिमों को डांट पीना-पिलाना कोई बेजा नहीं है। क्या बतायें कि अपने आबकारी आसमान पर परवाज़ करते हाकिमों को ज़माना बदल जाने के बाद आज भी कच्ची दीवारों पर पक्की स्याही से लिखी वही इबारत दिखायी दे रही हैं कि बाप दारू पियेगा, बच्चे भूखों मरेंगे या शराब हराम है वगैरह-वगैरह। अरे भय्या ज़माना पीने-पिलाने का है। अब तो रंगीन पानी से मिजाज़ रंगीन करने का वक्त आ गया है। पानी पिलाने का काम तो अब सरकारेआलिया का है। क्या खूब। ठीक भी है कि ‘बैर बढ़ाते मन्दिर-मस्जिद प्यार बढ़ाती मधुशाला।’ मरहूम बच्चनजी ने मधुशाला की चौखट पर किसी और नज़रिये से दस्तक दी होगी मगर अपने आबकारी वाले लाडले मधुशाला की हाला राज्य के राजस्व बढ़ाने के लिये उड़ेलने पर लगे हैं।
पहले लोग भंग की तरंग मे ‘जय-जय शिवशंकर कांटा गड़े न कंकड़’ गाते हुये झूमते दिखायी देते थे और दम मारों दम चिल्लाते हुये अलखनिरंजन की अलख जगाया करते थे। गजब की मस्ती देखने को मिलती थी पर अब क्या खूब बहकती बातों के साथ बहकते क़दम की दिलफरेब सीन देखने को मिला करेगी। वैसे भी देशी-विदेशी पीने के बाद अंगरेज़ी अपने आप दुरूस्त हो जाती है। सींकिया पहलवान के बदन पर भी मांस के लोथड़े यूं चढ़ जाते हैं कि बड़े-बड़े जिम जाने वाले बौने नज़र आते हैं। यह सब कमाल होगा शराब की खपत बढ़ाने और राजस्व में इज़ाफा होने पर जैसा कि बकौल आबकारी अफ्सरान के सुनने में आ रहा है। चलिये एक बात जेहन में आती है कि आल्हा-ऊदल के ज़माने में बिन पिये ही शादी-ब्याह के मौको पर शमशीरें लहू से अपनी प्यास बुझाया करती थीं मगर अब इस तालीमयाफ्ता अत्याधुनिक युग में देशी-विदेशी छक कर पीने पर शमशीरों की जगह गोली-बन्दूकें अपनी प्यास बुझाती दिखेंगी। ऐसे नाजुक मौको पर बेचारी अपनी पुलिसिया बिरादरी तमाशबीन बनी देखती रहेगी, क्योंकि मामला आड़े हाथों आ जायेगा राजस्व का। मेरे जैसे घनचक्कर तौबा तोड़ने वाले झूमते हुए शामियाने के बाहर गाते दिखेंगे ‘मुझे दुनियावालों शराबी न समझो, पीता नहीं हूं पिलाई गयी है।’ मद्यनिषेध और नशाबन्दी का पहाड़ा पढ़ने वाले कंठी-माला के साथ हड़ताल की करताल बजाते हुये गाते रहें कि बदली-बदली मेरी सरकार नज़र आती है मगर राजस्व बढ़ाने के शोर-शराबे में सब गुम होकर रह जायेगा। शाबाश, ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ राजस्व का रस्सा खींचने में। अब भूल जाना ही बेहतर होगा कि इस देश की माटी सोना उगले, उगले हीरे-मोती। भय्या अब दारू की दरिया मे गुसुल करने की आदत डालना होगा।

शनिवार, 15 नवंबर 2008

बीमारी ठहर के समझने की

अपने यहाँ सबसे बढ़िया बात यह है कि कोई बात समझ में आती है लेकिन ज़रा ठहर कर। वैसे तो यह है सचमुच फसकिलास बात पर क्या कहते हैं वह कि आई. क्यू. वाले वायरस के आधार पर बताने वाले इसे बड़ी ख़तरनाक बीमारी बताते हैं। अपनी फिल्मों में भी जब किसी करेक्टर के मरने का सीन आता है तो बड़ा मज़ा आता है। वहाँ मल्कुनमौत यानी श्रीमान यमराज जी पूरा डॉयलाग करेक्टर के बोलने तक बड़े सब्र के साथ हाथ बाँधे इन्तज़ार करते रहते हैं। डॉयलाग खतम होते ही उन्हे रूह कब्ज करने की याद आती है। बात वही कि ज़रा ठहर कर उनकी समझदानी का दरवाजा खुलता है। इसी तरह अपने मोहल्ले की चौकी के चौके पर बैठे दरोगा बाबू किसी की दर्दे-दास्तान ‘दास्ताने-अलिफलैला’ की तरह सुनते तो बड़े ध्यान से हैं मगर समझ में कुछ न धँसने के कारण फरियादी को धीरे से टरका देते है। कुछ देर बाद जब बड़े हाकिम के फोन की घण्टी घनघनाती है तब दरोगाबाबू की समझ के नट-बोल्ट कसने शुरू हो जाते है। तब रपट लिखने के लिये उनकी कलम दौड़ लगानी शुरू करती है। हर जगह नकली अर्श से फर्श तक यही किस्सा पुराना देखने को मिलता है। अब बतौर नज़ीर हाज़िर है अपनी इकलौती गंगा। ‘राम तेरी गंगा मैली हो गई’ पापियों के पाप धोते-धोते सुनते-सुनते जब यमुना किनारेवालों के कान पक गये तो उसके लिये राष्ट्रीयता के नाम पर खुद गाना शुरू कर दिया ‘गंगा मैय्या तोहें पियरी चढ़इबों’। यह हुई न बात। देर आयद दुरूस्त आयद। क्या किया जाए बीमारी ही ऐसी कमबख्त लग गई है कि समझ में बात आती है मगर ज़रा ठहर कर। अपने बाप-दादे ‘हर हर गंगे’ कहते-कहते मर-खप गये मगर किसी को याद नही आया कि आदिकाल से इस देश में गंगा पतित-पावनी मान कर पूजी जाती रही है। एक अलग पहचान रही है। तभी तो किसी ने गाया था ‘हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है’
इसी तरह जब सुनने में आता है कि फलाँ को मरणोपरान्त मुल्क के सबसे बड़े इनाम-इकराम से नवाज़ा जा रहा है तो ठठाकर हंसने को जी चाहता है। भाई कमाल है कि रहती जिन्दगी तक उसकी क़ाबिलयत तौलने के लिये किसी को तराजू का बटखरा नहीं मिला। तभी तो शायद किसी को याद आया होगा—‘जीना मरना तेरी गली में’, मरने के बाद चर्चा होगा तेरी गली में। है न कमाल की बात कि किसी की प्रतिभा को नवाजने की याद तब आती है जब कोई कब्रिस्तान की चौखट लाँघकर रूहपोश होजाता है। कुछ दिन पहले इसी तरह अपनी गोमती की याद कुछ लोगो को आई तो जुट गये अफसर से लेकर मातहत तक झाड़ू-पंजे के साथ। उत्तम-प्रदेश की लाडली गोमती के दिन बहुरने का सपना देखकर मन-मयूर चिड़ियाघर में नाच उठा। अखबार और चैनलवालों ने फोटू के साथ खूब रेवड़ियाँ बाँटी। आगे सन्नाटे में किसी ने कहा अब एक छोटे से ब्रेक के बाद। इसी तरह अब कनाटप्लेस पर कनकौवे उड़ानेवालों को गंगा मैय्या के प्रति प्यार जागा है। भगवान उनका भला करे। चलिये इसी बहाने एक और आयोग बना। कुछ अपनों के काम का जुगाड़ तो हुआ। अपने राम तो लालू भय्या को दाद देने के लिये छटपटा रहे हैं कि कम से कम अपनी लौह-पट्टिका में गंगा-गोमती दोनो को समोहित करके अपने सच्चे प्यार की ढफली बजा डाली।
लोग उनकी पवित्र धाराओ में अवगाहन करते हुये अपनी यात्रा पूर्ण करके प्रफुल्लित होते हैं। अब जमुना किनारे राजमहलों मे रहने वालों को गंगा मैय्या को पीयरी चढ़ाने की याद आ रही है। चलिये याद तो आयी। कोई बात नही। देर आये दुरूस्त आये। मुमकिन है भय्या ओबामा के गले में बजरंगबली की फोटू देखकर शर्म महसूस हुई हो कि हम जब भारत के रहने वाले हैं, भारत के गीत सुनाते हैं तो फिर क्यों न अपने देवी-देवता और पतित पावनी नदियों के प्रति आस्था प्रकट करें। अजी हम तो सोच-सोच कर परेशान हुये जा रहे हैं कि यह कौन सी ठहर कर समझने की बीमारी पीछे पड़ गयी है।
अपने उत्तम प्रदेश की बात तो सबसे निराली है। अब मार्क करने वाली बात यह है कि कोई अनाज घोटाला हुआ था सन् 2004-05 के दरम्यान पर उसके भूत ने सपना दिखाया 2008 के आखिरी पहर में। राजधानी के एयरकन्डीशन्ड रूम में चैन की नींद में चिहुँक कर उठ बैठना और उस वक्त की दीमक खायी फाइलों को ढूँढना वाजिब है। क्योंकि उसी आधार पर कटघरे की चाभी का गुच्छा मुमकिन होगा। इससे दो बातें होंगी। एक तो गड़े मुर्दे निकालने में टाइम-पास होगा, दूसरे टेढ़ी नज़र वालों का मुँह काला करने का मौका मिल जायेगा। इसी तरह सब धान बाइस पसेरी के पलड़े पर लोग खाकी वर्दी में दूल्हा मियाँ बनाये गये कब मगर अब गौने के वक्त याद आया कि वह सामूहिक शादी ग़लत थी। असल में इसमे दोष किसी का नहीं है। दोष अगर है तो बस उस पुरानी बीमारी का जिसमें ठहर कर बात समझने की होती है। बुखार आया था एक महीने पहले पर इलाज के लिये हकीम साहब को ढूँढने निकले आज। कुछ लोगो की आदत होती है जबरदस्ती की बीमारी पाले रहने की जिससे दूसरे लोग कोई जरूरी काम न बता दें।
आजकल मुल्क में राजभय्या का जलवा अपने शबाब पर दिखाई दे रहा है। हर खबरनवीस और चैनलिया चचाजान राजभय्या को चमकाने में लगे हैं। उधर पुतला फूँकने और रिजाइन देने का तमाशा भी खूब चल रहा है। पर जमुना पार वालों को अभी कुछ समझ में नहीं आ रहा है। शायद यही समझने समझाने के लिये गंगा मैय्या को चुनरी चढ़ाने का स्वांग रचा जा रहा है। राष्ट्रीयता की ‘झीनी-झीनी रे बीनी चुनरिया’। लेकिन अपने राजभय्या को वह गाना याद नहीं आ रहा है कि ‘मेरा नाम राजू घराना अनाम, बहती है गंगा जहाँ मेरा धाम’। यह तो बात सच मानना चाहिये कि समझ में आयेगा मगर ज़रा ठहर कर। क्या किया जाये अपने देश में मौसम ही कुछ ऐसा चल रहा है।
कलम को कबूतर समझकर उड़ाते हुये अभी गाना ही शुरू किया था कबूतर जा जा जा...तभी नुक्कड़ वाले मीर साहब अपने जनाब मीरसाहब मरहूम वज़ीरेतालीम ‘मौलाना अबुल कलाम आज़ाद’ के यौमे-सालगिरह के जश्न में शिरकत करने जा रहे हैं। ढेर सारी अपनी शुभकामनाँये मीरसाहब के हवाले करने के बाद सोचने लगा कि लगभग पचास सालों के बाद अचानक मौलाना की याद मीरसाहब को कैसे दीवाना बना रही है। फिर अपने-आप नीली छतरी वाले ने मेरे थके दिमाग़ के दरवाज़े से झाँकते हुये समझाया कि समझ का फेरा है। बात समझ में तो आती मगर ज़रा ठहर कर। अब जब बीमारी लग ही गई तो कोई क्या कर सकता है।

रविवार, 2 नवंबर 2008

क्या हम क़बीले-युग की तरफ लौट रहे है...?

चलिये देश का विभाजन तो सब की सहमति से हुआ। भारत और पाकिस्तान। बीच में कश्मीर और बंगाल ने विभाजन की मार झेली। बोडोलैण्ड और नक्सलवाद ने भी पैर पसारते हुये देश को बाँटने की पहल कर दी है। अब महाराष्ट्र ने राज ठाकरे की रहनुमाई में अखण्ड भारत को खण्डित करने का अभियान शुरू करके इतिहास की खिड़की से वही पुराने कबीलाई-युग की झलक दिखा दी है। लगता है कि जयचन्द और मीरज़ाफ़र की आत्माओ ने फिर से नये शरीर धारण करके सिद्ध कर दिया है कि आत्मा सचमुच अजर-अमर है। बात सही है कि इतिहास हमेशा अपने को दोहराता है। हमने जि़न्दगी का कारवाँ जहाँ से शुरू किया था वहीं लौट रहे हैं। आज महाराष्ट्र, असोम, कश्मीर और हो सकता है कि कल बंगाल, बिहार व खलिस्तान खुदमुख्तारी का ऐलान करके तवारीख के पहले पन्ने को पढ़ाना फिर से प्रारम्भ कर दे। आज वे कहाँ हैं जिन्हे हिन्द पर नाज़ था, जो अखण्ड-भारत के सुहाने-सपने बुना करते थे। सर्वसत्तासम्पन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य की परिभाषा में भारत जैसे अज़ीमुश्शान मुल्क को बाँधे रहने के नेक इरादे का क्या हुआ। कवियों लेखकों ने अनेक भाषा, जाति, धर्म और सम्प्रदाय वाले ऐसे देश के लिए लिखा था हम पंछी एक डाल के। मगर अफसोस हमारे बीच के अत्यन्त प्रिय लोग उसी डाल को काट कर रंग-बिरंगी पंछियों के बसेरे उजाड़ने पर उतारू हो रहे हैं। सोचना पड़ता है कि जब अपना ही माल खोटा तो परखैय्या का क्या दोष। अगर यही रहा तो वह दिन दूर नही जब यह विशाल देश अनेक छोटे-छोटे क़बीलों में बँटा और खून-खराबा करता दिखेगा। आज भी कई महमूद ग़जनवी और ग़ौरी फायदा उठाने को तैयार बैठे हैं। क्या होगा इस देश का, जहाँ कहा जाता है कि देवता भी जन्म लेने के लिये तरसा करते हैं। यह भी किसी इतिहासकार फिरदौस ने कहा था कि अगर धरती पर स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है।

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2008

खिचड़ी भोज का लुत्फ

आजकल अपने लंगोटिया यार मीर साहब ‘खिचड़ी भोज’ के पीछे दीवाने बने हुए हैं। कहते हैं कि जितना मजा इफ्तार पार्टी में नहीं आता है उससे ज्यादा मजा ‘खिचड़ी भोज’ में आता है क्योंकि उसमें खाने वाले कई आइटम होतें हैं। खिचड़ी एक शार्टकट रास्ता होता है। भई खाने का मौज तो बस इसी में मिलता है। आए दिन अपने मीर साहब का नाम खिचड़ी भोज में शामिल होने की वजह से अखबार में फोटो सहित सुर्खियों में रहा करता है। यही नहीं, वे डकराते हुए कभी किसी गरीब की मढै़य्या के दरवाजे पड़ी खटिया पर पसर कर चांद सितारों की तमन्ना किया करते हैं। अक्सर ‘दिल्ली है दिल हिंदुस्तान का’ गाते हुए किसी खिचड़ी भोज में शामिल होकर गुडफील का मजा लेने से जरा भी हिचकिचाते नहीं हैं। भले इसे कुछ जलनशील लोग नौटंकी का नाम दें। हां, यह जरुर है कि इस हाड़ गलाने वाली सर्दी में कुछ पुलिस वालों और खबरिया चैनल वालों को भाग दौड़ करने में मुसीबत जरुर होती है।
अब रही अपनी बात तो वह अलग है। मैं तो अपनी घोंसलेनुमा घर में फटा कम्बल ओढ़े आज के खिचड़ी-भोजों और टूटी खटिया पर पड़े-पड़े महसूस करता हूं कि इस बदलते मौसम में पूरा का पूरा मुल्क खिचड़ी मय हो गया है। बस डर है तो बस ‘कोल्ड डायरिया’ का। किंतु सपने भी देखता हूं तो खिचड़ी का, खिचड़ी खाने का और बनाने का। किसी कम्बल बांटने वाले का शोर शराबा और गश्त करते पुलिस वालों के डंडों की ठक-ठक सुनकर पक्का यकीन हो जाता है कि सचमुच मैं एक खिचड़ी युग में जी रहा हूं। मैं तो भाई यही ‘फील’ कर रहा हूं और अपने विचार से ठीक ही फील कर रहा हूं क्योंकि बहुत से इबादत गाहों में आज भी खिचड़ी का बोलबाला है। काफी समझबूझ कर खिचड़ी भोग लगाने और भक्तों को प्रसाद स्वरूप बांटने का सिस्टम अपनाया गया है। अब यही समझने की बात है कि पहले किसी-किसी के घर कभी-कभार खिचड़ी पका करती थी लेकिन आज तो पूरा देश खिचड़ी का शौकीन दिख रहा है। मेरी समझ से यह खिचड़ी युग चल रहा है। हर जगह चाहे देश हो या प्रदेश सब जगह खिचड़ी परोसी जा रही है। पहले तो दाल अलग और भात अलग परोसने का रिवाज था। यानी राजा-प्रजा के बीच एक स्पष्ट रेखा खिंची होती थी। वह था सामंतवादी या राजशाही का जमाना। उसके बाद लोगों के मिजाज में परिवर्तन आया। भात फैलाकर उस पर छौंकी बघारी दाल के साथ सब्जी या सलाद वगैरह लेकर खाने का रिवाज शुरू किया गया। इस नए अंदाज को लोगों ने पूंजीवादी प्रवृति का नाम दिया। कभी अपने मीर साहब के मिजाज का आलम यह था कि विदेशी मक्खन के बिना निवाला उनके गले के नीचे नहीं खिसकता था। नए जोश और पुराने इतिहास का वास्ता देकर लोगों ने महाराणा प्रताप की तर्ज पर घास की रोटियां खाने का ड्रामा पेश करना शुरू कर दिया। जिन्हें चुपड़ी रोटी और बिरय़ानी हजम नहीं हो सकती उन्होंने दलील देना शुरू कर दिया कि भारत गरीबों का देश है। इसलिए समाजवादी आंगन में पत्तल पर रूखी सूखी खाने का रिवाज अपनाया था। सोचा चलो किसी को हम गरीबों की फिक्र तो हुई। पर कुछ खास लोगों के सामने सिर्फ नाम का पत्तल बिछाया गया जिस पर परोसी जाने लगी तहरीनुमा खिचड़ी और खिचड़ी के संग उसके तीन यार पापड़, दही घी, अचार। इसी तरह एक ही मुल्क में एक साथ सामंतवाद, पूंजीवाद और समाजवाद की खिचड़ी से सब खिचड़ीमय हो रहा है। कहीं गरीबों के देश में समाजवाद का सीन देखते-देखते गरीबों नें खुदकशी करनी शुरू कर दी और कहीं सिन सिनाकी की बुबलाबू के बोनट पर बैठकर सारे शहर को जलता हुआ देखकर बांसुरी बजाने का शौक चर्राने लगा। यानी सब कुछ बिलकुल खिचड़ी की तरह। ढूंढते रह जाइए दाल के दाने चावल और मटर बिलकुल उसी तरह जैसे आजकल की मसाला फिल्में। पहले हीरो-हीरोइन, कामेडीयन और विलेन अलग-अलग होते थे पर आज सब कुछ एक ही हीरों में देखने को मिलने लगा है। भगवान भला करे, ऐसी खिचड़ी खाकर डकार लेने वालों का। यहां तो मोहल्ले के आवारा लौंडे चिढा़ते हुए कहते हैं, ‘आधी रोटी बासी दाल, खा ले बेटा बाबूलाल’।

बुधवार, 8 अक्टूबर 2008

जम्बूरे का तमाशा

उस्ताद।" "अबे, अभी तो तू कालीदास मार्ग तक भला चंगा था। यहां तेरी तबीयत को अचानक क्या हो गया?" "जम्बूरे।" "उस्ताद, तबियत बिल्कुल चकाचक है। असल में विधान सभा की तरफ से आती हुई ठण्डी हवा ने तबियत मस्त कर दिया है। उस्ताद कसम से यह चीज़ बड़ी है मस्त-मस्त।" "अबे वो सब तो ठीक है मगर इत्ता पुराना...? "उस्ताद, मुझे पुराने गाने, पुरानी चीज़े जैसे पुरानी चढ्ठी पुरानी बनियाइने, पुरानी चप्पलें वगैरह बहुत पसंद हैं।" "अबे फिर कबाड़ी क्यों नहीं बन जाता?" "उस्ताद, कई बार सोचा तो मगर वहाँ भी बड़े-बड़े लोगों ने अड्डे जमा लिए हैं। फिर उस्ताद वहाँ भी वे सब पुरानी  चीजें कहाँ बिकती हैं। अब तो वहाँ कट्टा, बंदूके, गोले-बारूद खरीदे-बेचे जाते हैं। ‘जम्बूरे।’ ‘हाँ उस्ताद।’ ‘जो मांग होगी वही तो बिकेगा? अब तू गांधी छाप पुरानी ऐनक, चप्पल और खद्दर वगैरह ढूंढगा तो कहां मिलेगा? नक्खास भी अब वह नक्खास नहीं रहा बेटा।’ ‘उस्ताद कसम हाट शॉट डॉट कॉम की मुझे इस कैपिटल से बहुत लगाव है।’ ‘अबे इसी पुराने सिनेमा कैपिटल से?’ ‘हाँ उस्ताद बित्तीभर का था। दादा मरहूम कांधे पर बैठा कर यहां अंग्रेजी फिलिम दिखाने लाते थे। कसम से क्या जलवा था इसका?’ ‘बेटा जम्बूरे अब तो इसमें गरमागरम ख़ुदा के वास्ते फ्री का नाम मत लो। इसी सड़क पर कभी फ्री साड़ियां बांटी गई थी। मेरी अम्मी भी आई थीं। साड़ी के चक्कर में उस्ताद अम्मी जान पसलियां तुड़वा बैठी। अभी तक बिस्तर पर पड़ी है। इसी तरह एक बार रैली के बहाने लखनऊ घूमने के चक्कर में बरेली से आए अपने खालूजान प्लेटफारम पर भगदड़ में ऐसे गिरे कि उठने को कौन कहे सीधे अल्लाह को प्यारे हो गए। अब तो फ्री नाम से रूह कांप उठती हैं उस्ताद।’ ‘बेटा जम्बूरे अपना मुलुक भी तो फ्री है।’ बेशक है उस्ताद। मगर हालात क्या हैं यह तो देख ही रहे हो। उस्ताद एक बात कहूँ।बोल बेटा जम्बूरे़।फ्री के नाम पर अब तो गाने को जी चाहता है कि मैने चॉद-सितारों की तमन्ना की थी पर मुझे रातों की स्याही के सिवा कुछ न मिला। बेटा जम्बूरे, यार मुझे  माफ करदे। मैनें नाहक तेरे जख्मों को हरा कर दिया। उस्ताद कित्ती माफी माँगेगा। अरे एक माफी के कम से कम पाँच साल तो पूरे हो जाने दो। यहाँ तो समझ बैठे हैं कि रहा गर्दिशों में हरदम मेरे इश्क का सितारा, कभी डगमगाई कश्ती कभी खो गया किनारा। वाह जम्बूरे,जवाब नहीं तेरा। अच्छा ग़म भुलाने के लिये चलो विधानसभा के सामने तमाशा दिखाते हैं। वहाँ देखनेवालों का अच्छा-खासा मजमा लगेगा।

एक बात बोलू उस्ताद। अबे एक कम सौ बात बोल जम्बूरे। यही तो सबसे फसकिलास बात है अपने मुलुक में बेटा कि बोलने की दिल खोलकर आजा़दी है। बेटा निकाल डाल तू भी अपने दिल की भड़ास। बोल बेटा जम्बूरे ऐसा मौका फिर कहाँ मिलेगा। उस्ताद, मुझे लगता है कि तेरी पैदाइश कहीं जरूर किसी ए.सी. रूम में हुई होगी। क्यों आखिर ऐसी कौन सी खास बात देखी तूने मुझमें। बात तो कोई खास है नहीं लेकिन इस वक्त तूने बिल्कुल फैसला लिया है ए.सी. में रहने वालों की तरह। अरे अपनी प्यारी धरती से जुड़.कर कोई फैसला लेना सीखो।

अबे आखिर बात क्या हो गयी। कुछ नहीं। बात दरहअस्ल मे यह है कि वहाँ तो उस्ताद भीतर बाहर हमेशा एक से बढ़कर एक तमाशा हुआ करते हैं, अपने  पुराने घिसे-पिटे तमाशे में भला किसे मज़ा आयेगा उस्ताद। यक़ीन मानो मालिक अपना झोला-झंखड़ देखते ही फौरन पुलिसवाले मुँह में बीड़ी और हांथ में पुरानी टुटही साइकिल थमा कर आतंकवाद के नाम पर रैट टैम भीतर कर देंगे। कसम खुदा की उस्ताद  छः महीने तक ज़मानत नहीं होगी।  न बाबा न अपुन तो उधर कतई नहीं जाने का उस्ताद। बेटा जम्बूरे, अबे खुदाकसम मैंने तो इतनी दूर की सोचा तक नहीं था। तूने क्या तेलियामसान की खोपड़ी पायी है।

अच्छा जम्बूरे मेरी एक बात मानेगा। कहेगा भी सही। चल बेटा यहीं अपने कैपिटल के सामने मजमा लगाते है। शाम का वक्त है। बाबू लोग घर वापस जाने वाले होंगे। इत्मीनान के साथ हमलोगों के तमाशे का मज़ा लेंगे। कसम से जम्बूरे अबतो दिल खोलकर गाने को जी चाह रहा है  नाच मेरी बुलबुल तुझे पैसा मिलेगा। अमाँ सबसे मज़े की बात तो यह है कि इस वक्त चैनलवाले घूम रहे होंगे। कौन जाने अपने लोगो का तमाशा देखकर अपनी फटेहाल ज़िन्दगी पर कोई स्टोरी गढ़ कर अपने कैमरे में क़ैद कर डालें।

"एक बात पूछूँ उस्ताद। अबे एक सौ एक बात पूछ। आज मैं बहुत खुश हूँ।"

उस्ताद जब अल्लाहमियाँ के काउन्टर से अक्ल  बाँटी जा रही थी तो तू शायद लैन में काफी पीछे रह गया होगा इसीलिये तेरे काउण्टर तक पहुँचते-पहुँचते अक्ल की बुकिंग खत्म होगई रही होगी। शायद यही वजह है कि उस्ताद तू हमेशा बेअक्ल की बात बोलता है।

"अबे जम्बूरे वह कैसे। हमारी बिल्ली हमीं से म्याऊँ।"

"मेरे आला काबिल उस्ताद बुरा मान गये। अरे मेरे बाप समझता क्यों नही कि आजकल अपने बाबू लोग दफ्तर भले देर से पँहुचे क्योंकि वहाँ देर से पँहुचने के हज़ार बहाने बनाये जा सकते हैं जिन्हे हाकिम-हुक्काम को भी मानना पड़ता है इसलिये कि वे बेचारे खुद ही देर से अपने आफिस पहुँचते हैं। मगर बाबू लोगों को देर से घर पहुँचने पर अपनी तेज-तर्रार बीवियों को एक हज़ार एक कैफियत देनी पड़ती है।

"अबे बात कुछ समझ में नहीं आई, जम्बूरे।"

"इसलिये कि उन्हे ब्युटीपार्लर और बिगबाजार जाने की जल्दी होती है उस्ताद। अब रही बात चैनलवालों की बात तो वे अपना ढँढ-कमन्डल लिये हम जैसे फटीचरों को लिफ्ट क्यों देने लगे। "बेटा जम्बूरे,यार तेरी बात अपनी तो एकदम समझ में नहीं आती है। जो कहना है साफ-साफ कह।" "उस्ताद सीधी सी बात है कि चैनलवाले सबसे पहले भैंसाकुण्ड यानी बैकुण्ठधाम पर पँहुचकर कैमरा फिट करके देखेंगे कि कौन सा मुर्दा चिता पर लिटाते ही उठ कर बैठ जाता है और लगता है बताने कि अबकी इलेक्शन में कौनसी पार्टी का बहुमत होगा। बस दिनभर वही स्टोरी चलती रहेगी। समझे उस्ताद, कुछ नहीं समझे होगे क्योंकि जब हम नही समझे तो तुम क्या समझोगे।

 बेटा जम्बूरे बातें तू ऐसी कर रहा है जैसे बहुत दिनों  तक दूर के दर्शन को बहुत नजदीक से देखता रहा है। उस्ताद बारात किया तो नहीं है लेकिन देखा जरूर है। आज वही तर्जुबा काम आ रहा है। इसके बाद उनका कैमरा किसी खँडहर में किसी अधनंगी लाश या किरकिट-मैच में धिरकिट-धा बजाने वालों के इर्द-गिर्द घूमता रहेगा। अब समझने वाली बात यह है कि उन सब स्टोरियो के आगे अपने खबीस से चेहरों की  स्टोरी लोगो को क्या पसन्द आयेगी, जो पापी पेट के लिए तमाशा दिखाते भी हैं और तमाशा बनते भी हैं। उस्ताद, वह सब ख्वाब देखना भूल जाओ। अपनी औकात यही समझ लो कि  पार्टीवालों को लोग इलेक्शन के लिये खूब खुशी-खुशी हज़ारो का चन्दा दे देते हैं मगर हमारा तमाशा देखकर रूपये दो रूपये देने से कन्नी कटा कर किसी पतली गली से फूट लेते हैं। उस्ताद जरा समझने की कोशिश करो कि न तो हमलोग नेता हैं और न अभिनेता। उन सब के तमाशे के आगे अपना तमाशा कौन देखना चाहेगा।

बेटा जम्बूरे फिर अपनी दो जून की दाल-रोटी का इन्तज़ाम कैसे होगा। दिन पर दिन बढ़ती मँहगाई ने तो अ च्छे-अच्छों की कमर तोड़ दी है।  देख उस्ताद सबकुछ बोल मगर मँहगाई का रोना मत  रोया कर। अपनी सरकार बहुत दुखी हो जाती है। भला कभी तो सोचा होता कि इस वक्त अपनी सरकार बेचारी अमरीका से आतंकवादियों के चक्कर में सांस नीचे ऊपर कर रही है। ऐसे में भला मँहगाई  सुहाती है। उस्ताद तुम्ही बताओ कि कनाटप्लेस में भला झूमरीतिलैया का काजल कोई लगाना पसन्द करेगा।

अबे जम्बूरे जवाब नही। क्या जोड़ मिलाया है। कहाँ कनाटप्लेस और कहाँ झूमरीतिलैया।

उस्ताद हमलोगों को अपनी खुशकिस्मती समझना चाहिये कि हमलोगों को घर बैठे मँहगे लहँगे में मँहगे डान्स देखने को मिल रहे हैं। चुप क्यों हो गये उस्ताद। कोई बेजा बात कह दी क्या।

नहीं जम्बूरे, सोचता हूँ तू कहाँ किस धन्धे में फँस गया। तुझे तो उस्ताद होना चाहिये था या कहीं नेता। उस्ताद तू सोचता क्यों नहीं कि आजकल अफसर से ज्यादा रूतबा अर्दली का होता है। मैं जम्बूरा ही ठीक हूँ। मैं दलबदलू नहीं हूँ। यह नहीं कि आज एक उस्ताद के इशारे पर तमाशा दिखाता फिरूँ और कल दूसरे उस्ताद के पीछे भागता फिरूँ। देख उस्ताद मैं जम्बूरा हूँ, मुझे जम्बूरा ही रहने दे। इसी में मैं खुश हूँ। मैं उनमें से नहीं हूँ कि बड़े-बड़े धन्नासेठ-टाइप उस्तादों की डुगडुगी पर पब्लिक को तमाशा दिखाता रहूँ। कसम ख़ुदा की तू भले ही फटेहाल उस्ताद है मगर है तो मेरा उस्ताद। दिल दिया है जाँ भी देंगे ऐ उस्ताद तेरे लिये। तुम उस्तादों के उस्ताद बन सकते हो मगर मेरी किस्मत में तो जम्बूरा बनकर ही खेल दिखाना बदा है। तू भले मुझ पर मैली चादर डालकर चाकू चमकाते हुये पब्लिक के सामने मुझे मारने के लिये चिल्लाता रहेगा मगर मैं आखिरी साँस तक उस्ताद-उस्ताद पुकारता रहूँगा। तुम शायद हमेशा की तरह मेरी पुकार अनसुनी करके मजमे से कहते रहोगेमेहरबान कदरदान, पापी पेट का सवाल है।

गुरुवार, 4 सितंबर 2008

दूल्हे कब तक बिकते रहेंगे

एक बात बरसों से जेहन में काई की तरह जमी बैठी है कि ‘औरत’ औरत है और मर्द हमेशा मर्द है। लोग भले डुगडुगी बजा-बजा कर चिल्लाते रहें कि बेटा जम्बूरे दोनों में कोई फर्क नहीं है। दोनों को समान अधिकार होना चाहिए। दोनों को एक तरह से जीने का हक मिलना चाहिए वगैरह-वगैरह। यह जरूर है कि लोगों को एक दूसरे को खुश करने या तसल्ली देने की फितरत विरासत में मिली है, इसलिए एक कदम आगे बढ़कर ‘महिला सशक्तीकरण’ का नाम देकर ‘घरैतिन’ को कुछ देर के लिए टेन्शन फ्री कर देना चाहता हूं।
चलिए आज जिन्दगी के हर गोशे में जब लड़कों की तरह लड़कियों को भी टॉप गीयर में देखता हूं तो बगली काट कर अलग राह पकड़नी पड़ती है कि न जाने कब कौन सी आफत आ जाए और संजोये गये करेक्टर पर लोग कीचड़ उछालने लगे? यह बात तो मैं भी मानता हूं कि सृष्टिकर्ता की इन अलग-अलग रचनाओं को समान रूप से संपादित करके एक ग्रन्थ का रूप दिया जाए तो सचमुच समाज की विशाल लाइब्रेरी में चार चांद लग उठे।
पर न जाने क्यों जेहन में बैठी वह औरत मर्द वाली अलग-अलग तस्वीरें अलग ही दिखाई देती हैं। कहने की जरूरत नहीं कि आये दिन चैनलों और अख़बारों में जो न बताने लायक खबरें छपती हैं या दिनभर दिखाई जाती हैं उससे जायका एकदम बिगड़ जाता है। इसके अलावा अपने माननीयों के अंगने में उठापटक और लड़की के लिए लड़कों की खरीद-फरोख्त की बात सुनता हूं तो भी बात पक्की हो जाती है कि “दिल को बहलाने के लिए गालिब ये ख्याल अच्छा है”दोनों को बहलाने के लिए ‘महिला सशक्तीककरण’ तथा ‘नर नारी एक समान’ का ख्वाब दिखाकर तसल्ली की तश्तरी में समानता का लज़ीज पकवान परोसा जाता है। मैं उन सम्मानित नारियों की बात नहीं करता जो नर के बगल में बैठकर देश के नवनिर्माण का खाका खींचती हैं। अपने को गान्धारी, अनुसूइया, सावित्री, रजिया सुल्तान और झांसी की रानी से कम नहीं समझती हैं। पर वास्तव में सर्वसाधारण महिलाओं के सशक्तीकरण का एक छोटा सा बिल शायद आज तक नहीं पास करा सकी क्योंकि जीव वैज्ञानिकों की बात पर वे खामोशी अख्तियार करना बेहतर समझती होंगी कि पुरुष और महिला के जैविक तत्वों के कारण काफी अंतर होना स्वाभाविक है। उधर पुरुष प्रधान समाज भी अपना वर्चस्व कायम रखने से पीछे नहीं हटना चाहता है।
कानूनी शिकनी करना तो देश के कानून का सरासर अपमान है फिर भी ताज्जुब है कि हमारे देश का कानून ऐलाने जंग तो बहुत करता है लेकिन उसकी आंखों पर उस वक्त पट्टी बंध जाती है जब दहेज और अनाचार के नाम पर महिलाओं पर अत्याचार होता है या पुरुष प्रधान समाज उसे हेय दृष्टि से देखता है। यह बात नहीं कि पुरुष ही इसका जिम्मेवार है। खुद नारियां ही नारी उत्थान में बाधक बन रही हैं, क्यों कि कहा गया है कि नारियों में ईर्ष्या की भावना ज्यादा होती है। वरना संसद और विधान सभाओं के अतिरिक्त अन्य जगहों पर भी उच्चस्थ पदों पर बैठी महिलाएं अभी तक एक बिल नहीं पास करा सकीं। उन्हें सिर्फ जिले से उठाकर राज्य‍ और राज्य से उठकर केन्द्र तक पहुंचने की फिक्र है, पर समाज में सिसकियां भरती सामान्य महिलाओं के साथ क्या गुजर रही है, देखने वाला कोई नहीं है। कानून रोज बनाये जाते हैं पर वे कारगर कितने साबित होते हैं वे ही जानें।
मामूली सी बात दहेज के नाम पर शोषण करने का है। कितनी रपटें लिखी जाती हैं और कितनी कार्यवाहियां की जाती है? आंकड़े तो सिर्फ उन्हें ही बताते हैं जिन्हें दर्ज किया जाता है। अधिकांश तो बदनामी के डर से रपट लिखाते ही नहीं हैं।
हाल की बात है कि एक कन्या की फोटो पसन्द करने के बाद भी वर पक्ष के लगभग डेढ़ दर्जन लोग वधू पक्ष की टूटी मड़ैया पर आ धमके। लगा जैसे कोई नुमाइश देखने आये हों। अमूमन ज्या दा से ज्या्दा चार-छह खासमखास लोग जैसे वर के मां-बाप, बहन, कोई चाचा, ताऊ और वर स्वयं जाते हैं। बहरहाल इतने लोगों के पहुंचने पर किसी ने रिटन टेस्टं लिया तो किसी ने मौखिक परीक्षा और किसी ने होम-साइंस का इम्तहान लेना शुरू कर दिया। बीच-बीच में लड़के का बड़ा भाई रोना रोकर इशारा भी करता रहा कि अभी उसने चार पांच लाख रुपये लगाकर मकान बनवाया है पर वह भी अधूरा रह गया है। मतलब साफ यानी अनुभवी लोग ‘खत का मजमून भांप लेते हैं लिफाफा देखकर’।
साथ में यह भी तुर्रा कि हम लोगों को सीधी सादी लड़की चाहिए। आजकल की तेजतर्रार लड़कियां नहीं चाहिए। बहरहाल वर-वधू ने एक दूसरे को पसन्द कर लिया। आये लोगों ने भी दबी जुबान से पसन्द जाहिर कर दी। लेकिन फाइनल रिजल्ट चार-छः दिनों बाद घोषित करने का आश्वासन दिया गया। लेकिन बीच-बीच में रोना वही कि अभी मकान अधूरा पड़ा है इसलिए कुछ...। ताज्जुब होगा जानकर कि लड़का हाईस्कूल अनुतीर्ण है और किसी नौकरी में भी नहीं है। कन्या के पिता भाग्यवादी और सामाजिक कार्यकर्ता होने के नाते अपनी बात पर अटल हैं जबकि उनकी पुत्री इण्टर पास है।
अभी तक फाइनल रिजल्ट‍ का इंतजार किया जा रहा है। एक दिन ‘लड़की वाले गरजमंद होते हैं’ की मशहूर कहावत के तहत उसके पिता ने फोन किया तो उधर से उल्टा चोर कोतवाल को डांटने के लहजे में कहा गया कि आपने तो हम लोगों को विदाई नहीं दी। काबिलेगौर है मानसिकता कि बिना फाइनल रिजल्ट के विदाई देने की रस्म कहा से उठती है? उसके बाद भी फाइनल के लिए पुन: चार दिन का समय मांगा गया। कन्या पक्ष का यही तो मानसिक शोषण है कि उन्हें अधर में लटका कर मनमानी मांग मनवाया। इस सम्बन्ध में बुद्धिजीवी लोगों से बात कीजिए जो लड़की लड़कों को समान समझने का ढिंढोरा पीटते है वे भी जब कहते हैं कि क्या करोगे भाई लड़की वालों को झुकना ही पड़ता है तो धिक्कारने को जी चाहता है ऐसी समानता की बात करने वालों को। प्रतीक्षा कराते-कराते कहीं ‘ना’ हो गया तो उस लड़की को डिप्रेशन में डूब कर आत्महत्या करनी पड़ती है। माना कि आज लड़कियां पायलट बन रही हैं, वैज्ञानिक हो रही हैं, राजनीतिज्ञ होकर नेतृत्व कर रही हैं और अंतरिक्ष में बेखौफ उड़ान भर रही हैं पर कितने प्रतिशत? वे भी सम्पन्न परिवार से ही सम्बन्धित होती होंगी।
क्या इन मुट्ठी भर तरक्कीयाफ्ता कन्याओं से पूरे नारी जागरण का स्वप्न पूरा हो सकता है? क्या सचमुच पुरुष प्रधान समाज अपनी मा‍नसिकता बदलने को तैयार है? यदि ऐसे मामले उजागर भी होते हैं तो जल में रहकर मगर से बैर करने वाली बात होती है। इन्हीं कारणों से लोग लड़की के जन्म को अभिशाप समझने लगते हैं। कानून है लेकिन कानूनी दांव-पेंच अपने देश में ऐसे उलझे हुए हैं कि उनके सुलझते-सुलझते या तो माता-पिता श्मशान के रास्ते पर चल देते हैं या कन्या बिन ब्याही पश्चाताप की आग में खुदकुशी कर लेती है।
सबसे बड़ी बात तो समाज के उन कर्णधारों को देखकर होता है जो चुप्पी‍ साधते हुए खरीद-फरोख्त के बाजार को और गर्म कर देते हैं। रोना पड़ता है किसी 'रामउजागिर' को या किसी रिटायर 'अब्दुल लतीफ' को अथवा उसके पूरे परिवार को जो किस्मत को सब कुछ मानकर जी रहा है। कब बदलेगा यह समाज? कब मिटेगा दहेज के लोभ का दानव और मिटेगी वह दृष्टि जो आज भी लड़कियों या महिलाओं को बंधुवा मजदूर के रूप में अपने घर की बहू बनाना चा‍हते हैं पर बदले में चाहते हैं लड़के पर बचपन से लेकर आजतक होने वाले सारे खर्च को पूरे ब्याज के साथ। महिला सशक्तीकरण के नाम पर जो सिर्फ कागज का पेट भर कर वाहवाही लूट रहे हैं। बस सब किताबी बातें रह गयी है कि ‘नारी से नर होत है ध्रुव प्रह्लाद समान।’

(नोट: (04/09/2008 को स्थानीय हिन्दी दैनिक ‘जनमोर्चा’ में प्रकाशित)

बुधवार, 3 सितंबर 2008

तारीफ करूं उसकी जिसने उन्हें बनाया...

बखुदा जी चाहता है कि ऊपर वाले का मुँह चूम लूं कि उसने इस धरती के आलीशान टुकड़े पर ऐसे-ऐसे नायाब मुज्जसिमें गढ़ कर भेजे हैं कि बस देखते ही रह जाना पड़ता है। लगता है कि किसी समर-वैकेशन में बड़े इत्मिनान के साथ उन्हे गढ़ते वक्त उनकी किस्मत किसी कमाल की कलम से लिख डाली हो। इसी वजह से बरबस ज़ुबॉं पर यह लाइन आ जाती है, "तारीफ करूं उसकी जिसने उन्हें बनाया।"

अपने जैसों की बात करना तो भय्या हरियाली छोड़ रेगिस्तान का कठिन रास्ता नापना जैसा है। खेत काटने जैसी जल्दी में हड़बड़ी के वक्त जैसे-तैसे टेढ़ा-मेढ़ा गढ़ डाला होगा और तकदीर लिखते-लिखते कलम में स्याही खतम होगई होगी। रोना यही है कि आखिर हमने क्या बिगाड़ा था। जो बेचते थे दवा--दिल मेरे साथ, वे दुकान अपनी बढ़ा चले। एक चैनल पर देखकर ताज्जुब हुआ कि एक विदेशी ने ऋगवेद में दिये गये विवरण के अनुसार उन ऐतिहासिक स्थलों की खोज में ईरान और इराक की ख़ाक छान डाली। उसे हासिल भी बहुत कुछ हुआ जिससे दुनिया के सामने हकीकत आयी। पर अपने माननीय द्वारिकाधीशों को दूर को मारिये गोली निकट की वस्तु भी निहारने के लिये उनके चश्मे का पावर धोखा दे जाता है। फॉर एक्जाम्पिल जहाँ सहारा है, वहीं बेसहारों का विशाल समूह देखकर सोचने पर मज़बूर होना पड़ता है कि सचमुच यही है सच्चे समाजवादी समाज का बेहतरीन नमूना। जरा हमसफर बनकर मेरे साथ लखनऊ से बाराबंकी तक लाल लंगोटावाले लालू पहलवान की रेलमपेल रेल में सफर करने की ज़हमत गँवारा करें। गोमती के गुस्से को पीते हुए जैसे आगे बढ़ेगे कि द्वारिकापुरी की गगनचुम्बी अट्टालिकाओं का दिलकश नज़ारा सामने देखते ही बनता है। माया उनकी समझ में नहीं आती है। किन्तु-परन्तु सहारे में बेसहारों की रोती-बिलखती फटेहाल झुग्गी-झोपड़ियों को देखकर दौड़ती पसीन्जर गाड़ी की खटमलयुक्त सीट पर बैठे-बैठे सोचता हूँ कि रेलवे लाइन के किनारे इन अनगिनत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले सुदामाओ पर पास रहने वाले द्वारिकाधीशों को जरा भी तरस नहीं आया कि कम से कम उनके सिर पर एक-एक पक्की छत तो मुहैय्या करा देते। फिर क्यों नहीं उन्हें मरहूम साहिर साहब का वही शेर याद करने को दिल चाहता है— ‘कि इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक।’ यह सबको मालुम है कि ये वे बदनसीब मजूर-दरहे हैं जिनका काम द्वारिकापुरी को सजाने-सँवारने के बाद दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका जाएगा। फिर भी इन्हें और इनकी बिना छत झुग्गी- झोपड़ियों को देखकर यूँ जान पड़ता है जैसे चाँद में लगे दाग़ य़ा जैसे सूर्य में लगा ग्रहण। यह तो बाइसकोप का ग़ैरमामूली सीन है बाढ़ में बग़ावत का बिगुल बजाती गोमती मैय्या के पार रेलवे लाइन के किनारे का। यहाँ तो तमाम जाने-अनजाने द्वारिकाधीशो के रंगमहलों व पंचसितारों के आस-पास लकुट-कमरिया ओढ़े टपकती छतों के नीचे पड़े अनगिनत सुदामाओ की झुग्गी-झोपड़ियों का सिनेमास्कोपिक बाइसकोप देखना आम बात है। पहले वाला ज़माना अब रहा कहाँ कि गरीब और फटेहाल सुदामा का नाम सुनते ही बिना किसी प्रोटोकाल की परवाह किये खुद नंगे पाँव गले मिलने चल देते थे और उनकी हालत पर तरस खाकर उन्हें एक दो नहीं बल्कि तीनों लोक देने को उतावले हो जाया करते थे। आज तो द्वारिकाधीशों का स्वार्थ इतना सिर पर चढ़ कर बोल रहा है कि लोक का एक छोटा सा टुकड़ा और टुकड़े पर एक परमानेन्ट छत मुहैय्या कराना गँवारा नहीं किया। यह तो सब जानते हैं कि उन फटीचर सुदामाओं के यह अरमान कभी नही रहे कि उनका एक बँगला बने न्यारा। उस वक्त भी तो फटीचर ‘सुदामा’ की दिली ख्वाहिश बस सिर छुपाने के लिये एक छोटी सी छत और दो जून की बासी ही सही एक टुकड़ा रोटी ही चाहिये थी। आधुनिक द्वारिकाधीशों द्वारा मनमाने ढंग से उगाये गये कंकरीट के जंगलों के बीच गोमती की सुनामी लहरों से अनचाहे खेल खेलते हुए अपनी कूड़े-कबाड़ों से पटी झोपड़ियों पर किस्मत की मार समझते हुए फटेहाली का रोना मानवाधिकार के ठेकेदारों से रोना भी तो बेहतर नहीं समझते हैं क्योकि डर है कि कहीं उन्हे आज के द्वारिकाधीशों का कोपभाजन न बनना पड़े और बची-खुची रोटी के लाले न पड़ जांये। मेरे ख्याल में राजधानी के द्वारिका धीशों को खुद कल्याणकारी राज्य के बोधिवृक्ष के नीचे विचार करना चाहिये। इसीलिये जी चाहता है कहने को ‘तारीफ करूँ उसकी जिसने उन्हें बनाया।‘ उन्हे जिन्हें इतने विशाल देश की गाड़ी को विकास की लाइन पर दौड़ाने के लिये ड्राइबरी की नौकरी दी गयी है। सच पूछिए तो भाईजान मेरी नज़र में तो डरेबरी की नौकरी आई..एस. और आई.पी.एस. वगैरह से कहीं बड़ी है। जरा सी सावधानी हटी नहीं कि दुर्घटना हुयी। इसीलिये अंग्रेजों ने शायद रिटायर करने की एक उम्र निर्धारित की थी। पर उस ज़माने में शायद एलक्शनवाली एनर्जी और लम्बी उम्र अता करनेवाली मशीन नहीं इजाद की गयी रही होगी। अब कितने भी इनरजेटिक और देशसेवा करने की तमन्ना संजोये यूथ-फेस्टिवल वाले उस ड्राइविंग लाइसेन्स के लिये हाथ-पैर मारते रहें लेकिन कोई फायदा होते नहीं दिखता। आजके द्वारिकाधीशों को अमरत्व की घुट्टी जो उनके आला सरदारों ने पिला दी है इसलिये उनके नजदीक रिटायरमेन्ट का भूत फटक नहीं सकता है। किसी ने ठीक ही कहा है,— न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बन्धन जब प्यार करे कोई देखे केवल मन।’ भाई, उन्हें इस मुल्क से बेपनाह प्यार जो है। इसलिए उनके रिटायरमेन्ट का सवाल ही नहीं उठता है।

असली-नकली का खेला...

अमां, मुझे अपने अपने बचपन की वह बात खूब अभी तक याद है। जब मैं किसी इम्‍तहान में बगल वाले की कापी को उचक उचक कर देख कर अपनी कापी पर लिख रहा था। उस वक्‍त मूंछे तो नहीं हल्‍की हल्‍की रेख जमी थी। मारे जोश के जब इम्तहान देकर बाहर निकला तो उन रेखों पर ही ताव से हाथ फेरते हुए साथियों को बताता रहा कि मेरे सारे सवाल सेन्‍ट परसेन्‍ट सही होंगे, क्‍योंकि मैंने बगल वाले से अक्षरश: नकल कर डाली है। उधर बगल वाला परीक्षार्थी मुंह लटकाए हुए लोगों से बता रहा था कि उसके सभी सवाल गलत हो गए। मेरी झूठी खुशी पर तंज कसते हुए किसी पतली कमर मौलवी साहब ने फरमाया, ‘हजरत नकल में भी अकल की जरूरत होती है।’ तब मुझे भी होश आया लेकिन तब होता क्‍या है ‘जब चिडि़यां चुग गयी खेत।’

इन दिनों अपने मुल्‍क में भी नकल की सुनामी लहर उठ रही है। रोज अखबारनवीसों को इस नकल के मुद्दे पर कलम तोड़ कर स्‍याही पी लेनी पड़ती है। सुनते हैं आज कल कोई जगह नहीं बची है जहां जाली नोटों की बौछारे न पड़ रही हों। चाहे डुमरियागंज हो या डूंगरगढ़। सब जगह जाली नोटों की बरसात हो रही है। यह सब देखकर पेशोपेश में पड़ गया हूं कि हाल में संसद के स्‍वर्णपटल पर नोटों की गड्डियां जो दिखाई गयीं, खुदा जाने वे असली थी या नकली? क्‍योकि पहले हम लोग जब मुहल्‍ले में ड्रामा खेलते थे और उसमें नोटों की गड्डियां दिखाने का सीन आता था तो हमारे डायरेक्‍टर साहब नीचे ऊपर असली दो चार नोट रखकर बीच में उसी साइज के कटे सादे कागज रख दिया करते थे। देखने वाले समझते थे कि सब असली नोटों की गड्डियां हैं। अब बहरहाल देस में नोटों की कमी है नहीं पर हैरत इस बात पर जरूर होती है कि बैंक जो नोटों के माहिर समझे जाते हैं और ‘विश्‍वास’ जिनका मूलमंत्र होता है वे इन जाली नोटों के जाल में उपभोक्‍ता को कहां और कैसे फंसाने पर उतारू हो गये?

अब अपने दिलो दिमाग के दरवाजे खोलकर झांकने की झकझोर कोशिश करता हूं कि नकली की नकेल नोटों की ही क्‍यों पकड़ी जा रही है? असली नकली का किस्‍सा तो बहुत पुराना है। नकली शिखण्‍डी को ही सामने करके बेचारे बाल ब्रह्मचारी भीष्‍म पितामह का बन्‍टाधार कर दिया गया। तारीख के पन्‍ने पलटने पर मालुम हुआ कि ‘झांसी की रानी’ के किसी गोलन्‍दाज ने गोले के नाम पर नकली गोलों से फिरंगी फौज पर प्रहार किया था। भय्या, क्‍या नकली है और क्‍या असली है? इस चक्‍कर में घनचक्‍कर बनकर माथा खपाना बेकार है। कुछ दिन लोग बोफोर्स और फौजी शहीदों के कैफीन को नकली बताकर आपस में चोंचें लड़ाते रहे। अब यह बात अलग है कि आज शनि की साढ़े साती कागजी नोटों और सरकार से सरोकार रखने वाले बैंकों पर चढ़ बैठी है।

लेकिन मेरी समझ में किसी एक को दोष देना ठीक नहीं है। बड़े-बुजुर्गों ने खूब मन्‍थन करने के बाद कहा था कि जब अपना ही माल खोटा तो परखैया का क्‍या दोष? पहले अपने गिरेबान में मुंह डालकर झांकना चाहिए। सीने पर जरा आइसक्रीम रखकर सोचिए कि नकली नोटों के पीछे ही हाथ धोकर लोग क्‍यों पड़े हैं? कोई सस्‍ती सीबीआई और कोई मद्दी सीआईडी से जांच कराने के लिए गुटुरगूं कर रहा है। सोचने वाली बात है कि जब माननीयों के बीच असली-नकली का खेल चल रहा है तो कहां तक जांच की आंच गर्मी पहुंचाएगी?

अब तो मुझे लगता है कि खुद दुनिया बनाने वाला सोचता होगा कि कहीं उसके द्वारा रचे और धरती पर उतारे गये लोग असली रह भी गये हैं या नहीं? हो सकता है ‘ग्‍लोबल वार्मिंग’ की बदलती फिजां में किसी नकली रचनाकार ने नकली रचना भेजने का पोस्‍टआफिस खोल दिया हो। इन दिनों तो अपने कवि या लेखकों को कुछ ऐसी लाइलाज बीमारी ने धर-दबोचा है कि वे ग़ालिब, शेक्सपीयर और नीरज की पंक्तियों को अपने नाम से पढ़कर अच्‍छा खासा ईनाम, इकराम हासिल कर लेते हैं। अब तो भाईजान ऐसा जमाना आ गया है कि किसी पार्टी में रहते हुए और पार्टी के लिए समर्पित होने का दावा करने वालों के दावे को असली कहना मुश्किल है। भई कहना पड़ता है कि ‘अच्‍छों को बुरा साबित करना दुनिया की पुरानी आदत है।’ कौन अपने असली रूप में सरकार के भीतर फुफकार रहा है और कौन बाहर फुफकारने की एक्टिंग कर रहा है, बताना बहुत मुश्किल है। कौन सच्‍चे दिल से रामनाम जप रहा है और कौन नाम के लिए राम का नाम ले रहा, कहना नामुमकिन है। जब पुलिस की वर्दी में डकैत डकैती करके चले जाते हैं और रिपोर्ट लिखने में आनाकानी की जाती है तो भाई असलियत से रूबरू होना नामुमकिन है। सुनने में आता है कि आजकल इंजेक्‍शन लगा कर सब्जियों को खूब डेवलप कर दिया जा रहा है। दूध को असली कहकर सेहत बनाने की चाहत रखना निहायत मूर्खता के सिवा कुछ नहीं है। लेकिन जानते समझते हुए किसी के पेट पर लात क्‍यों मारी जाए? हम कहां कहां सीबीआई और एन्‍टीकरप्‍शन को भिड़ाते रहेंगे? जब पुलिसिया फोर्स होते हुए भी आराम से गाड़ी या बसों में लोग छीन झपट कर चलते बनते हैं तो और कहने को रहा ही क्‍या है? और तो और जब नकली वायदे करके लोगों से विकास के नाम पर वोट बटोर लेते हैं तो इससे बढ़कर नकलीपन क्‍या हो सकता है?

असल में नकलीपन की ऐसी हवा चली है कि जड़ से नेस्‍तानाबूद करना खुद अल्‍लाह मियां के वश में नहीं रहा है। खुदा न खास्‍ता अगर वह दोनों जहां का महान ठेकेदार हमारी गली में आ टपके तो कुछ क्‍या परसेन्‍टेज लोग नकली कहकर सीबीआई के हवाले कर बैठेंगे। लेकिन बमुताबिक दादा हुजूर के सब वक्‍त वक्‍त की बात है। नकलीपन का लेवल कभी रिफाइन्‍ड और सरसों के तेल पर लगाया जाता है, कभी पार्टी के निहायत वफादार पर चस्‍पा करके बाहर का रास्‍ता दिखा दिया जाता है। आज कल मेडिकल स्‍टोर वाले नकली दवाओं के लिए अलग बदनाम हो रहे हैं। कभी कभी लोगों को भी शक होने लगता है कि वे असली माता-पिता की असली संतान हैं भी या नहीं?

बहरहाल मौजूदा हालात में तो नकली नोटों को देखना है कि वे आर्यो की तरह कहीं मध्‍य एशिया से तो नहीं आए? खैर जहां से जैसे भी और जिसके जरिए से भी इस स्‍वर्ग स्‍वरूपा धरती पर आये हों उनसे हमें या हमारे जैसे फटीचरों को क्‍या लेना देना। यहां तो नोट देखा नहीं कि लार टपक पड़ी। लार तो बड़े-बड़े दिग्‍गजों के टपक पड़ती है क्‍योंकि उनकी लोभी नजरों के सामने तो सब से बड़ा रुपय्या है। वे कहां हैं कहां हैं जिन्‍हें नाज है हिन्‍द पर वे कहां हैं? क्‍या उनका शगल सिर्फ ‘डील’ की झील में डुबकी लगा कर पाउडर मलना है या कभी श्राइन बोर्ड, कभी रामसेतु और कभी राममंदिर की बाल की खाल निकालना है? उनका इस मामले में क्‍या विचार है जो फर्श पर रहकर अर्श पर पहुंचने का ख्‍वाब देख रहे हैं। इन सबके बावजूद उन्‍हें कहने को जी चाहता है कि पलट तेरा ध्‍यान किधर है? क्‍या हादसे हद से गुजर जाने के बाद उन्‍हें चन्‍द दिनों के लिए ख्‍याल आता है? ऐसे उदारवादी देश के उदारवादी कानून को बारम्‍बार नमन करने को जी चाहता है। क्‍यों नहीं ये बीमारियां दूसरे मुल्‍कों में फैल रही हैं। गुस्‍ताखी माफ की जाए, वही कहावत बार-बार कहकर दिल को तसल्‍ली देना चाहता हूं कि ‘हर शाख पे उल्‍लू बैठे हैं अन्‍जामें गुलिस्‍तां क्‍या होगा?’

इसलिए सिर्फ नकली नोटों को ही नहीं, नकली वोटों के सहारे सुनहरी कुर्सी पर टंगड़ी पसार कर बैठे लोगों की तरफ भी ध्‍यान देना चाहिए।